
नरेंद्र मोदी: भारतीय प्रधानमंत्री विदेश यात्रा में पत्रकारों के प्रश्नों का उत्तर क्यों नहीं देते?
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूरोप यात्रा के दौरान पत्रकारों के सवालों का जवाब न देने को लेकर विवाद खड़ा हो गया है।
विवाद बढ़ने पर भारतीय विदेश मंत्रालय को लोकतंत्र की सुरक्षा करने की स्थिति सामने आई है। यह दूसरी बार है जब प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के दौरान इस प्रकार के मुद्दे पर सरकार को जवाब देना पड़ा है।
नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गार स्टोरे के साथ संयुक्त पत्रकार सम्मेलन में एक महिला पत्रकार ने प्रधानमंत्री मोदी से मीडिया के सवालों के जवाब देने का आग्रह किया था, लेकिन मोदी ने कोई जवाब नहीं दिया।
यूरोपीय देशों में विदेशी नेताओं के दौरे के दौरान पत्रकारों का प्रश्न पूछना एक पुरानी परंपरा है।
नॉर्वे की पत्रकार हेल लिंग ने भी विदेश मंत्रालय की ब्रीफिंग में मानवाधिकार संबंधी सवाल पूछे थे। विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इसका जवाब देते हुए भारत को सभ्य राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत किया था।
पहली बार ओस्लो स्थित सरकारी गेस्ट हाउस में मोदी और नॉर्वे के प्रधानमंत्री स्टोरे की पत्रकार वार्ता के बाद हेल लिंग ने सवाल किया था।
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विदेश मंत्रालय को जवाब देना होगा
हेल लिंग ने पूछा था, “प्रधानमंत्री मोदी, आप दुनिया के स्वतंत्र प्रेस के सवालों का जवाब क्यों नहीं देते? क्या आप सरकार के लिए भरोसेमंद हैं?”
प्रधानमंत्री मोदी ने इस सवाल का कोई जवाब नहीं दिया।
हेल के सवाल के कारण भारत में भी व्यापक बहस हो रही है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी सवालों से डरते हैं और जवाब देने से बचते हैं।
भारत के प्रमुख अंग्रेजी समाचार पत्र ‘द हिन्दू’ के दिल्ली संपादक वर्गीस के जोर्ज ने सोशल मीडिया एक्स पर इस विषय पर टिप्पणी की है।
“भारत में पत्रकारिता और लोकतंत्र को लेकर काफी चिंताएं हो सकती हैं। लेकिन लोकतंत्र या पत्रकारिता के लिए नॉर्वे को अंतिम मानक मानना विभिन्न देशों की विशेष परिस्थितियों की उपेक्षा करना है …”
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मोदी के नीदरलैंड्स दौरे में भी स्थानीय पत्रकारों ने संवाददाता सम्मेलन में सवाल पूछने से वंचित होने पर आपत्ति जताई थी।
विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी सीबी जॉर्ज ने इस बारे में सफाई देते हुए कहा था, “सवाल पूछने वाले की समझ की कमी के कारण हम ऐसे सवालों का सामना कर रहे हैं।”
जर्मनी यात्रा में भी सवाल उठ चुका है
विदेश मंत्रालय की ब्रीफिंग में ये प्रश्न किया गया था कि जिन देशों के नेताओं ने यात्रा का आमंत्रण दिया था, उन्होंने भारतीय पक्ष से मीडिया के सवालों का जवाब देने का आग्रह किया था या नहीं।
उन्होंने कहा था कि विदेश मंत्रालय प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान पूछे गए सवालों के जवाब देगा।
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल २०२२ में जर्मनी का दौरा किया था। उस वक्त जर्मनी में ओलाफ शॉल्ट्स चांसलर थे। जर्मनी में किसी विदेशी नेता द्वारा चांसलर से मिलने के बाद मीडिया के सामने आकर पत्रकारों के सवालों का जवाब देना पारंपरिक होता है, लेकिन मोदी के दौरे में ऐसा नहीं हुआ।
इसके बाद जर्मन प्रसारक डीडब्ल्यू के प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संपादक रिचर्ड वाकर ने इस मुद्दे को उठाया। उन्होंने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा, “मोदी और शॉल्ट्स अब बर्लिन में पत्रकारों के सामने पेश होंगे। दो सरकारों के बीच १४ समझौते घोषित होंगे। लेकिन भारतीय पक्ष के अनुरोध पर एक भी सवाल नहीं पूछा जाएगा।”
डीडब्ल्यू ने अपनी रिपोर्ट में लिखा, “मोदी और शॉल्ट्स के संयुक्त पत्रकार सम्मेलन में पत्रकारों को सवाल पूछने की अनुमति नहीं दी गई। यह निर्णय प्रधानमंत्री मोदी की मांग पर लिया गया।”
जर्मनी यात्रा के एक साल बाद जून २०२३ में मोदी अमेरिका गए। उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के साथ पत्रकार सम्मेलन में मोदी ने पत्रकारों के दो सवालों के जवाब दिए।
पश्चिमी मीडिया ने इसे एक दुर्लभ घटना माना, हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति ऐसे खुला पत्रकार सम्मेलन विदेश नेताओं के साथ अक्सर नहीं करते।
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अमेरिका यात्रा में मोदी ने जवाब दिए थे
समाचार एजेंसी एपी के अनुसार, “भारतीय अधिकारियों ने एक दिन पहले ही इस कार्यक्रम के लिए सहमति दी थी। अमेरिकी प्रशासन के अधिकारियों ने मोदी के सलाहकारों को व्हाइट हाउस में होने वाले राजकीय दौरे के दौरान मीडिया के सवालों के जवाब देने की सूचना दी थी।”
नरेंद्र मोदी को पूछे गए दो सवालों में से एक भारतीय पत्रकार का था, जिसने जलवायु परिवर्तन के बारे में सवाल पूछा था, जबकि दूसरे सवाल में अमेरिकी पत्रकार ने मानवाधिकारों से संबंधित प्रश्न किया था।
मानवाधिकार और लोकतंत्र से संबंधित सवाल का जवाब देते हुए मोदी ने कहा था, “लोकतंत्र हमारी रग-रग में बसा है। हमारे लोकतंत्र में कोई भेदभाव की जगह नहीं है।”
प्रधानमंत्री मोदी के लिए पत्रकारों के सवालों के जवाब देना दुर्लभ है। प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत में भी उन्होंने पत्रकार सम्मेलनों में सवालों के जवाब नहीं दिए हैं। मई २०१९ में मोदी ने पत्रकार सम्मेलन किया था लेकिन किसी सवाल का जवाब नहीं दिया, उस समय अमित शाह ने सवालों का उत्तर दिया था।
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मोदी पत्रकार सम्मेलन क्यों नहीं करते?
साल २०२४ मई में इंडिया टुडे के साथ एक साक्षात्कार में मोदी से पत्रकार सम्मेलन न करने की शैली के बारे में पूछा गया था। मोदी ने उस पर विस्तार से जवाब दिया था।
“अधिकांश सत्ता में रहने वाले लोग मीडिया का इस्तेमाल अपनी तरफ करने के लिए करते हैं। यह यहां की एक संस्कृति बन चुकी है। उन्हें लगता है कि उन्हें कुछ खुद करने की जरूरत नहीं बस मीडिया का इस्तेमाल करो … मैं उस रास्ते पर नहीं चलना चाहता। मैं कड़ी मेहनत करना चाहता हूं। मैं गरीब जनता के दरवाजे तक पहुंचना चाहता हूं।”
मोदी ने दावा किया था कि उन्होंने ‘नई कार्यसंस्कृति’ शुरू की है और मीडिया न होते हुए भी जनता से सीधे संवाद कर सकते हैं।
पहले मीडिया कहीं खुलता नहीं था, लेकिन अब पत्रकार विचारों के करीब आने लगे हैं, यह मोदी का आरोप है।
“पहले लोग यह नहीं देखते थे कि विश्लेषक कौन है? उसकी विचारधारा क्या है? अब समय बदल गया है,” मोदी ने कहा।
लेकिन मोदी की यह दलील पत्रकार सम्मेलन क्यों नहीं करते इस सवाल का पूर्ण जवाब नहीं दे पाई है।
भारतीय विशेषज्ञ फ्रांसेसी राजनीतिक वैज्ञानिक क्रिस्टोफ जाफरलो ने ‘द डिप्लोमैट’ पत्रिका को बताया, “मोदी पत्रकार सम्मेलन या खुले संवाद स्वीकार नहीं करते क्योंकि उनकी तर्कों से भारत की वह तस्वीर बनती है जो वास्तविकता से मेल नहीं खाती।”
जाफरलो के अनुसार, मोदी एक खूबसूरत कल्पित दुनिया बना रहे हैं जो आकर्षक छवि पेश करती है।
मोदी चीन की आक्रामकता और भारत में फैली बेरोजगारी जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सवाल सुनना पसंद नहीं करते।
इसलिए मोदी के लिए मीडिया एकतरफा प्रवाह होना ही चाहिए।
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