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पानी अभावले ह्यात्रुङको सौन्दर्य संकटमा – Online Khabar

पानी की कमी से ह्यात्रुङ झरने का सौंदर्य संकट में

तेह्रथुम के फेदाप गाउँपालिका में स्थित ह्यात्रुङ झरना पानी की कमी के कारण संकट में है। स्थानीय लोगों ने झरने के ऊपर के जल स्रोतों के संरक्षण और वैज्ञानिक प्रबंधन की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है। पर्यटन विकास के लिए स्थानीय, प्रदेश और संघीय सरकार ने लगभग 8 करोड़ रुपैयाँ खर्च कर चुके हैं। 10 जेठ, तेह्रथुम। पहाड़ की गोद में सफेद पत्थर की तरह नीचे गिरता पानी, चारों ओर हरी-भरी जंगल और पक्षियों की मधुर आवाज से पूर्वी नेपाल का प्रसिद्ध पर्यटन स्थल ह्यात्रुङ झरना सभी पर्यटकों को इस प्रकृति की अनुपम सुंदरता से मंत्रमुग्ध कर देता है। समुद्र तल से लगभग 1500 मीटर की ऊँचाई पर स्थित ह्यात्रुङ झरना फेदाप गाउँपालिका-4 का सम्दु और वडा नंबर 5 के इसिबु गाँव की सीमा पर पड़ता है। झरना लगभग 365 मीटर की ऊँचाई से नीचे गिरता है और यह नेपाल का दूसरा तथा एशिया का चौथा सबसे ऊँचा झरना माना जाता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में पानी की कमी ने इस पर्यटन स्थल को संकट में डाल दिया है। वर्षा के मौसम में झरना पूरी ताकत से बहता है, जबकि सूखे मौसम में इसकी धार बहुत कम हो जाती है। झरने के ऊपर के जल स्रोत सूखने लगने, वर्षा के अनियमित होने, जलवायु परिवर्तन और जंगल क्षेत्र में बढ़ते दबाव के कारण स्थानीय लोग कहते हैं कि झरने के पानी के बहाव में गंभीर कमी आई है।

फेदाप गाउँपालिका-4 की स्थानीय देवी रेग्मी कहती हैं, ‘पहले पूरे साल बड़ी मात्रा में पानी बहता था। अब सूखे मौसम में झरने में पानी बहुत कम रह गया है।’ उनके अनुसार पानी के स्रोतों के संरक्षण पर ध्यान न दिया गया तो आने वाले दिनों में ह्यात्रुङ की प्राकृतिक सुंदरता ही संकट में पड़ सकती है। पानी की कमी के कारण कमजोर होती जा रही आकर्षण ह्यात्रुङ झरना केवल प्राकृतिक धरोहर नहीं, बल्कि पूर्वी नेपाल का एक उभरता पर्यटन केंद्र भी है। स्थानीय, प्रदेश और संघीय सरकारों ने मिलकर लगभग 8 करोड़ रुपये का पूर्वाधार निर्माण किया है। पर्यटकों को सुविधा देने के लिए सीढ़ियाँ, रेलिंग, चौतारे और पदमार्ग बनाए गए हैं। जोखिम वाले स्थानों पर सुरक्षा व्यवस्था भी लागू की गई है। झरने की आकर्षण बढ़ाने के लिए लगभग 350 मीटर लंबा झूला पुल निर्माणाधीन है। लेकिन सवाल उठता है – जब झरने में पानी कम हो रहा है, तो ये संरचनाएँ पर्यटन को कैसे संभाल पाएंगी?

पर्यटन विशेषज्ञ दिगो पर्यटन के लिए प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को सबसे पहली प्राथमिकता मानते हैं। उनका निष्कर्ष है कि केवल पूर्वाधार विकास से पर्यटन स्थायी नहीं हो सकता। ह्यात्रुङ झरना तक पहुंचना ही एक रोमांचक अनुभव है। मुख्य सड़क से झरने की ओर चढ़ाई-उतराई वाले रास्ते, जंगल के बीच पदमार्ग और सीढ़ियां पार करनी पड़ती हैं। अंतिम चरण में लगभग 15 मिनट नीचे उतरना होता है। झरने की आवाज़ पास आती हुई सुनकर पर्यटक की थकान दूर हो जाती है, जैसा कि स्थानीय आठराई-1 के तुलसी सीतौला बताते हैं। ‘झरने की असली सुंदरता तो वहां जाकर ही महसूस होती है। प्रकृति ने इतना खूबसूरत स्थान बनाया है, यह अनुभव होता है,’ वह कहते हैं। लेकिन स्थानीय लोगों के अनुसार, हाल के वर्षों में सूखे मौसम में झरने का स्वरूप बदल गया है। पानी की मात्रा घटने से पर्यटकों के अनुभव पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका बढ़ रही है।

संकट केवल पर्यटन तक सीमित नहीं है, जल संकट ने झरने की सुंदरता के साथ-साथ स्थानीय निवासियों की दैनिक जीवनशैली पर भी प्रभाव डाला है। खेतीबाड़ी, पशुपालन और दैनिक उपयोग के लिए पानी की कमी हो रही है, स्थानीय लोग यह बता रहे हैं। पानी के स्रोत कमजोर होने के कारण गांव की जीवनशैली में बदलाव आना शुरू हो गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि झरने के ऊपर के जल स्रोतों का संरक्षण, वृक्षारोपण, वन संरक्षण और वैज्ञानिक प्रबंधन अब तत्काल आवश्यक हो गया है।

ह्यात्रुङ झरने ने स्थानीय अर्थव्यवस्था में नई संभावनाएं भी उत्पन्न की हैं। पर्यटकों के आने से स्थानीय उत्पादों की बिक्री, चाय की दुकानें, छोटे होटल और होमस्टे चलाने के अवसर बढ़े हैं। युवा वर्ग भी पर्यटन क्षेत्र में संभावनाएं देखने लगे हैं। फेदाप गाउँपालिका-4 के वडा अध्यक्ष भेषराज चोंगबांग के अनुसार, ह्यात्रुङ को एक स्थायी पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की योजना आगे बढ़ रही है। केवल झरना देखने के बाद पर्यटक लौटने की बजाय, उन्हें लंबे समय तक रहने का माहौल देने के लिए होमस्टे, स्थानीय भोजन और सांस्कृतिक पर्यटन से जोड़ने की योजना बनाई गई है।

वर्षा के मौसम में बहने वाला ह्यात्रुङ झरना सूखे मौसम में कम होती धार से स्थानीय लोगों के लिए चिंता का विषय बन चुका है। प्रकृति का यह अनुपम उपहार बचाना है या इसका भविष्य देखना है, यही सवाल अब स्थानीय लोगों के सामने है।

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