
परिवार से निकाले जाने, आश्रम में यौन हिंसा और समाज में अपमान की कहानी
कंचनपुर के २७ वर्षीय खगेन्द्र राना जन्मजात मस्कुलर डिस्ट्रॉफी और समलैंगिक पहचान के कारण गंभीर भेदभाव झेल चुके हैं। खगेन्द्र वर्तमान में रेनबो डिसेबिलिटी नेपाल से जुड़े हैं और विकलांग तथा क्वियर समुदाय के लोगों को परामर्श प्रदान करते हैं। वे विकलांगता और यौनिक अल्पसंख्यकों के द्वंद्वपूर्ण भेदभाव के खिलाफ संघर्ष करते हुए आत्मनिर्भर बनने का प्रयास कर रहे हैं।
कंचनपुर के लालझाड़ी गांव में जन्मे खगेन्द्र बचपन से ही जीवन की कठोर हकीकतों का सामना कर रहे हैं। वे जन्मजात ‘मस्कुलर डिस्ट्रॉफी’ नामक अनुवांशिक रोग से पीड़ित हैं। यह रोग मांसपेशियों को धीरे-धीरे कमजोर करता है, पैरों के नसों को प्रभावित करता है और चलने-फिरने में गंभीर कठिनाई उत्पन्न करता है। जहाँ सामान्य बच्चे ९–१० महीनों में चलना शुरू कर देते हैं, खगेन्द्र डेढ़ वर्ष तक भी चल नहीं पाए। परिवार उन्हें अस्पताल लेकर गए, जहाँ वंशानुगत समस्या का पता चला। यह रोग ठीक नहीं होता, जीवन भर नियमित फिजियोथेरेपी और दवाई लेनी पड़ती है।
खगेन्द्र पाँच भाइयों में सबसे छोटे हैं। वे १५ वर्ष के थे जब उनके पिता का निधन हो गया। उसके बाद परिवार ने उन्हें कभी पूर्ण सदस्य के समान स्वीकार नहीं किया। घर के किसी भी फैसले में उनकी राय नहीं ली जाती थी। भाइयों की शादी के बाद रवैया और भी खराब हो गया। विकलांगता के कारण वे कक्षा ६ के बाद स्कूल नहीं गए। मां अकेले उनकी देखभाल नहीं कर सकीं और उन्हें धनगढ़ी के एक धार्मिक आश्रम भेज दिया गया। आश्रम में रहने, खाने और पढ़ाई की व्यवस्था थी, लेकिन वहां उनका जीवन भी आसान नहीं था। विकलांग होने की वजह से और महिलाओं जैसा व्यवहार दिखाने पर कई बार अपमान और दुर्व्यवहार झेलना पड़ा।
किशोरावस्था में आश्रम के एक वरिष्ठ व्यक्ति ने उन्हें जब मौका मिला तो यौन दुर्व्यवहार किया। उस समय उन्हें अपनी लैंगिक पहचान का ज्ञान नहीं था और न ही किसी से बात करने का साहस था। आश्रम में कोई व्यक्तिगत कमरा नहीं था, सब लोग हॉल में सोते थे। उस घटना ने उन्हें सालों तक पीड़ित किया। शारीरिक, मानसिक और यौन हिंसा सहते हुए उन्होंने आश्रम में रहकर प्लस टू तक की पढ़ाई पूरी की। कोरोना महामारी के दौरान दीदी द्वारा दिया गया सेकेंड हैंड मोबाइल उनके जीवन का नया मार्ग खोलकर आया।
फेसबुक चलाने के बाद वे यौनिक और लैंगिक अल्पसंख्यक समुदाय के साथियों से मिले। दोस्तों के सहयोग से वे धनगढ़ी की ऐसी संस्था तक पहुंचे जो इस क्षेत्र के लिए काम करती है और अपनी पहचान समझने लगे। ‘‘वहाँ सरों द्वारा दी गई ओरिएंटेशन के बाद समझ आया कि मैं गे हूं,’’ वे कहते हैं, ‘‘यह मेरा यौन अभिमुखीकरण है, कोई गलती या बीमारी नहीं।’’ इसके बाद वे चितवन के एक अन्य आश्रम में एक वर्ष रहे, लेकिन वहां भी उनका अपमान और दुर्व्यवहार हुआ।
आखिरकार वे धनगढ़ी लौट आए। फेसबुक के माध्यम से विकलांगता अधिकारों से जुड़े। तीन महीने की कृषि कौशल प्रशिक्षण ली। इसी दौरान आदित्य राई से उनकी मुलाकात हुई। आदित्य द्वारा संचालित ‘‘रेनबो डिसेबिलिटी नेपाल’’ संस्था विकलांगता और यौनिक तथा लैंगिक अल्पसंख्यक क्षेत्रों में कार्यरत है। २०८० के आसपास वे ३ हजार रूपये लेकर काठमांडू गए। शुरू में संस्था के ही ऑफिस में सोते थे।
काठमांडू आने के बाद एक घटना उन्हें और भावुक बना देती है। फेसबुक पर बनाए गए समलैंगिक दोस्त से नियमित बातचीत होती थी। मिलने का निर्णय हुआ। खगेन्द्र अपनी विकलांगता की बात नहीं करते थे। मिलने के दिन दोस्त को लकड़ी का सहारा लेते देखकर अपमानजनक शब्द कहे गए, ‘‘साले ऑटिज्म भी निकला।’‘ उस शब्द ने उनका दिल तोड़ दिया। आदित्य के व्यक्तिगत और संस्थागत सहयोग से नियमित फिजियोथेरेपी और दवाइयां सहज हुईं।
अब वे ‘‘रेनबो डिसेबिलिटी नेपाल’’ में प्री–एजुकेटर के रूप में कार्यरत हैं। विकलांग और क्वियर पहचान वाले व्यक्तियों को परामर्श देते हैं और उनका अकेलापन दूर करने का प्रयास करते हैं। हालांकि यह परियोजना २०८२ दिसंबर में समाप्त हो रही है, जिसके बाद बेरोजगारी का डर है। विकलांगता परिचय पत्र से मिलने वाले तीन महीने के ६००० रुपए केवल दवाइयों में ही खर्च हो जाते हैं। परिवार ने आज भी उनकी मौजूदगी को स्वीकार नहीं किया है।
मां के अलावा कोई भाई-बहन उनसे बात नहीं करते। बहुएं कहती हैं, ‘‘छक्कों के संगत करने से ऐसा हुआ।’‘ खगेन्द्र कहते हैं, ‘‘सबसे मुश्किल बात समाज की सोच है—‘तुम ऐसे हो, कैसे जियोगे, कैसे कमाओगे?’ मैं भी सब की तरह इंसान हूं, मुझे प्यार, सम्मान और अवसर चाहिए।’’ आज वे ऐसे ही विकलांग और क्वियर युवाओं की मदद कर रहे हैं। उनकी आत्मविश्वास बढ़ाने और उनके अधिकारों के लिए संघर्ष में सहयोगी बने हुए हैं।
‘‘भले ही जितनी भी हिंसा, बहिष्कार और अपमान झेलना पड़े, आत्मसम्मान और संघर्ष कभी हार नहीं मानते,’’ वे कहते हैं।