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न्यून बजट के कारण रेलवे विकास धीमी गति से हो रहा है – Space4k Television News Update
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न्यून बजट के कारण रेलवे विकास धीमी गति से हो रहा है

समाचार सारांश

  • सरकार ने आगामी आर्थिक वर्ष २०८३/८४ के लिए रेल, मेट्रोरेल और मोनोरेल विकास परियोजनाओं के लिए ३ अरब ७ करोड़ ६८ लाख रुपये आवंटित किए हैं।
  • शुरुआती लागत ७० अरब ६२ करोड़ की रेलमार्ग परियोजना की संशोधित कुल लागत ९ खरब ५५ अरब २२ करोड़ रुपये हो गई है।
  • नेपाल–चीन अंतरराष्ट्रीय केरुंग–काठमांडू रेलमार्ग के संभाव्यता अध्ययन के तहत फागुन तक भूवैज्ञानिक अन्वेषण लगभग ९० प्रतिशत पूरा हो चुका है।

२९ जेठ, काठमांडू। सरकार ने आगामी आर्थिक वर्ष २०८३/८४ में रेल, मेट्रोरेल और मोनोरेल विकास परियोजनाओं के लिए मात्र ३ अरब रुपये आवंटित किए हैं।

इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास मंत्रालय के वार्षिक विकास कार्यक्रम के अनुसार आगामी वर्ष में रेल विकास के लिए ३ अरब ७ करोड़ ६८ लाख रुपये आवंटित किए गए हैं।

इसमें राष्ट्रीय गौरव की रेल, मेट्रोरेल और मोनोरेल विकास परियोजना के तहत काठमांडू को २ अरब ७९ करोड़ रुपये दिए गए हैं। रेलवे योजना कार्यालय झापा को ५ करोड़ तथा सर्लाही को २३ करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं।

सरकार ने वर्तमान आव में रेल, मेट्रोरेल एवं मोनोरेल विकास परियोजनाओं के लिए २ अरब ६९ करोड़ ३६ लाख रुपये आवंटित किए थे और आगामी वर्ष में इसे सामान्य वृद्धि दी गई है।

बजट भाषण में सरकार ने बर्दीवास से काठमांडू–तराई मधेस तेजमार्ग के प्रारंभिक बिंदु तक रेलमार्ग निर्माण को आगे बढ़ाने का उल्लेख किया है। साथ ही, निर्माणाधीन बथनाहा–विराटनगर और जनकपुर–जयनगर–बर्दीवास रेलमार्गों के शेष कार्यों को पूरा करने के लिए भी बजट आवंटन किया गया है।

सरकार की आगामी नीति कार्यक्रम में पूर्व–पश्चिम रेलमार्ग को निरंतरता देने की योजना है। केरुंग–काठमांडू और रक्सौल–काठमांडू रेलमार्ग की निवेश मोडालिटी संबंधी अध्ययन भी आगे बढ़ाया जाएगा। हालांकि, नेपाल की रेल परियोजनाओं में अब तक वेग से पर्याप्त प्रगति नहीं हुई है।

नेपाल में पहली बार रेल सेवा संचालित हुए एक शताब्दी पूरा हो चुका है। सन् १९२७ में अमलेखगंज–रक्सौल ४८ किलोमीटर लंबे रेलवे मार्ग को नेपाल की पहली रेल सेवा माना जाता है। यह सेवा सन् १९६० के दशक में बंद हो गई थी। बाद में सन् १९३७ से भारत के जयनगर से नेपाल के जनकपुर–बिजलपुरा तक ५१ किलोमीटर लंबी दूसरी रेल सेवा शुरू हुई, जो लंबे समय तक चली।

बंद हुई उक्त रेल सेवा का पुनर्निर्माण २०७८ साल से शुरू होकर पूरा हुआ और पुनः संचालन में आ गई है। लेकिन चुस्त प्रबंधन की कमी के कारण यह सेवा संतोषजनक राजस्व नहीं कमा पाई है और बाकी प्रोजेक्ट्स भी धीमी गतिशीलता से हैं।

रेल विकास की हाल की प्रगति इस प्रकार है

आर्थिक सर्वेक्षण २०८२/८३ के अनुसार पूर्व–पश्चिम विद्युत रेलमार्ग के तहत २०८२ फागुन तक बर्दीवास–निजगढ रेलमार्ग (५२ किलोमीटर) के बर्दीवास चोचा खंड में ६८.६ किलोमीटर ट्रैक बेड और १६ रेलवे पुल का निर्माण पूरा किया गया है।

नेपाल–भारत अंतरराष्ट्रीय रेलमार्ग के तहत निर्माणाधीन जयनगर–जनकपुर–बर्दीवास (६९ किलोमीटर) रेलमार्ग में ५२ किलोमीटर यात्री रेल सेवा संचालित है।

साथ ही १७ किलोमीटर लंबा भंगाहा (बिजलपुरा)–बर्दीवास खंड रेलमार्ग का निर्माण के लिए भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया लगभग समाप्त हो चुकी है। बथनाहा–विराटनगर (१८ किलोमीटर) रेलमार्ग का बथनाहा–विराटनगर (१० किलोमीटर) खंड का निर्माण पूरा हो चुका है और भारत के बथनाहा से नेपाल कस्टम यार्ड तक (८ किलोमीटर) कार्गो रेल सेवा शुरू होने वाली है।

नेपाल–चीन अंतरराष्ट्रीय केरुंग–काठमांडू रेलमार्ग की संभाव्यता अध्ययन के अंतर्गत इस आर्थिक वर्ष फागुन तक भूगर्भीय अन्वेषण लगभग ९० प्रतिशत पूरा हो चुका है।

९ खरब की संशोधित लागत, बजट से प्रगति की उम्मीद नहीं

रेलवे तथा मेट्रो विकास परियोजना राष्ट्रीय गौरव की परियोजना है। सरकार ने यह परियोजना २०६५/६६ से शुरु की है और राष्ट्रीय योजना आयोग के अनुसार इसे २०८६/८७ तक पूरा करना है।

शुरुआती लागत ७० अरब ६२ करोड़ रुपये थी, जो अब संशोधित होकर ९ खरब ५५ अरब २२ करोड़ रुपये हो गई है। आयोग के अनुसार पूर्व–पश्चिम विद्युत रेलमार्ग क्षेत्र विस्तार के कारण लागत में वृद्धि हुई है।

इतनी बड़ी लागत के बावजूद सरकार द्वारा हर वर्ष किए जा रहे आवंटन से रेलमार्ग विकास में अपेक्षित प्रगति का संकेत नहीं मिलता।

पूर्व मेची से पश्चिम महाकाली तक तराई क्षेत्र में पर्यावरण मित्रतापूर्ण परिवहन के रूप में रेलमार्ग विकसित कर, देश में निर्मित जलविद्युत से रेल सेवा चलाने का उद्देश्य सरकार का है।

रेल यातायात सस्ता होने के कारण यह माल और यात्रियों की आवाजाही की लागत को काफी कम करता है। पूर्व–पश्चिम रेलमार्ग में ट्रैक बेड, पुल, रेलवे स्टेशन समेत संरचनात्मक और क्षमता वृद्धि योजनाएं शामिल हैं।

फिर भी, जमीन अधिग्रहण, पुनर्वास और मुआवजे के विवाद, वन क्षेत्र में निर्माण की जटिलताएं, वित्तीय एवं संसाधन सीमाएं, नदीजन्य सामग्री की कमी, सार्वजनिक भूमि और उपयोग संबंधी समस्याओं के कारण परियोजना में तेजी नहीं आई है।

केरुंग–काठमांडू और रक्सौल–काठमांडू रेलमार्ग की स्थिति क्या है?

नेपाल दो अंतरराष्ट्रीय रेलमार्गों को हर साल अपनी बजट और योजनाओं में प्राथमिकता देता रहा है। इनमें से काठमांडू–केरुंग (चीन) रेलमार्ग के अंतिम अध्ययन रिपोर्ट अभी तैयार हो रही है।

इस परियोजना के संभाव्यता अध्ययन के तहत स्थलकार्य पूरा हो चुका है और वर्तमान में कागजी कार्य प्रगति पर है। यह रिपोर्ट परियोजना के कार्यान्वयन के लिए दूरी, समय और लागत जैसे तकनीकी पक्ष निर्धारित करेगी। शुरुआती लागत लगभग ३ खरब रुपये आंका गया है।

चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने चैत २०७८ में नेपाल दौरे के दौरान दो देशों के बीच इस परियोजना के संभाव्यता अध्ययन के लिए समझौता किया था।

रक्सौल–काठमांडू रेलमार्ग का विस्तृत परियोजना रिपोर्ट भारतीय पक्ष ने तैयार किया है। कुल १४० किलोमीटर लंबा यह प्रोजेक्ट २०१८ में नेपाल और भारत के बीच सहमति के बाद शुरू हुआ था। इस परियोजना की लागत अनुमानित ४ खरब रुपये से अधिक है।

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