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सरकार के सहयोग के बिना सहकारी बचत वापस पाना कठिन

३ असार, काठमाडौं। सरकार द्वारा स्थापित चक्रीय कोष के माध्यम से सहकारी पीड़ितों को अपनी बचत वापस पाने के लिए संबंधित सहकारी को समस्याग्रस्त घोषित किया जाना कानूनी रूप से आवश्यक है। लेकिन वर्षों से बचतकर्ताओं की रकम ठगी करने वाले सहकारी संस्थाओं को समस्याग्रस्त घोषित करने में सरकारी निकायों ने स्वयं असहयोग किया है। सहकारी को समस्याग्रस्त घोषित करने के बाद संचालकों की संपत्ति को बेचकर रकम वसूलने का मार्ग खुलता है, इसलिए सहकारी संचालकों के प्रभाव में समस्याग्रस्त घोषित करने का निर्णय समय पर नहीं होता। इसका स्पष्ट उदाहरण जीबी राई के सहकारी हैं। राई के समूह ने एक दर्जन से अधिक सहकारी के माध्यम से २१ अरब से अधिक रकम ठगी की है। राई स्वयं कई वर्षों से फरार हैं। लेकिन उनका जुड़ा हुआ केवल ‘हाम्रो कृषि’ नामक सहकारी ही समस्याग्रस्त घोषित हुआ है, जबकि अन्य सहकारी अभी तक समस्याग्रस्त घोषित नहीं हुए हैं।

समस्याग्रस्त घोषित करना ही समस्याग्रस्त सहकारी की संपत्ति बेचकर बचत वापस पाने का एक मात्र उपाय है। सहकारी संस्थाएं बचत वापस नहीं कर पा रहीं हैं और संचालक वित्तीय अपचलन कर सम्पर्कहीन हो गए हैं, ऐसी स्थिति में बचत वापस पाने का कानूनी आधार केवल समस्याग्रस्त घोषणा ही है। सरकार भी सहकारी संस्थाओं को पुनः संचालित करने के बजाय दामासाही के माध्यम से बचतकर्ताओं का पैसा वापस कर हिसाब साफ करने की दिशा में काम कर रही है। समस्याग्रस्त घोषित होने पर संचालक गिरफ्तार होते हैं और उनकी संपत्ति बेची जाती है, इस कारण राजनीतिक और राज्य के विभिन्न निकायों के अधिकारी प्रलोभन लेकर अपना पक्ष बनाने का प्रयास करते हैं, जो पीड़ित बचतकर्ताओं की शिकायत है।

एक पीड़ित ने बताया कि संचालकों को राजनीतिक संरक्षण मिलने के कारण बचतकर्ताओं को समस्या झेलनी पड़ रही है। ‘वसूली का सबसे मजबूत आधार केवल संस्थान का समस्याग्रस्त घोषित होना है,’ वह बचतकर्ता कहते हैं, ‘राज्ययंत्र भी उन सहकारी ठगों के प्रभाव में आकर बचतकर्ताओं को और पीड़ा दे रहा है।’ कानूनी तौर पर सहकारी संस्थाओं के २५ सदस्यों द्वारा बचत रकम वापस न करने पर रजिस्ट्रार के समक्ष शिकायत करने पर समस्याग्रस्त घोषित करने की सिफारिश की जा सकती है। लेकिन सदस्य शिकायत के आधार पर समस्याग्रस्त घोषित करने की मांग करने पर मंत्रालय, विभाग और राष्ट्रीय सहकारी नियमन प्राधिकरण जैसे निकाय फाइल को वापस कर देते हैं, ऐसा पीड़ितों का आरोप है।

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