
अमेरिका कैसे खुद बनायी गई ‘भयावह स्थिति’ में फंसा?
मध्य पूर्व में जारी द्वंद्व के कारण अमेरिका ऐतिहासिक रणनीतिक हार के करीब पहुंच चुका है, ऐसा विश्लेषकों का कहना है। ईरान स्ट्रेट ऑफ हर्मुज पर अपने वर्चस्व को कायम रखते हुए अमेरिकी दबाव और संभावित सैन्य कार्रवाई का सामना करने की तैयारी कर रहा है। खाड़ी के देशों ने क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता के लिए तेहरान के साथ द्विपक्षीय वार्ता को आगे बढ़ाने के साथ-साथ रक्षात्मक गठबंधन की नींव रखी है। २१ सावन, काठमांडू।
मध्य पूर्व के विश्लेषकों के अनुसार अमेरिका ऐतिहासिक ‘रणनीतिक हार’ के बहुत करीब है। अमेरिका ने इज़राइल के उकसावे पर ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू किया था, और यह युद्ध अब पांच महीने से अधिक समय से जारी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार धमकियाँ देते हुए भी समझौते की उम्मीद जताते रहे हैं, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि ईरान स्ट्रेट ऑफ हर्मुज पर अपने नए वर्चस्व को छोड़ने वाला नहीं है।
स्ट्रेट ऑफ हर्मुज पर नियंत्रण छोड़ना विश्व अर्थव्यवस्था से पकड़ खोने जैसा होगा। सैन्य रूप से संभव न होने वाले इस युद्ध में ईरान के लिए यही सबसे बड़ा हथियार है। ईरान ने अमेरिकी प्रशासन के साथ १७ जून को हुए समझौते (मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग) की समाप्ति का संकेत दिया है, इसलिए वह ट्रंप प्रशासन की संभावित सैन्य कार्रवाई को सहने के लिए तैयार है। ईरान ने आत्मसमर्पण नहीं किया है। रिवोल्यूशनरी गार्ड्स और उनके ‘एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस’ सहयोगियों ने द्वंद्व को और बढ़ावा दिया है।
सऊदी अरब, जॉर्डन और मिस्र अब ईरान के निशाने पर हैं। अगला लक्ष्य सीरिया हो सकता है। बुधवार देर शाम ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माईल बघाई ने बयान जारी किया है जिसमें उन्होंने ओमान के साथ जलमार्ग पुनः खोलने की वार्ता को ‘दूरदर्शी’ बताया है। उन्होंने कहा कि ‘यदि कोई तीसरा पक्ष इस प्रक्रिया में बाधा न डाले तो’ समझौता संभव होगा।
वाशिंगटन की जोखिम सलाहकार संस्था, गल्फ स्टेट एनालिटिक्स के सीईओ जॉर्जियो क्याफिएरो के अनुसार ट्रंप प्रशासन ‘खुद बनायी गई अत्यंत कठिन स्थिति’ में फंस चुका है। उन्होंने कहा कि वाशिंगटन के सामने दो विकल्प हैं – पहला, अमेरिका उस युद्ध को जारी रखे जो जीतना संभव नहीं है, और दूसरा, राष्ट्रपति ट्रंप के लिए बड़ा राजनीतिक नुकसान होने के बावजूद कूटनीतिक समझौता स्वीकार करना।
इबिस के अनुसार यह अमेरिकी वैश्विक शक्ति के पतन का पहला बड़ा कदम होगा। १९५६ में ब्रिटेन और फ्रांस ने इज़राइल के साथ मिलकर सुएज नहर पर नियंत्रण किया था, जिसके बाद उनकी एतिहासिक गिरावट शुरू हुई थी। अमेरिका की भी स्थिति ऐसी ही होगी। इबिस ने कहा है कि युद्ध बढ़ाने से ‘ईरान के खिलाफ अनिश्चितकालीन और आक्रामक घेराबंदी की नई संरचना’ बनेगी।
मध्य पूर्व में इस तरह के द्वंद्व की बुनियाद तैयार हो रही है। इराक क्षेत्र का दूसरा सबसे बड़ा तेल निर्यातक देश है। वर्तमान में इराक, सऊदी अरब और जॉर्डन के खिलाफ ड्रोन और मिसाइल हमलों का केंद्र बना हुआ है। ये हमले लड़ाकू समूह कर रहे हैं जो कागज पर इराकी सेना के हिस्से हैं, लेकिन उन्हें ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स से हथियार और नेतृत्व प्राप्त है।
सऊदी अरब ने अपनी तटस्थ नीति छोड़ दी है। उसने २९ जुलाई को अपनी ऊर्जा अवसंरचना पर हुए ड्रोन हमले का जवाब दिया है। उसने अमेरिका के साथ मिलकर इराक में ईरान समर्थक लड़ाकू समूहों के खिलाफ संयुक्त हवाई हमले किए हैं। ईरान और उसके ‘एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस’ सहयोगी अपनी रणनीति लागू करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
इससे ईरान की ‘बहुत सस्ती लेकिन बेहद प्रभावी’ ड्रोन तकनीक के सामना करने में मदद मिलेगी। ईरान इन देशों को युद्ध में अमेरिका के सहयोगी के रूप में देखता है। सऊदी युवराज मोहम्मद बिन सलमान ने रविवार को हस्तक्षेप कर ट्रंप को तेहरान के खिलाफ तनाव बढ़ाने से रोकने की कोशिश की थी।
इबिस के अनुसार जीसीसी देशों ने एक बात समझ ली है कि ईरान उनके खिलाफ हमला करके विश्व अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित कर रहा है। वह ‘किसी भी कीमत पर युद्ध समाप्त करने’ के लिए अमेरिका पर भारी दबाव डाल रहा है। यह स्थिति ‘जिसका वे पहले अनुमान लगा चुके थे लेकिन रोक नहीं सके’ एक बड़ी विपत्ति है।
इबिस के मुताबिक, जीसीसी सदस्यों के लिए इसका प्रभाव कम करने का एकमात्र उपाय यह है कि वे तेहरान के साथ अपनी द्विपक्षीय वार्ता को विकसित करें और वाशिंगटन के साथ संबंधों को भी बनाए रखें।
सऊदी अरब ने रेड सी, बाब अल-मंडेब स्ट्रेट और गल्फ ऑफ एडेन में जहाजों के संचालन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए एक बहुराष्ट्रीय समुद्री रक्षा गठबंधन स्थापित करने की योजना घोषित की थी। क्याफिएरो ने कहा, ‘‘फ़रवरी के अंत से यह संकट लंबा और फैल रहा है, जिससे रियाद के दृष्टिकोण में बदलाव आया है।’’
सऊदी अरब कूटनीति को प्राथमिकता दे रहा है, लेकिन उसने आक्रमण रोकने के लिए मापित सैन्य प्रतिक्रिया देने की ‘मजबूत इच्छा’ भी दिखाई है। इबिस के अनुसार खाड़ी के देश ईरान के साथ युद्ध में बड़ी चपेट में आना नहीं चाहते, लेकिन किसी न किसी मोड़ पर ‘उन्हें सहना पड़ सकता है और इसमें शामिल होना होगा’।
(South China Morning Post से)