
सरकार पर राष्ट्र बैंक की स्वायत्तता का अपमान करने का आरोप
समाचार सारांश समीक्षा की गई सामग्री। प्रधानमंत्री और अर्थमंत्री ने नेपाल राष्ट्र बैंक की स्वायत्तता की अवहेलना करते हुए गवर्नर की अनुपस्थिति में बैंक के कार्यकारी निदेशकों और बैंकरों के साथ सीधे बैठक की है। अर्थमंत्री डॉ. स्वर्णिम वाग्ले ने डिप्टी गवर्नर की सिफारिश के लिए राष्ट्र बैंक के कार्यकारी निदेशकों के साथ सामूहिक साक्षात्कार जैसी बैठक कर कानून की भावना के विपरीत कार्य किया है। पूर्व गवर्नरों ने सरकार की हालिया गतिविधियों को केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता पर चोट पहुंचाने वाला बताया है और कहा है कि ऐसी शासनशैली ने वित्तीय प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा किया है। २१ साउन, काठमांडू। प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह और अर्थमंत्री डॉ. स्वर्णिम वाग्ले के बीच चल रही राजनीतिक असहमति के बीच सरकार ने केन्द्रीय बैंक की स्वायत्तता का मज़ाक उड़ाना शुरू कर दिया है। नेपाल राष्ट्र बैंक अधिनियम सहित वित्तीय कानून और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय भी केंद्रीय बैंक को स्वायत्तता प्रदान करते हैं और सरकारी हस्तक्षेप को रोकते हैं। लेकिन अर्थमंत्री डॉ. वाग्ले ने राष्ट्र बैंक के नियामक अधिकारियों के साथ ही गवर्नर और डिप्टी गवर्नर के बाद तृतीय स्थान के राष्ट्र बैंक के कार्यकारी निदेशकों के साथ भी सीधे बैठक और चर्चा की है। इसी तरह कुछ समय पहले उद्योग, वाणिज्य एवं आपूर्ति मंत्री गौरीकुमारी यादव ने भी राष्ट्र बैंक के डिप्टी गवर्नर तथा बैंक के सीईओ के साथ सीधे वार्ता की बात सामने आई है। प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने उद्योगपतियों से चर्चा में अर्थमंत्री को शामिल न करने का इशारा किया, उसी तरह अर्थमंत्री डॉ. वाग्ले ने भी वाणिज्य बैंक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के साथ चर्चा करते समय नियामक राष्ट्र बैंक के गवर्नर और डिप्टी गवर्नर को शामिल नहीं किया था।
पूर्व गवर्नर विजयनाथ भट्टराई ने कहा है कि यह प्रक्रिया नियमित अभ्यास से अलग होने के कारण भरोसा करने लायक नहीं है। उन्होंने कहा, ‘परिणाम आने तक कोई निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए, लेकिन असामान्य गतिविधियां हो रही हैं।’ अर्थमंत्री ने राष्ट्र बैंक नेतृत्व के बिना कार्यकारी निदेशकों और बैंकरों से बात करना इसलिए किया होगा क्योंकि वे स्पष्ट रूप से बोलने से डरते हों। तथापि, वित्तीय क्षेत्र के प्रतिनिधि चर्चा में केंद्रीय बैंक के प्रतिनिधि को आवश्यक न मानना प्राकृतिक नहीं है, ऐसा पूर्व गवर्नर विजयनाथ भट्टराई ने कहा। उन्होंने बताया कि अर्थमंत्री ने न केवल बैंक के कार्यकारी निदेशकों के साथ बैठक की, बल्कि प्रधानमंत्री के सचिवालय ने भ्रष्टाचार निरोधक आयोग के अधिकारियों को धमकाकर उनसे काम करवाया, जो संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन है, यह पूर्व गवर्नर एवं राष्ट्रीय योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष दीपेन्द्र बहादुर क्षेत्री ने बताया। ‘संवैधानिक संस्थाओं के प्रमुख को यदि आवश्यक हो तो पाँच वर्ष तक भी बंद कर सकते हैं, ऐसा प्रधानमंत्री ने बताया है,’ क्षेत्री ने कहा, ‘ऐसी कार्यशैली में स्वायत्तता का प्रश्न ही नहीं उठता।’ उन्होंने प्रक्रिया और विधि विहीन काम करने का आरोप लगाया।
नेपाल राष्ट्र बैंक अधिनियम २०५८ ने व्यवहार में राष्ट्र बैंक को स्वायत्त निकाय साबित किया है, यह पूर्व गवर्नर तिलक रावल ने बताया। उन्होंने कहा, ‘लेकिन अधिनियम में लिखी बातें ही स्वायत्तता नहीं देतीं, यह संस्था के नेतृत्व पर भी निर्भर करता है।’ उन्होंने कहा कि वर्तमान सरकार ने आश्चर्यजनक गतिविधियां की हैं। बुधवार को कार्यकारी निदेशकों के साथ चर्चा में अर्थमंत्री डॉ. वाग्ले ने कहा था कि वे डिप्टी गवर्नर की सिफारिश के लिए उनसे बैठक कर रहे हैं। लेकिन राष्ट्र बैंक अधिनियम के अनुसार डिप्टी गवर्नर की सिफारिश गवर्नर का अधिकार होता है। धारा १६ के अनुसार गवर्नर की सिफारिश पर सरकार डिप्टी गवर्नर नियुक्त करती है। इस प्रक्रिया में अर्थ मंत्रालय की भूमिका केवल राष्ट्र बैंक की सिफारिश को मंत्री परिषद तक पहुंचाना है। तथापि, डिप्टी गवर्नर नियुक्ति प्रक्रिया में अर्थ मंत्रालय की सक्रियता पुरानी प्रथा है। लेकिन अर्थमंत्री वाग्ले ने नया अभ्यास करते हुए कार्यकारी निदेशकों को अर्थ मंत्रालय बुलाकर सामूहिक साक्षात्कार जैसी बैठक कराई है।
नेपाल राष्ट्र बैंक के कार्य में सरकार का प्रतिनिधित्व तथा संदेश पहुंचाने के लिए अर्थ सचिव को संचालन समिति का सदस्य बनाना कानून में है। लेकिन अर्थमंत्री और उद्योग मंत्री ने राष्ट्र बैंक के आंतरिक कर्मचारी प्रबंधन एवं नियमन पर सीधे हस्तक्षेप कर बैठकें और निर्देश दिए हैं। इसी तरह सचिव बोर्ड में रहते हुए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने सरकार के हस्तक्षेप की आशंका जाहिर करते हुए अर्थ सचिव को राष्ट्र बैंक के संचालक बनाने से बचाने की सलाह दी है। संसद के अर्थ समिति की बैठक में सत्तारूढ़ रास्वपा के सांसदों ने भी ऐसे प्रावधान को अस्वीकार किया है और स्वायत्तता बनाए रखने की मांग की है।
राष्ट्र बैंक के गवर्नर और डिप्टी गवर्नर का कार्यकाल अधिनियम में निश्चित रूप से पाँच वर्ष का है। सरकार अपनी इच्छा से गवर्नर को हटा नहीं सकती। पहले तिलक रावल, महाप्रसाद अधिकारी सहित अन्य को हटाने का प्रयास हुआ, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें बहाल किया था। अधिनियम की धारा २२ के अनुसार गवर्नर को केवल गंभीर असक्षम्यता या अनियमितता के आधार पर ही पदमुक्त किया जा सकता है। यदि पदमुक्त करना पड़े तो सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश के नेतृत्व में जांच समिति बनानी होती है और उसकी सिफारिश अनिवार्य है। अधिनियम की धारा ३ के अनुसार बैंक एक अविछिन्न स्वशासित संस्था है, जो कानूनी रूप से अलग है तथा स्वतंत्र रूप से अपने उद्देश्य पूरे करता है। अधिनियम की धारा ७ के अंतर्गत पूरे देश की मौद्रिक नीति के निर्माण, कार्यान्वयन और प्रबंधन के पूर्ण अधिकार राष्ट्र बैंक के पास हैं। ब्याज दर, मुद्रा आपूर्ति और ऋण नियंत्रण पर बैंक स्वतंत्र निर्णय ले सकता है। इसी तरह विदेशी मुद्रा दर और मुद्रा भंडार के प्रबंधन का अधिकार भी बैंक को है। अधिनियम की धारा ४ के अनुसार बिना नकारात्मक प्रभाव डाले सरकार की आर्थिक नीति का सहयोग करना बैंक का कर्तव्य है। अधिनियम की धारा १०६ के तहत नेपाल सरकार मुद्रा, बैंकिंग और वित्त क्षेत्र में निर्देश दे सकती है, और उनका पालन करना बैंक का दायित्व है। पूर्व गवर्नर क्षेत्री ने बताया कि इस धारा को पहले हटाया गया था, फिर दोबारा जोड़ा गया, जो केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता के लिए बाधक है। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसलों ने स्पष्ट किया है कि केंद्रीय बैंक को सरकार के हस्तक्षेप से मुक्त रहना चाहिए।