
न ना व्यक्ति संवेदनशील हैं, न ही जिम्मेदार संस्थाएं — डेटा सुरक्षा एवं गोपनीयता का गंभीर संकट
समाचार सारांश
समीक्षा की गई।
- नेपाल में सरकारी और निजी क्षेत्र की संस्थाओं द्वारा नागरिकों के व्यक्तिगत विवरण लीक होने से गोपनीयता और डिजिटल सुरक्षा पर गंभीर सवाल उठे हैं।
- पद्मकन्या कॉलेज ने स्नातक स्तर के १३६४ विद्यार्थियों के शैक्षिक विवरण सोशल मीडिया पर सार्वजनिक किए जाने के बाद डेटा सुरक्षा पर पुनः बहस शुरू हुई।
- साइबर ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक हाल के समय में इलेक्ट्रॉनिक अपराध और साइबर धोखाधड़ी की शिकायतें लगातार उच्च स्तर पर हैं।
२२ साउन, काठमांडू – त्रिभुवन विश्वविद्यालय के तहत स्नातक प्रथम वर्ष की परीक्षा जारी है। पिछले सप्ताह प्रवेश पत्र वितरण के लिए कॉलेज सक्रिय थे।
लेकिन, विद्यार्थियों को सही ढंग से प्रवेश पत्र देने की कोशिश में डेटा सुरक्षा और गोपनीयता की अनदेखी देखी गई।
बागबजार स्थित पद्मकन्या कॉलेज ने सोशल मीडिया पर १३६४ विद्यार्थियों के प्रवेश पत्र सहित डाटा सार्वजनिक कर दिया। सूचनाएं सार्वजनिक होने के बाद कॉलेज ने पोस्ट हटाया, फिर भी विद्यार्थी QR कोड स्कैन कर शैक्षिक विवरण आसानी से प्राप्त कर सके।
इस तरह डाटा लीक होने के बावजूद पद्मकन्या प्रशासन ने इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया। कॉलेज प्रमुख जयालक्ष्मी प्रधान ने इसे ‘विद्यार्थियों की सुविधा के लिए एक पवित्र उद्देश्य’ बताया। जबकि अन्य कर्मचारियों ने कहा, ‘जब फोटो और नाम है, तो यह कम संवेदनशील है’।
पद्मकन्या प्रशासन का दावा है कि केवल वे ही नहीं, बल्कि अन्य शैक्षिक संस्थान भी ऐसा कर रहे हैं। एक कर्मचारी ने कहा, ‘हम ही नहीं, दूसरे कॉलेज भी ऐसा कर रहे हैं।’ यह शैक्षिक संस्थानों के नेतृत्व में डेटा संवेदनशीलता की कमी को दर्शाता है।
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कुछ हफ्ते पहले नेपाल की डिजिटल सुरक्षा क्षेत्र में एक गंभीर घटना सामने आई। सॉफ़्टवेयर डेवलपर निर्देश सुवेदी ने बताया कि सरकार द्वारा जारी ‘नागरिक ऐप’ के आधिकारिक वेब पोर्टल की हूबहू क्लोन वेबसाइट उन्होंने अपनी डोमेन पर होस्ट की थी।
सुवेदी ने अपनी वेबसाइट पर नागरिक एप के पुराने इंटरफेस का उपयोग किया था। जब उपयोगकर्ता ‘नागरिक एप लॉगिन’ खोजते थे, तो परिणाम में उनका डोमेन शीर्ष पर आता था। गूगल क्रोम ने सुरक्षा चेतावनी के साथ इसे ‘खतरनाक’ लिंक बताया।
नागरिक एप में नागरिकता, पासपोर्ट, पैन कार्ड व शैक्षिक प्रमाणपत्र जैसे अत्यंत संवेदनशील सरकारी एवं व्यक्तिगत जानकारी होती है। इस मंच की नकल साइबर अपराध के जोखिम को बढ़ाती है।
इस घटना ने सरकार की साइबर सुरक्षा और डेटा संवेदनशीलता की कमजोरी पर प्रश्न उठाए। क्लोन साइट आमतौर पर उपयोगकर्ताओं के लॉगिन विवरण चुराने के लिए धोखाधड़ी करती हैं।
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नेपाल की सरकारी डिजिटल प्रणालियों पर साइबर हमलों की घटनाएं नई नहीं हैं। पूर्व की कमियों से सीख न लेकर सुरक्षा प्रबंधन में अक्षम रहने के कारण ये जोखिम दोहराए जा रहे हैं।
सरकारी वेबसाइटों की सुरक्षा प्रणाली कमजोर होने के कारण हैकर्स के लिए आसान लक्ष्य बनी हैं।
पिछले वर्ष १३ फरवरी २०२५ को कोशी प्रदेश सरकार के २१ सबडोमेन में अनधिकृत प्रवेश हुआ था।
‘वाईएनआर’ नाम के समूह ने कोशी सरकार के सबडोमेन पर पहुंच बना कर ‘जोन-एच’ पोर्टल में डेटा सार्वजनिक किया था।
एक महीने बाद, २६ मार्च २०२५ को प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद कार्यालय के अंतर्गत ‘हैलो सरकार’ वेबसाइट भी प्रभावित हुई।
‘घुद्रा’ नामक समूह ने सरकार द्वारा संपर्क अस्वीकृत किए जाने पर अपनी पहुँच डेटा ‘ब्रिज फोरम’ पे सार्वजनिक की थी।
अगले महीने २३ अप्रैल २०२५ को नेपाल पुलिस मुख्यालय की वेबसाइट असुरक्षित होकर ‘काजू’ नामक हैकर समूह ने लगभग २० लाख नागरिकों के नागरिकता विवरण प्राप्त कर ७ हजार अमेरिकी डॉलर में ऑनलाइन उपलब्ध कराया।
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सिर्फ ऑनलाइन ही नहीं, भौतिक रूप से सेवा देने वाले सुपरमार्केट और कैफे भी ग्राहकों के व्यक्तिगत विवरण बिना अनुमति के इकट्ठा कर रहे हैं। भाटभटेनी और बिगमार्ट जैसे सुपरमार्केट बिलिंग या सदस्यता प्रक्रिया में ग्राहक के नाम व फोन नंबर मांगने का चलन बढ़ा रहे हैं।
लेकिन, इन डेटा को देने से ग्राहकों को मिलने वाली छूट या लाभ अपेक्षित नहीं होता।
बहुत सारे कैफे और रेस्तरां वाईफाई सेवा के बहाने ग्राहक के फोन नंबर और विवरण ले रहे हैं। अधिकांश स्थानों पर सीधे पासवर्ड न देकर कैप्टिव पोर्टल का उपयोग किया जाता है, जिसमें मोबाइल नंबर अनिवार्य होता है।

इस तरह आसानी से फोन नंबर और व्यक्तिगत जानकारी मांगने से उपभोक्ताओं की गोपनीयता पर बड़ा खतरा आता है।
ये स्थान यह भी स्पष्ट नहीं करते कि वे डेटा एकत्रित कर रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार सॉफ़्टवेयर या तकनीकी कमजोरियों से डेटा लीक होकर दुरुपयोग हो सकता है।
वाईफाई सुविधा और न्यूनतम छूट के बहाने अप्रत्यक्ष रूप से डाटा संग्रहित करने वाले लोगों को इसकी कोई स्पष्ट जानकारी भी नहीं मिलती।
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ऐसे डेटा दुरुपयोग और सुरक्षा कमजोरियों से नागरिकों की निजता पर सीधे असर पड़ता है, साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ बताते हैं। अवैध रूप से व्यक्तिगत विवरण उपयोग होने पर उपभोक्ता अनावश्यक परेशानियों में पड़ जाते हैं।
उदाहरण के तौर पर, हाल में चर्चा में आया ‘एसजी अपडेट’ मामला है—वैशाख में रात १०:११ बजे एक शॉर्टकोड से लगभग ४ हजार मोबाइल उपयोगकर्ताओं के मैसेजबॉक्स में यूट्यूब चैनल सदस्यता के लिए अनधिकृत संदेश आया।
इस अज्ञात विज्ञापन संदेश ने उपयोगकर्ताओं में आपत्ति उत्पन्न की, खासकर उन लोगों के बीच जिन्होंने अपना फोन नंबर किसी को नहीं दिया था। इस पर सवाल उठना स्वाभाविक था।
सभी सवालों के जवाब में यूट्यूब चैनल संचालक सागर क्षेत्री ने तकनीकी त्रुटि के कारण इसे स्पष्ट किया।
उन्होंने लिंक्डइन पर लिखा, ‘हमारे इवेंट प्रतिभागियों को अपडेट भेजते समय सिस्टम में खराबी के कारण असंबंधित संपर्क भी उसमें जुड़ गए। कर्मचारी के मोबाइल फोन में पाए जाने वाले संपर्क सिंक हो गए जिससे कुछ अस्वीकृत लोगों को भी संदेश गया।’
आम भागों के अलावा चुनाव सहित विशेष अवसरों पर मतदाता की अनुमति के बिना राजनीतिक दल या उम्मीदवार प्रचार संदेश मोबाइल पर भेजते हैं।
डेटा सुरक्षा में कमज़ोरी की वजह से मतदाताओं के नंबर चुनावी प्रचार में आसानी से इस्तेमाल होते हैं, यह प्रमुख चिंता साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ नरेश लामगादे का बयान है।
साइबर सुरक्षा कंपनी बगभी के संस्थापक लामगादे कहते हैं, ‘डेटा ब्रिज होने पर सभी लोगों की जानकारी बाहर आ जाती है, लेकिन लोग इसके परिणाम और मूल्य को नहीं समझते।’
‘विदेशों में डेटा लीक होने पर सरकार जुर्माना लगाती है और प्रभावित नागरिक कानूनी कार्रवाई कर मुआवजा पाते हैं। नेपाल में नियामक संस्थाओं और जिम्मेदार संस्थाओं को इसका कोई खास मतलब नहीं है, जन जागरूकता भी कमजोर है।’

उनके अनुसार डिजिटल तकनीक और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के उपयोग से नागरिकों के व्यक्तिगत विवरण किस तरह दुरुपयोग हो रहे हैं, विभिन्न क्षेत्रों में यह साफ दिखता है।
‘एक बार एक डिलीवरी कंपनी के डेटा लीक होने पर एक प्रसिद्ध व्यक्ति को कई कॉल और संदेश आने से फोन नंबर बदलना पड़ा, यह एक उदाहरण है,’ उन्होंने बताया।
इसी प्रकार, राइड शेयर और डिलीवरी कंपनियों के पास सेवा ग्राहकों के घर के पते और फोन नंबर जैसे संवेदनशील विवरण होते हैं, जिन्हें और सुरक्षित बनाना आवश्यक है, लामगादे बताते हैं।
सूचना प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ दोभान राई के मुताबिक, नेपाल में डेटा सुरक्षा को कमजोर मानने के तीन मुख्य कारण हैं। पहला, नेपाली समाज में निजी गोपनीयता को प्राथमिकता न देने की संस्कृति।
दूसरा, डिजिटल माध्यम में डाटा दुरुपयोग और उसके प्रभावों के प्रति जागरूकता की कमी। तीसरा, संस्थागत स्तर पर व्यावसायिकता और जवाबदेही का अभाव।

डा. राई कहती हैं कि डाटा की लापरवाही और जागरूकता की कमी से जुड़े जोखिम कई घटनाओं में स्पष्ट दिखाई देते हैं।
विकसित देशों में नागरिक अपनी जानकारी की गोपनीयता को लेकर ज़्यादा सजग होते हैं। वहां सरकार भी डेटा सुरक्षा में चूक पर जुर्माना लगाती है और प्रभावित लोग कानूनी कार्रवाई कर मुआवजा पाते हैं।
नेपाल में ऐसी स्पष्ट और कठोर कानूनी व्यवस्था न होने के कारण डेटा तक पहुंच रखने वाली संस्थाएं आसानी से बाज़ार छोड़ देती हैं।
अतः डिजिटल युग में नागरिक की निजता सुरक्षित रखने के लिए राज्य की सख्त कानूनी नीतियाँ, संस्थागत जवाबदेही और व्यक्तिगत सतर्कता बेहद जरूरी है, डा. राई बताती हैं।
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डेटा की संवेदनशीलता न होने के कारण साइबर अपराधों की घटनाएं बढ़ रही हैं। साइबर ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, पिछले वित्तीय वर्ष में २० हजार ५२६ साइबर अपराध की शिकायतें आईं, जिनमें १३ हजार २३० इलेक्ट्रॉनिक अपराध और ७ हजार २९६ साइबर धोखाधड़ी के थे।
वित्तीय वर्ष ०८१/०८२ में यह संख्या १८ हजार ९२६ थी, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक अपराध ११ हजार १८६ और साइबर धोखाधड़ी ७ हजार ७४० थी।
वैसे ०८०/०८१ में शिकायतें और अधिक थीं, कुल १९ हजार ७३०, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक अपराध १५ हजार ५७६ और साइबर धोखाधड़ी ४ हजार १५४ थी। ये आंकड़े साइबर सुरक्षा के संवेदनशील विषय की बढ़ती आवश्यकता को दर्शाते हैं।