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‘कुवैत की बंद कमरे से लौटे जीवन की कहानी’

समाचार सारांश

  • कुवैत में काम करने गई ३६ वर्षीया नेपाली महिला बागमती को विजिट वीजा पर ले जाने का पता चला है, और उन्हें रेस्क्यू कर नेपाल वापस लाया गया है।
  • बागमती ने बताया कि कुवैत में उन्हें बंद कमरे में १८-१९ दिनों तक रखा गया, जहां २४ घंटे में सिर्फ एक बार खाना दिया गया, पानी में कीड़े थे, और उनका मोबाइल छीन लिया गया था।
  • उनके भाई के सरकारी निकायों से समन्वय के बाद एजेंट को गिरफ्तार किया गया और कुवैत स्थित कार्यालय ने उनका टिकट काटकर उन्हें नेपाल वापस भेजा।

३ भदौ, काठमांडू। ‘अच्छा काम है, टेंशन मत लेना,’ कुवैत जाने से पहले उन्हें यही कहा गया था।

गांव के परिचितों के माध्यम से आए इस प्रस्ताव को सुनकर विदेश जाकर परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने का सपना उनके मन में था। रिश्तेदार भी कुवैत में थे, इसलिए डर से ज्यादा उम्मीद थी।

लेकिन, कुवैत पहुँचने के कुछ हफ्तों के भीतर ही वह उम्मीद डर में बदल गई। ३६ वर्षीय (काल्पनिक नाम बागमती) अब नेपाल लौट आई हैं, जिनकी सारी उम्मीदें टूट गईं।

कुवैत में बिताए उन दिनों को याद करके वह आज भी डरती हैं। उन्होंने अपना नाम और पता सार्वजनिक न करने की विनती करते हुए वहां की पीड़ा सुनाते हुए कई बार रोना छिपाया।

‘मैं वहां से किसी भी तरह निकालो, ऐसा मैसेज मैंने अपने भाई को भेजा था,’ बागमती ने कहा, ‘मुझे लग गया था कि अब यहां से निकलना संभव नहीं है।’

यह उनकी विदेश यात्रा की सिर्फ कहानी नहीं है, बल्कि ऐसा सफर है जिसमें बेहतर नौकरी का सपना दिखाकर एक महिला को परिवार से छुपकर मदद मांगनी पड़ी।

गांव से शुरू हुआ विदेश जाने का सपना

बागमती गांव में ही दुःख-सुख सहकर परिवार का पालन-पोषण कर रही थीं। उनके पति भी कई देशों में काम कर चुके थे। उन्हें बताया गया कि कुवैत में अच्छी नौकरी और बेहतर वेतन मिलेगा। इसके बाद वे विदेश में काम करने के लिए कुवैत के बारे में जानकारी लेने उत्साहित हो गईं। कुवैत जाने का रास्ता एक परिचित एजेंट ने दिखाया।

एजेंट के दिए संपर्क नंबर पर वे एक अन्य महिला से जुड़ीं। उस महिला ने बताया कि वह दाङ देउखुरी की रहने वाली हैं। परिचय और रिश्तेदारी के चलते उनकी उस महिला पर विश्वास हो गया।

‘मेरी भाभी उनके साथ काम करती थीं, इसलिए मैंने उन पर विश्वास किया,’ उन्होंने कहा।

इसके बाद वे काठमांडू आईं। गोंगबु के एक निजी अस्पताल में उनका मेडिकल हुआ। मेडिकल का खर्च उन्हें नहीं देना पड़ा। फिर उनका नागरिकता और पासपोर्ट वहीं छोडने को कहा गया।

‘कुछ नहीं होगा, वह कल भी वहीं आएंगे, ऐसा कहा इसलिए मैंने विश्वास करके पासपोर्ट और नागरिकता वहीं छोड़ दी,’ उन्होंने कहा।

वे सामान्यतः श्रम स्वीकृति के बारे में सुनी थीं, लेकिन उन्हें बताया गया कि इसकी चिंता न करें।

‘श्रम स्वीकृति, यदि मैनपावर एजेंसी के पास जाएं तो देर हो जाएगी, हम आसानी से भेज देंगे,’ उन्होंने याद किया, ‘उनकी बातों पर मुझे भरोसा हो गया।’

मेडिकल किए तीन-चार दिन के अंदर वीजा आ गया। लगभग एक हफ्ते में उनकी उड़ान तय हो गई। ‘अच्छा काम है, टेंशन मत लो, भाभी भी वहां थीं, इसलिए मैंने हिम्मत करके वहां जाना तय किया,’ उन्होंने कहा।

वे त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय विमानस्थल से यूएई के शारजाह हवाई अड्डे उतरीं। वहां उन्हें करीब तीन घंटे ट्रांजिट में रखा गया। फिर उन्हें कुवैत के लिए उड़ान भरी गई। वे साथ दो अन्य महिलाएं थीं।

लेकिन विमान से उतरते ही असली और कल्पित विदेश के बीच का फर्क महसूस होने लगा।

शुरुआत में ठीक था, १६ दिनों के बाद सब बदल गया

कुवैत पहुँचने के बाद उन्हें पहले एक घर में काम कराया गया। वहां १६ दिन तक काम किया।

सफाई करना, कपड़े इस्त्री करना जैसे काम थे। काम मुश्किल था पर वह सह सकती थीं। १६ दिन बाद उन्हें दूसरे घर में भेजा गया।

वहाँ करीब सात-आठ भारतीय महिला एवं अन्य कामगार थे। उन्हें भाषा नहीं आती थी और वे तमिल भाषा में बोलते थे, जिससे और भी कठिनाई हुई।

काम का स्वरूप भी बदला। ‘५० डिग्री की गर्मी में बाहर सामान उठाना पड़ता था। न खाने का समय था, न सोने का,’ उन्होंने बताया।

करीब १०-११ दिन तब तक काम किया लेकिन शरीर ने साथ छोड़ दिया। वह अब काम नहीं कर पाती थीं, पहले काम वाले घर वापिस ले जाने की मांग की। उन्हें ‘पहले वाले घर में ले जाएंगे’ कहकर एक और जगह ले जाया गया। वह जगह उनके लिए और भी भयावह थी।

२४ घंटे में एक बार खाना

बागमती के अनुसार उन्हें एक बंद कमरे में रखा गया। ठंडे जमीन पर सोना पड़ता था। खाने की निश्चित व्यवस्था नहीं थी। ‘१८-१९ दिन वहां रखा गया, २४ घंटे में एक बार एक रोटी, बासी और बदबूदार खाना देते थे,’ उन्होंने कहा।

खाने के पानी में भी दिक्कत थी। ‘पानी की बोतल खोलते ही कीड़े निकलते थे, उन्हें हटाकर पानी पीना पड़ता था,’ उन्होंने बताया।

बीमार होने पर उन्होंने गर्म पानी मांगा। लेकिन उसे भी आराम नहीं मिला। काम न कर पाने पर गाली और दबाव सहनी पड़ी।

‘बीमार होकर गर्म पानी मांगा, पर दिया नहीं, कहते थे क्यों आए अगर काम नहीं कर पाओगे तो हम टॉर्चर देंगे,’ बागमती ने कहा। उनका मोबाइल भी छीन लिया गया था। बाहरी दुनिया से संपर्क का कोई रास्ता बंद था।

लेकिन डर और निराशा के बीच भी उन्हें एक उम्मीद थी – उनका भाई उन्हें जरूर खोजेगा।

वहां वे अकेली नहीं थीं

बागमती उस बंद कमरे में अकेली नेपाली महिला नहीं थीं। और भी नेपाली महिलाएं थीं। वे भी इसी तरह की समस्याओं में थीं। एक नेपाली महिला को लंबे समय से वहीं रखा गया था, उसे पीटा गया था और कान की झिल्ली फट गई थी। इलाम की एक युवती भी वहां थी।

‘सब रोते थे, कोई बचाने नहीं आया, डर था,’ उन्होंने बताया। लेकिन उन्हें एक बात का भरोसा था – ‘मेरा भाई मुझे ज़रूर निकाल लेगा।’

उसी भरोसे से उन्होंने छुपकर भाई से संपर्क किया।

एक मैसेज से शुरू हुआ उद्धार का संघर्ष

उनके भाई के अनुसार बहन ने छुपकर मैसेज भेजा था। ‘यहां मुश्किल हो रही है, एजेंट से बात करके निकालो,’ बहन के मैसेज को याद करते हुए उन्होंने बताया।

इसके बाद उन्होंने नेपाल में संपर्क शुरू किया। पहले एजेंट से बात करने की कोशिश हुई, पर फोन नहीं उठा। कुवैत पहुंचने पर पता चला कि बहन को विजिट वीजा पर भेजा गया था।

उन्होंने सरकारी निकायों तक पहुंचने का प्रयास किया। भाई ने प्रधानमंत्री कार्यालय सचिवालय से संपर्क किया। वहां से श्रम मंत्रालय और राष्ट्रीय अनुसन्धान विभाग को मामला पहुंचाया गया। अनुसन्धान विभाग के अधिकारियों ने बहन की स्थिति और लोकेशन पता लगाने में मदद की।

‘बहन को ट्रैक करने में बहुत मदद मिली,’ उन्होंने कहा। उद्धार में एजेंट को आर्थिक लेनदेन की भी बात हुई। शुरुआत में एजेंट ने दो लाख रुपये मांगे। बाद में एक लाख पच्चीस हजार में निपटारा करने की कोशिश हुई।

लेकिन सरकारी कार्रवाई के कारण स्थिति बदली। एजेंट गिरफ्तार हुआ और कुवैत स्थित कार्यालय पर दबाव पड़ा, अंततः बहन का टिकट कटाकर नेपाल वापस भेजा गया।

नेपाल लौटने का टिकट मिलने के बाद भी उनकी पीड़ा खत्म नहीं हुई। एयरपोर्ट ले जाने से पहले कुवैत कार्यालय के लोगों ने एक वीडियो बनवाया। वीडियो में जो भी बोलना कहा गया, वही बोलना पड़ा। ‘अगर मैंने सच बोला तो नेपाल जाने नहीं देंगे,’ उन्होंने बताया।

इसलिए उन्होंने कैमरे के सामने कहा कि उन्हें अच्छा खाना, अच्छी देखभाल दी जा रही है, हालांकि यह उनका असली अनुभव नहीं था। ‘झूठी वीडियो बनानी पड़ी,’ उन्होंने कहा।

उस वक्त उनके दिमाग में एक ही ख्याल था – ‘किसी भी तरह नेपाल लौटना है।’

‘मैं जिंदा लौट आई’

आखिरकार वे नेपाल आ गईं। एयरपोर्ट पर भाई समेत लोग उन्हें बचाने के लिए आए थे। नेपाल की जमीन पर कदम रखने के बाद उनके चेहरे पर राहत थी, लेकिन कुवैत के दिन अभी भी उनके दिल-दिमाग में हैं।

‘सबकी कोशिशों से मैं आज जिंदा लौट आई,’ उन्होंने कहा। उनके भाई के लिए यह सिर्फ बहन की सुरक्षा नहीं थी, बल्कि गरीब परिवार के लिए सरकार की मौजूदगी का अहसास था।

‘हम जैसे गरीब परिवारों के लिए सरकार है, इसका एहसास हुआ,’ उन्होंने कहा। उद्धार में मदद करने वाले सरकारी अधिकारियों और सभी से आभार जताया।

दूसरी महिलाओं के लिए उनका एक आग्रह

नेपाल लौटने के बाद उनका संदेश विदेश जाने के सपने से अधिक सावधानी बरतने का है। परिचित या रिश्तेदारों के माध्यम से आए प्रस्ताव की जांच किए बिना भरोसा न करने की सलाह दी। ‘ऐसे विजिट वीजा पर ना जाएं,’ उन्होंने अन्य बहनों से कहा, ‘रिश्तेदार ही फंसा देते हैं।’

उनकी कहानी यहीं खत्म नहीं होती। उनके साथ बंद कमरे में रो रही, उद्धार की प्रतीक्षा में और भी कई नेपाली महिलाएं हैं। वे नेपाल लौट आईं, उनका भाई उन्हें खोजा, सरकारी निकायों तक मामला पहुंचा, उद्धार संभव हुआ। लेकिन विदेश में नौकरी के नाम पर कितनी नेपाली महिलाएं ऐसे ही परेशान हैं? कितनों के पास परिवार को खबर करने के लिए मोबाइल भी नहीं? कितने लोग अपनी व्यथा छुपाकर कैमरे के सामने ‘सब ठीक है’ कहने को मजबूर हैं? उनके चेहरे पर अब घर लौटने की खुशी है, लेकिन आंखों में अभी भी वे बंद कमरे के वो दिन हैं।

उनकी अंतिम अपील सरल है – ‘विदेश जाने का फैसला करने से पहले कागज, वीजा जांचें, काम और नियोक्ता के बारे में पूरी जानकारी लें, परिचितों पर भरोसा करके अपना पासपोर्ट और भविष्य दूसरों के हाथ में न छोड़ें।

क्योंकि, उनके जैसे विदेश जाने के सपने, एक बार गलत हाथ में पड़ जाएं तो नौकरी का सपना जीवन-मृत्यु के संघर्ष में बदल सकता है।