
किशोर का विद्रोह: बहन को छाउगोठ में रखने से रोकने का फैसला
२३ भदौ, डोटी । जब बहन ने पहली बार महीवारी की, तो परिवार और समाज ने सलाह दी – २२ दिन तक गोठ में रखने की। यह बात डोटी के दिपायल सिलगढी नगरपालिका–८, लडगडा के १८ वर्षीय किशोर टेकेन्द्र कडायत को पसंद नहीं आई। उन्होंने कड़ा विरोध किया। ‘मुझे वह बात पसंद नहीं आई। बहन को गोठ में नहीं, सुरक्षित घर में रखना चाहिए, ये आवाज मैंने उठाई,’ वे कहते हैं, ‘मेरी कड़ी प्रतिक्रिया के बाद गोठ में रखने का दबाव देने की हिमाकत किसी ने नहीं की।’ टेकेन्द्र द्वारा परिवार में किया गया यह विद्रोह बहन को ‘छाउपडी’ की प्रथा के कारण गोठ में एकांत में रहने की मजबूरी से बचा गया। ‘मुझे अपनी मां और गांव की अन्य महिलाओं को गोठ में असहज महसूस करते देखकर बहुत बुरा लगता था। खासकर जब मेरी छोटी बहन को अकेले वहां रहना पड़ता, तो सोच कर ही दुख होता था,’ वे बताते हैं। छाउगोठ दूर, एकांत और असुरक्षित होने के साथ-साथ छोटा भी होता है, जहां पैर तक फैलाना मुमकिन नहीं होता, न ही बंद करने के लिए खिड़की-दरवाजा। यह दृश्य देखकर वे बेहद कष्ट में रहते थे। छाउगोठ में रहने वाली महिलाओं को देखकर उनमें असंतोष बढ़ता जा रहा था। जब अपनी बहन की बारी आई, तो उन्होंने अपने भीतर छुपा यह विद्रोह प्रदर्शित किया। वे पहले भी छाउगोठ में महिलाओं की मृत्यु के समाचार सुनते रहे थे, जिससे उनके मन में अपने ही गांव में गोठ की तस्वीरें घूमती थीं। जब वे गोठ में बैठी महिलाओं को देखते थे, तो वे वही खबरें याद आती थीं। ‘मुझे अपनी छोटी बहन को अकेले गोठ में रखने की बात सुनते ही झटका लगा और उसे निर्विवाद रूप से रोकने का फैसला किया,’ वे कहते हैं। बहन को छाउगोठ में जाने से रोकने के उनका साहस गांव के अन्य किशोर-किशोरियों और सामाजिक नेतृत्वकर्ताओं द्वारा भी समर्थन मिला। इस समर्थन से वे सिर्फ अपनी बहन ही नहीं, बल्कि अन्य महिलाओं को भी छाउगोठ की कैद से मुक्त कराने के लिए अभियान चला रहे हैं। टेकेन्द्र के लिए खुशी का क्षण यह है कि बेटी का पहली बार माहवारी होना खुशियों का अवसर है, लेकिन यह घटना मानसिक और शारीरिक रूप से असंतुलन भी पैदा कर सकती है। ‘ऐसे समय पर परिवार का सहारा अत्यंत आवश्यक होता है, लेकिन समाज जब अकेले छाउगोठ में रखने की सलाह देता है, तब मैं खुद को संभाल नहीं पाता था,’ वे याद करते हैं। जब उन्होंने विद्रोह कर अपनी बहन को गोठ से बाहर निकालने में सफलता पाई, तो वह बेहद आनंदमय पल था। ‘उस दिन मैं सबसे अधिक खुश महसूस कर रहा था, और मुझे लगा कि मेरी बहन भी खुश है,’ वे कहते हैं। इस अभियान में टेकेन्द्र को गांव के बुजुर्गों और अभिभावकों की भी कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा। उन पर परंपरा तोड़ने और देवता के विरुद्ध जाने के आरोप लगे। फिर भी, उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। उनकी हिम्मत ने दूसरों को भी प्रेरित किया और यह अभियान पूरे गांव में फैल गया। आज लडगडा के गांव-गांव में छाउगोठ के खिलाफ अभियान चल रहा है। टेकेन्द्र ने जाना है कि यह छाउगोठ विरोधी प्रतिबद्धता महिलाओं के प्रति भेदभाव और हिंसात्मक तथा खतरनाक प्रथाओं को समाप्त करने के साथ-साथ जान-माल की सुरक्षा भी सुनिश्चित कर रही है। उनका यह अभियान छाउगोठ को खत्म कर महिलाओं को घर के अंदर रहने का अधिकार दिला रहा है। बुजुर्गों द्वारा कही गई किसी भी समस्या का सामना नहीं करना पड़ा। उन्हें अब लगता है कि समस्या छाउगोठ में नहीं, बल्कि सोच में है। टेकेन्द्र के इस प्रबल अभियान में सशक्त महिला, समृद्ध नेपाल कार्यक्रम सहित दिपायल सिलगढी नगरपालिक भी सहयोग दे रही है। टेकेन्द्र के साहसिक विद्रोह से गांव में जकड़ी हुई छाउपडी प्रथा को समाप्त करने में मदद मिलेगी, ऐसा स्थानीय अधिकारकर्मी रम भण्डारी का विश्वास है।