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ट्रम्प की धमकी के बाद डेनमार्क और अमेरिका के बीच ग्रीनलैंड सुरक्षा समझौता

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने डेनमार्क और अमेरिका के बीच ग्रीनलैंड संबंधी एक समझौता होने का दावा किया है। उनके अनुसार अब ग्रीनलैंड की सुरक्षा से सम्बंधित मामलों में अमेरिका को स्थायी नियंत्रण प्राप्त होगा। ट्रम्प ने ट्रूथ सोशल पर लिखा, ‘संयुक्त राज्य अमेरिका और डेनमार्क के अधीनस्थ क्षेत्र ग्रीनलैंड के बीच एक समझौता हुआ है जो ग्रीनलैंड की सुरक्षा और अन्य आवश्यक पक्षों में अमेरिका को स्थायी अधिकार देता है। यह हमारे कई अमेरिकी हितों को पूरी तरह संबोधित करता है और इसके लिए अमेरिका को कोई लागत नहीं लगेगी।’
इससे पहले ट्रम्प ने डेनमार्क के स्वशासित क्षेत्र ग्रीनलैंड को कब्जा करने की धमकी दी थी। इस धमकी का अन्य नाटो सदस्य देशों ने कड़ा विरोध किया था। नाटो सदस्य डेनमार्क ने सामूहिक सुरक्षा के सिद्धांत पर लगातार दृढ़ता दिखाई है। ट्रम्प ने ग्रीनलैंड को रक्षा तथा वहां के खनिज संसाधनों के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बताते हुए अमेरिका द्वारा उसे कब्जा करने की बात कही थी।
ट्रम्प ने डेनमार्क के साथ हुए नए समझौते को दीर्घकालिक और ग्रीनलैंड को डेनमार्क के नियंत्रण में ही रहने वाला बताया है। सन् 1951 में अमेरिका और डेनमार्क के बीच हुआ समझौता ग्रीनलैंड में अमेरिका को व्यापक सैन्य उपस्थिति की अनुमति देता था। नया समझौता पुराने से कितना भिन्न है, यह विषय अभी स्पष्ट नहीं हुआ है। उन्होंने कहा, ‘अब से कोई भी अमेरिकी विरोधी बिना हमारी स्पष्ट लिखित स्वीकृति के ग्रीनलैंड में आधार, सैन्य उपस्थिति या संवेदनशील क्षेत्रों में निवेश नहीं कर सकता।’
ट्रम्प ने कहा कि अमेरिका जल्द ही वहां बड़ी सैन्य उपस्थिति स्थापित करेगा और ग्रीनलैंड के स्थानीय लोगों के साथ विकास कार्यों में सहयोग करेगा। डेनमार्क के प्रधानमंत्री कार्यालय ने भी ग्रीनलैंड संबंधी अमेरिका के साथ समझौते की पुष्टि की है। ‘आर्कटिक और उत्तर अटलांटिक क्षेत्र में मजबूत सुरक्षा’ विषयक इस समझौते पर अगले सप्ताह संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान हस्ताक्षर हो सकते हैं, डेनमार्क के प्रधानमंत्री कार्यालय ने बताया। इस बारे में डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने खुशी जताते हुए कहा, ‘ग्रीनलैंड, डेनमार्क अधिराज्य और अमेरिका के लिए यह एक बड़ा समझौता होने जा रहा है, मैं उत्साहित हूं।’ उन्होंने यह भी कहा कि यह समझौता नाटो और यूरोप के लिए भी सकारात्मक होगा।