
‘दो तिहाई मतों से अपनी मर्जी से संविधान संशोधन करने का अधिकार नहीं है’
समाचार सारांश
OK AI द्वारा निर्मित। सम्पादकीय समीक्षा गरिएको।
- नेपाली कांग्रेस ने सरकार द्वारा गठित संविधान संशोधन कार्यदल की औचित्य और प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए इसका रिपोर्ट संशोधन का आधार बनाने से इनकार किया है।
- कांग्रेस उपसभापति पुष्पा भुसाल ने संविधान की मूल संरचना को अक्षुण्ण रखते हुए 10 वर्षों में सामने आई व्यवहारिक समस्याओं का समाधान संशोधन के माध्यम से करने पर जोर दिया है।
- कांग्रेस ने संविधान संशोधन के लिए विशेषज्ञ, नागरिक समाज और राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व करने वाला निष्पक्ष और साझा संयंत्र बनाने का प्रस्ताव दिया है।
१७ साउन, काठमांडू। राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी (रास्वपा) के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा गठित संविधान संशोधन सुझाव कार्यदल ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करते ही संविधान संशोधन चर्चा शुरू हो गई है। लेकिन मुख्य विपक्षी दल नेपाली कांग्रेस ने सरकार की पहल पर असंतोष जताते हुए कार्यदल के गठन प्रक्रिया, प्रतिनिधित्व एवं अधिकार क्षेत्र पर सवाल खड़े किए हैं और रिपोर्ट को संविधान संशोधन का आधार मानने से इनकार किया है।
कांग्रेस संविधान संशोधन विषय पर व्यापक चर्चा के लिए कार्ययोजना और विषयगत खाका तैयार करने के मकसद से सुझाव संकलन कर रही है। ‘संविधान संशोधन अध्ययन तथा सुझाव समिति’ के माध्यम से यह काम किया जा रहा है।
कांग्रेस उपसभापति पुष्पा भुसाल के संयोजन में गठित समिति देश भर के विभिन्न पक्षों से चर्चा कर सुझाव एकत्रित कर रही है, इसलिए संविधान संशोधन का ड्राफ्ट तैयार नहीं किया गया है।
उपसभापति भुसाल संविधान की आधारभूत संरचना को अक्षुण्ण रखते हुए आवश्यक संशोधन पर सहमत हैं। उनका कहना है कि संसदीय प्रणाली, संघीयता, निर्वाचन प्रणाली, समानुपातिक समावेशिता, और संवैधानिक निकायों के कार्य में आई व्यवहारिक जटिलताओं का समाधान संशोधन से हो सकता है।
संविधान संशोधन को लेकर पार्टी के अंदर हुए विवाद, १५वें महाधिवेशन की तैयारियां, विशेष महाधिवेशन से संशोधित विधान की वैधानिकता पर पुनरावलोकन याचिका और सरकार के कार्यकाल को लेकर कांग्रेस उपसभापति पुष्पा भुसाल से हुई बातचीत के संपादित अंश प्रस्तुत हैं।
सरकार द्वारा गठित संविधान संशोधन सुझाव कार्यदल ने रिपोर्ट सौंपी है जिसमें कई धाराओं के संशोधन की बात कही गई है। कांग्रेस इसका क्या मूल्यांकन करती है?
इसे दो नजरियों से देखना होगा। रास्वपा ने चुनाव में संविधान संशोधन को मुख्य एजेंडा बनाकर १०० बिंदु कार्यक्रम में रखा था। इसी आधार पर सरकार ने कार्यदल गठित किया।
कोई भी पार्टी अपने घोषणापत्र के अनुसार अध्ययन कार्यदल बना सकती है जो पार्टी को सुझाव दे, लेकिन ऐसा कार्यदल राष्ट्रीय संविधान संशोधन की प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ा सकता।
दूसरी ओर कार्यदल द्वारा उठाए गए विषय निजी एकपक्षीय एजेंडा नहीं हैं। संविधान संशोधन सामाजिक संरचना, राजनीतिक आंदोलन, नागरिक अधिकार एवं शासन व्यवस्था से जुड़ा विषय है। एक दल सरकार द्वारा गठित कार्यदल अंतिम राय नहीं दे सकता, न ही संवैधानिक अधिकार है।
इसलिए कार्यदल की रिपोर्ट रास्वपा या सरकार की अपनी सोच हो सकती है, पर इसे संविधान संशोधन का आधार नहीं माना जा सकता।
क्या दो तिहाई के करीब बहुमत मिलने पर संविधान संशोधन संभव नहीं है?
सरकार पहल कर सकती है लेकिन दो तिहाई बहुमत होने और मनमाने ढंग से संविधान संशोधन करने में अंतर है।
जनता का मत स्थिर सरकार, सुशासन, विकास, समृद्धि और संसद के प्रति जवाबदेही के लिए दिया गया है। मत को आधारभूत संरचना को अपनी मर्जी से बदलने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए।
२०७२ को संविधान किसी एक दिन या पार्टी की इच्छा से नहीं बना है। यह २०६२/०६३ के आन्दोलन, शांति प्रक्रिया, अंतरिम संविधान, दो बार संविधान सभा चुनाव और लगभग आठ वर्षों की चर्चा से बना है।
संविधान सभा के दल, नागरिक समाज, विशेषज्ञ, समुदाय और आन्दोलनकारी शक्ति की राय लेकर संविधान बनाया गया है। महिलाओं, दलित, जनजाति, मधेसी, मुस्लिम, थारु आदि अल्पसंख्यक समूहों के अधिकार संविधान में शामिल हैं।
इसलिए नेपाल की सामाजिक संरचना और विविधता का प्रतिबिंब यह संविधान है। संशोधन करते समय यही गंभीरता, सहभागिता और विश्वास जरूरी है।
हम कहते हैं — दस साल के संविधान कार्यान्वयन में सामने आई चुनौतियां, कमियां और समस्याएं पहचान कर ही संशोधन होना चाहिए। संशोधन प्रक्रिया विश्वसनीय होनी चाहिए। सुझाव देने और मसौदा तैयार करने की व्यवस्था निष्पक्ष, तटस्थ और राजनीतिक दबाव से मुक्त होनी चाहिए।
हम पूर्व प्रधान न्यायाधीश के नेतृत्व में संविधान संशोधन मसौदा समिति बनाने का प्रस्ताव देते हैं जिसमें संविधान विशेषज्ञ, राजनीतिक दल, नागरिक समाज और विशेषज्ञ शामिल हों।
संविधान किसी एक दल या सरकार का दस्तावेज नहीं है। इसलिए संशोधन भी एक ही दल तक सीमित नहीं रह सकता।
आधारभूत संविधान संरचना में कौन-कौन से विषय अपरिवर्तनीय हैं?
संविधान की प्रस्तावना में संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य, संसदीय शासन प्रणाली, समानुपातिक समावेशिता, मिश्रित निर्वाचन प्रणाली, संघीयता और तीन स्तरों वाली सरकार की कल्पना की गई है।
ये संविधान के मूल मूल्य और संरचना हैं। संशोधन चर्चा इन सीमाओं के भीतर ही 10 वर्षों के अनुभव में आई समस्याओं के समाधान तक सीमित होनी चाहिए।
प्रणाली खुद गलत नहीं है, लेकिन संचालन में राजनीतिक संस्कृति, नेतृत्व और संस्थागत अभ्यास की समस्याएं आ सकती हैं। इन्हें संशोधन से ठीक किया जा सकता है लेकिन मूल संरचना नष्ट नहीं होनी चाहिए।
कांग्रेस संसदीय प्रणाली, संघीयता और समानुपातिक समावेशिता को कमजोर करने वाले संशोधनों का समर्थन नहीं करती।
सरकार के कार्यदल में कांग्रेस शामिल क्यों नहीं हुई?
हमारी मुख्य असहमति कार्यदल गठन में थी। कार्यदल की संरचना विश्वसनीय और समावेशी नहीं थी। संविधान संशोधन जैसे राष्ट्रीय महत्व के विषय को केवल एक दल के कार्यक्रम के तहत बनाये गए कार्यदल नहीं चला सकता।
कार्यदल में दलों, नागरिक समाज, विशेषज्ञों और संविधान निर्माण से जुड़े लोगों का प्रभावी प्रतिनिधित्व नहीं था। प्रक्रिया विश्वसनीय नहीं थी इसलिए कांग्रेस ने अपना प्रतिनिधि नहीं भेजा।
कुछ विषय संविधान की मूल संरचना से जुड़े हैं इसलिए उन पर एक दल के कार्यदल को राजनीतिक या नैतिक अधिकार नहीं है।
हमने सरकार से खुले संवाद, साझा संयंत्र बनाने और व्यावहारिक समस्याओं के समाधान की अपील की है।
कांग्रेस द्वारा गठित संविधान संशोधन अध्ययन एवं सुझाव समिति का उद्देश्य क्या है?
संविधान लागू होने के 10 वर्षों में आई चुनौतियों का अध्ययन करने के लिए पार्टी ने मेरी संयोजन में 18 सदस्यीय समिति बनाई है। इसमें कानूनी विशेषज्ञ और विषय विशेषज्ञ शामिल हैं।
यह समिति संविधान संशोधन नहीं करती बल्कि अध्ययन करके पार्टी को सुझाव देती है। अंतिम निर्णय पार्टी लेगी।
हम संविधानविदों, राजनीतिक वैज्ञानिकों, नागरिक समाज और युवाओं से विचार-विमर्श कर रहे हैं। अधिकांश का सुझाव है कि संविधान की मूल संरचना के बाहर संशोधन न करें।
संविधान में लिखित अधिकार क्यों लागू नहीं हुए? संसदीय प्रणाली क्यों स्थिर नहीं हुई? तीन स्तरों की सरकार अपेक्षित परिणाम क्यों नहीं दे पाई? संवैधानिक निकाय प्रभावी क्यों नहीं हुए? इस विषय पर ही संशोधन बहस केंद्रित होनी चाहिए।
समिति ने प्रारंभिक सुझाव पार्टी नेतृत्व को दे दिए हैं। पार्टी अध्यक्ष गगनकुमार थापा ने भी सार्वजनिक रूप से कहा है कि आधारभूत मूल्यों के अंतर्गत संशोधन संभव है।
अब कांग्रेस अन्य राजनीतिक दलों, नागरिक समाज, विशेषज्ञों और प्रदेश स्तर की इकाइयों से संवाद कर साझा दृष्टिकोण बनायेगी।
कांग्रेस द्वारा पहचाने गए संविधान संशोधन के मुख्य क्षेत्र कौन-कौन से हैं?
पहला, संसदीय प्रणाली कायम रखते हुए कार्यान्वयन में आई समस्याओं का समाधान। सरकार गठन प्रक्रिया, विश्वास मत, अविश्वास प्रस्ताव और संसद के कार्यकारी जवाबदेही के विषय पर चर्चा की जा सकती है।
दूसरा, निर्वाचन प्रणाली में सुधार आवश्यक है। सांसदों की संख्या घटाने पर विचार हो रहा है लेकिन समानुपातिक समावेश प्रभाव कम नहीं होना चाहिए।
समानुपातिक सीटें कम भी हों, महिलाओं, दलितों और सीमांतित समुदायों की उम्मीदवार सुनिश्चित करनी होगी। स्थानीय स्तर पर महिलाएँ अक्सर उपप्रमुख पद तक सीमित हैं। प्रमुख, वार्ड अध्यक्ष और निर्णायक पदों में महिलाओं, दलितों और पिछड़े समुदायों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने पर चर्चा होनी चाहिए।
तीसरा, संघीयता के कार्यान्वयन में आई समस्याओं का समाधान। संघ, प्रदेश और स्थानीय सरकार के अधिकार स्पष्ट नहीं हैं। अधिकार के दोहरेपन से कार्य, बजट और जवाबदेही में समस्याएं हैं।

केंद्र और प्रदेश में समान प्रकृति के मंत्रालयों की पुनः समीक्षा होनी चाहिए। समान विषय के मंत्रालय दोनों स्तरों पर होने से प्रशासनिक व आर्थिक भार बढ़ता है। काम कौन करेगा – संघ, प्रदेश या स्थानीय सरकार, स्पष्ट होना चाहिए।
प्रदेश को सरल, सस्ता और प्रभावी बनाया जा सकता है। प्रदेश और संघ के सांसद व मंत्रिमंडल के आकार पर भी चर्चा हो सकती है।
चौथा, संवैधानिक निकायों को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त करना आवश्यक है। चुनाव आयोग, भ्रष्टाचार निरोधक आयोग, महालेखा परीक्षक आदि निकाय सुशासन के लिए बने हैं। नियुक्ति में राजनीतिक हिस्सेदारी पड़ी तो संस्थान स्वतंत्र नहीं रह सकते।
न्यायाधीशों तथा संवैधानिक पदाधिकाऱियों की नियुक्ति प्रक्रिया में राजनीतिक हस्तक्षेप कम करना महत्वपूर्ण होगा।
पाँचवां, राजनीतिक दलों को आंतरिक रूप से लोकतांत्रिक और समावेशी बनाना। नेतृत्व और निर्णयस्थल में महिलाओं के साथ अन्य समुदायों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना आवश्यक है।
सरकार के कार्यदल में स्थानीय सरकार को दलगत आधार से अलग करने का प्रस्ताव आया है। कांग्रेस का इससे क्या मत है?
स्थानीय सरकार ही सरकार है। संविधान ने इसे कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका अधिकार दिए हैं। इतने शक्तिशाली सरकार को दल-मुक्त करना सैद्धांतिक और लोकतांत्रिक संविधान की भावना के खिलाफ है।
राजनीतिक दल लोकतंत्र के आधार हैं। स्थानीय सरकार को दलबिना बनाना वर्तमान संविधान और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अनुकूल नहीं है।
कोई भी विषय लोकप्रिय लग सकता है लेकिन संविधान की मूल भावना के विरोध में प्रस्ताव नहीं आगे बढ़ सकता।
कांग्रेस संसदीय प्रणाली का पक्ष क्यों रखती है, जबकि प्रत्यक्ष निर्वाचित कार्यकारी चर्चा में है?
संसदीय प्रणाली जनता के सबसे निकट शासन प्रणाली है। संसद जनता का प्रतिनिधि है और प्रधानमंत्री संसद से निकलता है, इसलिए प्रधानमंत्री संसद के प्रति जवाबदेह होता है।
जनता आवधिक चुनावों में अपना प्रतिनिधि चुनती है और यदि असंतुष्ट होती है तो अगले चुनाव में बदल भी सकती है। यही लोकतांत्रिक नियंत्रण संसदीय प्रणाली की ताकत है।
नेपाल की भौगोलिक, सामाजिक और राजनीतिक दशा के लिए संसदीय प्रणाली उपयुक्त है। दक्षिण एशियाई संदर्भ और नेपाल की भूराजनीतिक संवेदनशीलता के चलते शक्ति एक व्यक्ति में केंद्रीत करने की बजाय प्रतिनिधि और जवाबदेह प्रणाली जरूरी है।
हमने सुदृढ़ संसदीय प्रणाली अपनाई है। इसमें आ रही कमियां सुधार से ठीक होंगी। अस्थिरता के लिए सिर्फ प्रणाली दोषी नहीं है, प्रत्यक्ष निर्वाचित कार्यकारी व्यवस्था सही विकल्प नहीं।
मिश्रित निर्वाचन प्रणाली में फिलहाल एक दल को दो तिहाई के करीब बहुमत मिला है, जिसका मतलब है कि जनता स्थिर सरकार चाहती है।
कांग्रेस में संविधान संशोधन को लेकर सहमति है?
हम मूल रूप से स्पष्ट हैं कि संविधान की मूल संरचना को बचाते हुए कार्यान्वयन में मिली चुनौतियों का समाधान करने वाले संशोधन स्वीकार्य हैं।
विस्तृत मुद्दों पर पार्टी की केन्द्रीय समिति, प्रदेश संरचना, कार्यकर्ता और महाधिवेशन में विचार-विमर्श होगा। विभिन्न मत होना स्वाभाविक है।
हमारी प्राथमिकता बाहरी विशेषज्ञों, युवाओं, संविधान निर्माण में शामिल शक्तियों और अन्य दलों से बातचीत कर साझा एजेंडा बनाना है, उसके बाद पार्टी में व्यापक चर्चा होगी।
संविधान निर्माण में नेपाली कांग्रेस ने नेतृत्व किया था। सुशील कोइराला के नेतृत्व में संविधान जारी करने का ऐतिहासिक दायित्व हमारी जिम्मेदारी है। संशोधन के समय भी कांग्रेस को सहमति बनाने में नेतृत्व करना होगा।

१५वें महाधिवेशन के करीब आते ही पार्टी में विवाद सामने आ रहे हैं, क्या यह सामान्य मतभेद हैं या गहरी समस्या?
महाधिवेशन विवाद का विषय नहीं, यह पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा का अवसर है।
संविधान और पार्टी विधान के अनुसार निर्धारित समय पर महाधिवेशन होना आवश्यक है, इसलिए १५वें महाधिवेशन की तैयारी चल रही है।
सदस्यता का डिजिटलकरण, नवीनीकरण और युवाओं के लिए सदस्यता खोलने का काम चल रहा है। हम सदस्यों को गांव तक कार्यालय से जोड़ने का वातावरण बना रहे हैं।
महाधिवेशन स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी होना चाहिए। किसी को सदस्यता, प्रतिनिधित्व या प्रतिस्पर्धा से वंचित नहीं किया जाएगा। पार्टी ने किसी को रोका नहीं है।
नेताओं के मतभेद हो सकते हैं, लेकिन इसे गुटबंदी, फुट या विखंडन में बदलना गलत है। महाधिवेशन को पार्टी मजबूत करने वाला होना चाहिए।
खबरें आ रही हैं कि कांग्रेस टूटने वाला है?
कांग्रेस टूटेगी नहीं। यह पार्टी ऐतिहासिक, लोकतांत्रिक और आंदोलनकारी है। इतिहास, संगठन और मूल्य इसे नहीं तोड़ सकते।
लेकिन नेताओं द्वारा विवाद को अनावश्यक राजनीति बनाना नई पीढ़ी को नकारात्मक संदेश देगा। हम कहते हैं ‘कांग्रेस बदले’, इसका व्यवहार से प्रमाण दे।
अगर नेता विवाद में फंसे तो नेतृत्व परिवर्तन का संदेश नहीं जाएगा। मुझे विश्वास है कि १५वें महाधिवेशन में सभी नेता शामिल होंगे।
असंतुष्ट नेता कहते हैं कि पार्टी नेतृत्व एकता के लिए पहल नहीं कर रहा, क्या इसकी सच्चाई है?
अध्यक्ष व्यक्ति-से-व्यक्ति और समूह-से-समूह बातचीत कर रहे हैं। कहना कि नेतृत्व संवाद नहीं चाहता, गलत है। कार्य वक्त बताएगा।
सदस्यता खुली है, नवीकरण और अपडेट हो रहा है, महाधिवेशन की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है।
अध्यक्ष का उद्देश्य सभी को सम्मिलित कर १५वें महाधिवेशन को संगठन सुदृढ़ीकरण और एजेंडा बनाने वाला बनाना है।
दो पक्षों के बीच सहमति का आधार क्या हो सकता है?
निष्पक्ष, पारदर्शी और विश्वसनीय महाधिवेशन सहमति का मुख्य आधार होगा।
सभी सदस्यों को नवीकरण और अपडेट करना होगा। सभी को महाधिवेशन में भाग लेने का मौका मिले। चुनाव स्वच्छ और निष्पक्ष हो। नेतृत्व महाधिवेशन प्रतिनिधि द्वारा चुना जाए।
महाधिवेशन विषय पर सभी पक्ष सहमत हैं। प्रक्रिया और समय सारिणी चल रही है। ऐसे में विवाद की बजाय महाधिवेशन सफल बनाने पर ध्यान देना चाहिए।
महाधिवेशन के बाद स्थानीय और प्रदेश चुनाव होंगे। लाखों कार्यकर्ताओं के लिए उम्मीदवार और नेतृत्व का मौका बने। केंद्र के नेताओं को स्वार्थ से ऊपर उठकर संगठन के भविष्य को प्राथमिकता देनी होगी।

निवर्तमान अध्यक्ष शेरबहादुर देउवा और उपाध्यक्ष पूर्णबहादुर खड़का ने विशेष महाधिवेशन की वैधता पर पुनरावलोकन की मांग की है, इस मुद्दे को कैसे देखा जाता है?
सर्वोच्च अदालत ने विशेष महाधिवेशन और नेतृत्व को मान्यता दी है। इसके बाद पार्टी ने इस नेतृत्व के हस्ताक्षर से संसदीय चुनाव लड़ा। नेताओं ने टिकट लेकर चुनाव लड़ा। अदालत के निर्णय के बाद विशेष महाधिवेशन को अवैध कहना अनुचित है।
किसी प्रक्रिया में भाग लेकर परिणाम स्वीकार करना और बाद में उसे अवैध कहना सही नहीं है।
पुनरावलोकन कानूनी अधिकार है पर इससे संवाद के दरवाजे बंद हो सकते हैं, विवाद बढ़ सकते हैं और संगठन कमजोर हो सकता है।
इस मुद्दे का राजनीतिक हथियार बनने से बचना चाहिए। अब सभी नेतृत्व १५वें महाधिवेशन और पार्टी एकता पर केंद्रित हों।
पुराने विवाद दोहराने की बजाय नई पीढ़ी को नेतृत्व में लाना, युवाओं का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना, पार्टी को समावेशी एवं मजबूत बनाना प्राथमिकता होनी चाहिए।
कांग्रेस मजबूत हो तभी देश की लोकतांत्रिक प्रणाली मजबूत होगी। कांग्रेस की अपेक्षा सभी राजनीतिक दल और लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले समुदाय करते हैं।
अंत में, सरकार के कार्यकाल का आपके अनुसार क्या आकलन है?
रास्वपा ने परिवर्तन, सुशासन, समृद्धि और भ्रष्टाचार मुक्त शासन का नारा लेकर चुनाव लड़ा था। उसे परंपरागत मतदाता ही नहीं, बल्कि अन्य दलों के मतदाता भी उम्मीद के साथ वोट दे रहे हैं।
जनता ने स्थिर सरकार, सुशासन और बदलाव अपेक्षित किया है, जिसका सम्मान होगा। नागरिकों को डरमुक्त माहौल में जीवन और काम करने का अनुभव होना चाहिए। उद्योगपति, व्यापारी, पत्रकार और आम जनता को भयभीत महसूस नहीं होना चाहिए।
मीडिया सरकार और समाज को चौथा अंग मानता है। मीडिया कर्मियों पर दबाव, डराने या आवाज बंद करने का प्रयास लोकतांत्रिक व्यवस्था स्वीकार नहीं करती।
आर्थिक क्षेत्र में विश्वास का वातावरण अभी नहीं बना है। निवेश के लिए सुरक्षा और स्थिरता चाहिए। सरकार को उद्योगों और निवेशकों को उत्साहित करना होगा।
सामाजिक सद्भाव में बाधा डालने वाले घटनाक्रम पर सरकार को गंभीर रहना चाहिए। राजनीतिक दलों ने सहयोग का आश्वासन दिया है। अच्छा कार्य हो तो कांग्रेस समर्थन करेगी, गलत हो तो प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी निगरानी करना है।
हम सरकार के पूरे पाँच साल चलने के पक्ष में हैं। स्थिर सरकार जरूरी है लेकिन स्थिरता जवाबदेही से मुक्त होना नहीं।
रासायनिक उर्वरक उपलब्ध होने के बावजूद कृत्रिम अभाव, मूल्य वृद्धि पर नियंत्रण का अभाव, और जनता में निराशा बढ़ना सरकार के लिए चेतावनी हैं।
सरकार ने कुछ अच्छे काम किए हैं लेकिन जनता की अपेक्षा अनुसार माहौल नहीं बना है, ऐसा मैं नहीं कहूंगी। मतदाता को निराश नहीं होना चाहिए, यही मेरी आकांक्षा है।