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१० साल बीत जाने के बाद भी अधूरी बनी हुई १० किलोमीटर सड़क की स्थिति

तेह्रथुम के फेदाप क्षेत्र की १० किलोमीटर सड़क खंड दशकों बीत जाने के बावजूद अधूरी है और आठवीं बार समय सीमा बढ़ाने की तैयारी में है। २०७२ साल में सड़क निर्माण का समझौता किया गया था, जिसे २०७४ के अंदर पूरा करने का वादा किया गया था, लेकिन कंपनी संपर्क में नहीं है। सड़क अधूरी रहने के कारण स्थानीय निवासी, वाहन चालक और पर्यटन व्यवसायी दैनिक जीवन और आर्थिक गतिविधियों में कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। १७ चैत्र, तेह्रथुम।

तेह्रथुम के फेदाप क्षेत्र के निवासियों के लिए यह सड़क केवल भौतिक आधारभूत संरचना नहीं बल्कि उनकी दिनचर्या, संभावनाएं और भविष्य से जुड़ी है। यह सड़क आठराई और फेदाप के लोगों को जिला मुख्यालय से जोड़ने का एकमात्र रास्ता है। पर विडंबना यह है कि मध्यपहाड़ी लोकमार्ग के तहत खोरङ्वा खोला से यावरास तक का यह १० किलोमीटर लंबा सड़कखण्ड दशकों बाद भी पूर्ण नहीं हो पाया है। २०७२ साल भदौ ३१ को गौरी पार्वती कोशी एंड न्यौपाने जेवी कंपनी ने फेदाप गाउँपालिका के इस सड़क खंड को कालोपत्रे करने की जिम्मेदारी ली थी। ३९ करोड़ १८ लाख से अधिक लागत में २०७४ तक कार्य पूरा करने का समझौता हुआ था, लेकिन अभी तक निर्माण कार्य पूरा नहीं हो सका।

इस परियोजना की सात बार समय सीमा बढ़ाई जा चुकी है और अब आठवीं बार बढ़ाने की योजना है। निर्माण कंपनी संपर्क में नहीं है। तेह्रथुम जिले में पड़ने वाले मध्यपहाड़ी राजमार्ग की कुल ११९ किलोमीटर में से १०९ किलोमीटर सड़क पक्की हो चुकी है, लेकिन फेदाप क्षेत्र की यही १० किलोमीटर सड़क अधूरी रह गई है। जहां अन्य स्थानों पर सड़क निर्माण में तरक्की हो रही है, वहीं फेदाप के निवासी धूल-कीचड़ में यात्रा करने को मजबूर हैं। सर्दियों में यह सड़क धूलभरी हो जाती है। गाड़ियों के गुजरने से उठने वाला धूल घर, दुकान और खेतों को ढक देता है, जिससे स्वास्थ्य पर भी प्रभाव पड़ता है।

बारिश के मौसम में यह सड़क कीचड़ से भर जाती है, वाहन फंसते हैं और कई स्थानों पर पानी बहकर सड़क खाई जैसी स्थिति में दिखती है। ऐसे हालात में वाहन चलाना कठिन हो जाता है। स्थानीय निवासी सिम्ले की दिलकुमारी लिम्बू बताती हैं, ‘बच्चों के लिए स्कूल जाना और बीमारों को अस्पताल ले जाना मुश्किल होता है। बाजार जाना तो और भी कठिन है—धूल-भरी सड़क पर पैदल चलना पड़ता है। कभी-कभी तो वाहन कीचड़ में फंस भी जाता है।’ सड़क अधूरी रहने के कारण आवश्यक दीवार, नालियां और सुरक्षा संरचनाएं नहीं बन पाई हैं, जिससे बरसात में पहाड़ धसने का खतरा बढ़ गया है।

डम्बर कुमारी बास्तोला कहती हैं, ‘सड़क बनाने के नाम पर ज़मीन तो इतनी काटी गई, लेकिन संरक्षण नहीं हुआ। अब बारिश के बाद घर में रहते हुए भी डर लगता है। कभी-कभी रात को सोते वक्त भी पहाड़ के फटने का डर नींद नहीं आने देता।’ इस सड़क खंड पर वाहन चलाना न केवल चालकों के लिए चुनौतीपूर्ण है, बल्कि आर्थिक नुकसान का विषय भी बन गया है। वाहन खराब होना, भस्म होना और दुर्घटना का जोखिम व्यवसाय को असुरक्षित बना रहा है। वाहन चालक जयदेव शाह बताते हैं, ‘मैं सुबह उठकर वाहन लेकर सड़क पर आ जाता हूं। हर यात्रा तनावपूर्ण होती है। कभी वाहन कीचड़ में फंस जाता है, कभी सड़क धंस जाती है। नुकसान उठाना पड़ता है। कभी-कभी दुर्घटना के कगार से भी गुजरना पड़ता है। लेकिन परिवार चलाना है तो ऐसा करना पड़ता है।’

उनका अनुभव यह दर्शाता है कि सड़क अधूरी रहने से केवल समय और धन की हानि ही नहीं होती, बल्कि जीवन भी जोखिम में रहता है। स्थानीय पर्यटन व्यवसायी बमबहादुर लिम्बू कहते हैं, ‘सड़क अच्छी होती तो यहां ज्यादा पर्यटक आते। रिसॉर्ट और होमस्टे खोल सकते थे। लेकिन वर्तमान स्थिति में संभावनाओं के बावजूद उपयोग संभव नहीं हो पा रहा है। पर्यटक नहीं आते, स्थानीय रोजगार भी नहीं बनता।’ सड़क बनवाने में निर्माण कंपनी की लापरवाही के साथ-साथ निगरानी और मूल्यांकन की कमी भी प्रमुख कारण हैं। योजना बनाने, बजट देने और ठेका मिलने के बाद प्रभावी कार्यान्वयन ना होने के कारण इस तरह के राष्ट्रीय गौरव के आयोजन अधूरे रह जाते हैं।

स्थानीय लोग कहते हैं, ‘सड़क बनती तो बच्चे पढ़ाई के लिए आसानी से जाते, मरीज अस्पताल जल्दी पहुंचते, सामान बाजार भेजा जा सकता था, पर्यटन रोजगार देता। लेकिन दस साल बाद भी हम धूल-कीचड़ में संघर्ष कर रहे हैं।’ दशकों की प्रतीक्षा में भी यह १० किलोमीटर लंबा सड़क खंड सिर्फ एक परियोजना नहीं है, बल्कि देश की आधारभूत संरचना विकास प्रणाली का प्रतिबिंब बन चुका है। स्थानीय निवासी, वाहन चालक और पर्यटन व्यवसायी बताते हैं कि जब तक योजना के कार्यान्वयन में पारदर्शिता, जवाबदेही और प्रभावी निगरानी नहीं होगी, तब तक ऐसे अधूरे सड़क विकास के प्रतीक नहीं बल्कि असफलता के उदाहरण ही बने रहेंगे। फेदाप की धूल-कीचड़ वाली सड़क अब केवल प्रश्न नहीं खड़ी करती, बल्कि निर्माण कंपनियों पर भी सवाल उठाती है। विकास केवल कागजात में नहीं, जनजीवन में महसूस होना चाहिए, तब ही फेदाप की सड़क वास्तव में विकास के मार्ग पर विश्वास का प्रतीक बनेगी।

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