
स्थानीय तह की सीमा संशोधन में विलंब क्यों?
समाचार सारांश
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- नेपाल में वर्तमान में 6 महानगरपालिका, 11 उपमहानगरपालिका, 276 नगरपालिका और 460 गाउँपालिका सहित कुल 753 स्थानीय सरकारें हैं।
- स्थानीय सरकार संचालन अधिनियम, 2074 ने गाउँपालिका या नगरपालिका की संख्या, सीमा, नाम, केन्द्र और वर्गीकरण में परिवर्तन के लिए कानूनी मार्ग खोला है।
- नेपाल नगरपालिका संघ ने जनसंख्या, आर्थिक गतिविधि और अवसंरचना के आधार पर स्थानीय तह पुनर्संरचना और स्तरोन्नति की सिफारिश की है।
वर्तमान में देश में 6 महानगरपालिका, 11 उपमहानगरपालिका, 276 नगरपालिका और 460 गाउँपालिका मिलाकर कुल 753 स्थानीय सरकारें हैं।
संविधान के अनुच्छेद 295 के तहत गठित स्थानीय तह पुनर्संरचना आयोग की सिफारिश और नेपाल सरकार के मंत्रिपरिषद के निर्णय (2073/74) के आधार पर ये स्थानीय सरकार निर्धारित किए गए हैं। इनके अंतर्गत आने वाले 6,743 वडा कार्यालय भी सक्रिय रूप से संचालित हो रहे हैं।
यह संरचनाएं न केवल स्थानीय लोकतंत्र को नागरिकों के द्वार तक पहुंचा रही हैं, बल्कि राज्य के प्रति जनविश्वास को भी मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
संघीय शासन प्रणाली के कार्यान्वयन के इस दौर में, स्थानीय सरकारों ने सेवा प्रदायगी, विकास निर्माण, योजना निर्माण और वित्तीय प्रबंधन में महत्वपूर्ण अनुभव अर्जित किया है।
साथ ही, जनसंख्या में आए बदलाव, आर्थिक गतिविधियों, पूर्वाधार के विकास, शिक्षा-स्वास्थ्य सेवाओं की वृद्धि और बाजार क्षेत्र के विस्तार के कारण गाउँपालिकाएं क्रमशः शहरी स्वरूप अपनाने लगी हैं। इससे प्राथमिक वर्गीकरण की पुनः समीक्षा आवश्यक हो गई है।
संविधान जारी होने के बाद की गई पुनर्संरचना ने तत्कालीन राजनीतिक और प्रशासनिक आवश्यकताओं को संबोधित किया था, लेकिन अब समय के अनुसार संरचनात्मक सुधार आवश्यक दिख रहे हैं।
नीतिगत दृष्टि से स्थानीय सरकार का वर्गीकरण केवल नाम या हैसियत बदलने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह सेवा की गुणवत्ता, प्रशासनिक क्षमता, सुगमता, वित्तीय स्थिरता और योजनाबद्ध शहरी विकास से गहरे तौर पर जुड़ा हुआ है।
उचित मानदंड और वस्तुनिष्ठ आधार पर पुनः वर्गीकरण करने से स्थानीय शासन अधिक सुदृढ़, उत्तरदायी और परिणाममुखी बन सकता है।
आर्थिक गतिविधि, अवसंरचना, जनसंख्या और जनघनत्व के आधार पर यथार्थपरक वर्गीकरण से संसाधनों का न्यायोचित वितरण और दीर्घकालिक शहरी योजना के क्रियान्वयन में सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
स्थानीय सरकार से ही क्यों?
विभिन्न अध्ययन दर्शाते हैं कि स्थानीय सरकार नागरिकों में अन्य स्तरों की सरकारों की तुलना में अधिक लोकप्रिय और विश्वसनीय होती हैं।
यह पुष्टि करता है कि सक्षम और प्रभावी स्थानीय शासन ही समग्र राष्ट्रीय विकास की आधारशिला है। लेकिन दो कार्यकाल के अनुभव के बाद सवाल उठता है—क्या स्थानीय तह की संख्या और सीमा अपरिवर्तनीय हैं?
संवैधानिक तथा कानूनी आधार
पुनर्संरचना का संवैधानिक आधार संविधान के अनुच्छेद 295(3) में निहित है, जो स्थानीय तह की संख्या और सीमा निर्धारण के लिए विशेष प्रावधान करता है।
हालांकि संघीयता एक गतिशील प्रक्रिया है, इसलिए स्थानीय सरकार संचालन अधिनियम, 2074 की धारा 3 और 4 ने गाउँपालिका और नगरपालिका की संख्या, सीमा, नाम, केन्द्र और वर्गीकरण में परिवर्तन के लिए कानूनी रास्ता खुला रखा है। इस अधिनियम ने महानगर और गाउँपालिका को लगभग समान अधिकार दिए हैं, जिससे कार्यगत विशिष्टता कमतर हो गई है।
पूर्व के स्थानीय स्वायत्त शासन अधिनियम, 2055 की तरह भौगोलिक, जनसांख्यिक और आर्थिक आधार पर अधिकार वितरण का प्रावधान वर्तमान में पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित नहीं है।
स्थानीय सरकार संचालन अधिनियम, 2074 में गाउँपालिका या नगरपालिका की संख्या या सीमा बदलने के लिए संबंधित सभा के दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित कर प्रदेश सरकार के माध्यम से संघ सरकार को भेजना आवश्यक है।
लेकिन इस तरह के परिवर्तन निर्वाचन से कम से कम एक वर्ष पहले पूरा होना चाहिए।
धारा 84 में दो या अधिक स्थानीय सरकारों के बीच सीमा, अधिकार क्षेत्र या प्राकृतिक स्रोत प्रयोग विवाद होने पर प्रदेश समन्वय परिषद द्वारा समन्वय और समाधान करने का प्रावधान है।
पुनर्संरचना के आधार
स्थानीय सरकार संचालन अधिनियम, 2074 की धाराएं 3 और 5 कई निश्चित आधारों पर पुनर्संरचना की अनुमति देती हैं, जिनमें शामिल हैं–
1. जनसंख्या एवं सेवा प्रवाह
पुनर्संरचना की पहली शर्त जनसंख्या का न्यायसंगत वितरण है। जनघनत्व और सेवा अनुपात में असंतुलन से बड़े स्थानीय सरकारों पर प्रशासनिक दबाव और छोटे स्तर पर संसाधनों का अपव्यय होता है। इसलिए सेवा की उपलब्धता और नागरिक संख्या के बीच संतुलन बनाना पुनर्संरचना का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए।
2. आर्थिक स्थिरता और संसाधनों का वितरण
प्राकृतिक संसाधन (पत्थर, बालू, पानी, वन) स्थानीय सरकार की आय का मुख्य स्तंभ हैं। संसाधनों के असमान वितरण से आर्थिक असंतुलन उत्पन्न होता है।
पुनर्संरचना की प्रक्रिया में प्राकृतिक संसाधनों का न्यायसंगत नक्शांकन कर सभी गाउरनगरपालिकाओं के आत्मनिर्भर बनने के न्यूनतम आधार सुनिश्चित करने होंगे, जिससे सीमा विवाद से बचा जा सके।
3. सुगमता और प्रशासनिक प्रभावशीलता
भौगोलिक निरंतरता और अनुकूलता से शासन की लागत कम होती है। प्रशासनिक केंद्र और सेवा प्राप्तकर्ताओं के बीच दूरी कम होना सुशासन को प्रभावशाली बनाता है।
स्थानीय भौगोलिक स्थिति को प्राथमिकता देते हुए सेवा प्रवाह और खर्च में सुधार करना चाहिए।
4. सामाजिक- सांस्कृतिक अपनत्व
स्थानीय सरकार केवल प्रशासनिक इकाई नहीं बल्कि सामाजिक पहचान का केंद्र भी है।
भाषा, संस्कृति और ऐतिहासिक संबंध रखने वाले समुदायों को एक ही प्रशासनिक संरचना में रखने से नागरिकों का अपनत्व बढ़ता है और सामाजिक पूंजी का निर्माण होता है, जिससे स्थानीय लोकतंत्र मजबूत बनता है।
क्षेत्रीय पुनर्संरचना की आवश्यकता क्यों?
स्थानीय तह की पुनर्संरचना नेपाल के इतिहास में सबसे बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक सुधार है, फिर भी इसका विमर्श अधूरा प्रतीत होता है।
कुछ बड़े और दुर्गम स्थानीय तहों तथा आर्थिक रूप से कमजोर इलाकों में वडाओं की सीमांकन और सेवा केन्द्रों की दूरी से नागरिकों की पहुँच प्रभावित हो रही है, जिससे सूक्ष्म पुनर्संरचना की जरूरत महसूस होती है।
भौगोलिक पुनर्संरचना अब केवल स्थलाकृति तक सीमित नहीं है, बल्कि कार्यभार, अधिकार और संसाधन वितरण से गहराई से जुड़ी है, जहाँ संघ, प्रदेश और स्थानीय तह के बीच अधिकारों का ओवरलैप, कानूनी अस्पष्टता और विवाद क्षेत्रीय सुधार को संस्थागत सुधार से मजबूती से जोड़ता है।
संसदीय व्यवस्था लागू हुए लगभग 10 वर्षों के बाद तथा दूसरे कार्यकाल के बचा लगभग 14 महीनों में पुनर्संरचना का दबाव तेज हुआ है।
इस पृष्ठभूमि में नेपाल नगरपालिका संघ का अध्ययन संघीय मामिला एवं सामान्य प्रशासन मंत्रालय को सौंपा गया, जिसने कई महत्वपूर्ण तथ्य उजागर किए हैं।
प्रशासनिक खर्च और अनुदान
वर्तमान प्रशासनिक खर्च और अनुदान की प्रवृत्ति स्थानीय सरकारों की वित्तीय स्थिरता को प्रभावित कर रही है। कई गाउँपालिका और नगरपालिका अभी भी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं हो सके हैं।
पिछले वर्षों में सशर्त अनुदान बढ़ने के साथ-साथ समानतुल्य अनुदान में कमी से स्थानीय सरकार की वित्तीय स्वायत्तता कमजोर हुई है क्योंकि सशर्त अनुदान केंद्र सरकार के प्राथमिकताओं को अधिक गतिशील बनाता है।
पूंजीगत बजट की तुलना में प्रशासनिक खर्च अधिक होने पर विकास और निवेश सीमित हो जाता है। यदि यही स्थिति बनी रही तो छोटे स्थानीय सरकारों के बीच संसाधन विभाजन करते समय कार्यकुशलता में गिरावट और दोहरी संरचना की समस्या बढ़ेगी।
इसलिए दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता, सेवा गुणवत्ता और संसाधनों के प्रभावी उपयोग के लिए 753 स्थानीय सरकारों की संरचना का पुनः अध्ययन और ‘राइट-साइजिंग’ पर गंभीर चर्चा आवश्यक है।
सीमा विवादों का समाधान
स्थानीय सरकारों और स्थानीय व प्रदेश सरकारों के बीच प्राकृतिक स्रोतों (पत्थर, बालू, पानी, वन) के उपयोग और राजस्व संग्रह में विवाद व्याप्त हैं।
स्पष्ट सीमांकन की कमी, अधिकार क्षेत्र के ओवरलैप और कानूनी अस्पष्टताओं ने एक ही संसाधन पर अनेक दावों को जन्म दिया है।
इससे संसाधनों के सतत उपयोग में बाधा, राजस्व संग्रह में कमी और अनियमित दोहन का खतरा बढ़ा है।
जैसे, हुप्सेकोट गाउँपालिका का कावासोती नगरपालिका और पाल्पा का निस्दी गाउँपालिका के साथ सीमा विवाद ने जल स्त्रोत, वन क्षेत्र और सड़क अवसंरचना में समस्या उत्पन्न की है।
जिससे स्थानीय निवासी बुनियादी सेवाओं से वंचित हैं और विकास परियोजनाएं ठप पड़ी हैं।
पहाड़ी और मधेशी इलाकों में वन की सीमाएं अस्पष्ट हैं और विकास सामग्री निकासी में स्थानीय सरकारों पर अकर्मण्यता या अतिक्रमण के आरोप लगते रहे हैं। संघीय और प्रदेश कानून के कुछ प्रावधानों के कारण अधिकार विवाद और तीव्र हो गया है।
विलंब या राजनीतिक उदासीनता?
सङ्घीय मामिला तथा सामान्य प्रशासन मंत्रालय के अनुसार इलाम से बाजुरा तक विभिन्न नगर और गाउँपालिकाओं से वडा विभाजन और सीमा संशोधन के लिए प्रदेश सरकार के माध्यम से 97 आवेदन प्राप्त हो चुके हैं।
लेकिन वर्षों बीतने के बावजूद इन मामलों में ठोस प्रगति नहीं हुई है।
बार-बार आवेदन और शिकायतें आने के बावजूद मंत्रालय में आवश्यक तकनीकी जाँच, तथ्यात्मक मूल्यांकन और राजनीतिक समन्वय की कमी के कारण कार्यान्वयन में समस्या देखी जाती है।
इससे स्थानीय सरकार और तीन स्तरों की सरकारों के बीच संबंध तनावपूर्ण हो रहे हैं। यह केवल प्रशासनिक कमजोरी नहीं, बल्कि राजनीतिक निर्णय से जुड़ा मुद्दा है।
चार जिलों का अन्याय या बाध्यता?
नेपाल के 77 जिलों में से चार जिला मुख्यालय अभी भी नगरपालिका घोषित नहीं किए गए हैं—हुम्ला की सिमकोट, मनाङ की चामे, मुस्ताङ की जोमसोम और रसुवा की धुन्चे।
यह क्षेत्र अभी भी गाउँपालिका के रूप में हैं। जिला प्रशासनिक केन्द्र होते हुए भी यहाँ का नगरपालिका स्तर का अवसंरचना और पहचान न होना अन्यायपूर्ण है।
जनसंख्या घनत्व, जिला मुख्यालय तक पहुँच और भूमिका के आधार पर नगरपालिका घोषित होने पर योजना और बजट संरचना में सुधार और बड़े-छोटे विकास परियोजनाओं में निवेश आकर्षित हो सकता है।
उदाहरण के लिए, रौतहट में केवल जनसंख्या के आधार पर 16 नगरपालिकाएं गठित की गईं, लेकिन लंबे समय से जिला शहर के दर्जे वाले स्थान अभी भी गाउँपालिका हैं, जो नीति दृष्टि से अनुचित और हास्यास्पद प्रतीत होता है।
सिर्फ जनसंख्या को मानदंड मानकर पुनरावलोकन करने पर जनगणना 2078 के अनुसार कई नगर और महानगरपालिकाएं आवश्यक मानदंड पूरी नहीं करती हैं।
आर्थिक केन्द्र की नई रूपरेखा
नेपाल नगरपालिका संघ की ताजा रिपोर्ट जनघनत्व, आर्थिक गतिविधि और जनसंख्या के आधार पर कुछ शहरों के स्तरोन्नति की आवश्यकता दिखाती है।
उदाहरण के तौर पर, बुटवल उपमहानगरपालिका पश्चिम नेपाल का महत्वपूर्ण आर्थिक प्रवेश द्वार है।
आसपास के पाल्पा, कपिलवस्तु और रुपन्देही के शहरी क्लस्टरों को समेट कर इसे महानगरपालिका में स्तरोन्नत करने के पर्याप्त आधार हैं।
काभ्रे उपत्यका के धुलिखेल, बनेपा और पनौती जैसी ऐतिहासिक नगरपालिका अपनी मौलिक पहचान बनाए रखते हुए उपमहानगरपालिका के रूप में विकसित की जा सकती हैं, जिससे साझा अवसंरचना और आर्थिक-सामाजिक पक्ष मजबूत होंगे।
इसी तरह, लुम्बिनी प्रदेश के सिद्धार्थनगर और कोशी प्रदेश के दमक नगरपालिका उपमहानगरपालिका बनने के लिए उपयुक्त पूर्वाधार और आर्थिक मापदंड पूरा कर चुके हैं।
जनसंख्या और शहरी निरंतरता के आधार पर जुड़े हुए क्षेत्रों को एकीकृत करके और अधिक मजबूत संरचना बनाई जा सकती है।
कर्णाली प्रदेश में अभी तक कोई महानगर या उपमहानगरपालिका नहीं है, ऐसे में प्रदेश राजधानी वीरेन्द्रनगर को उपमहानगरपालिका घोषित कर लक्षित निवेश के माध्यम से सक्षम आर्थिक केन्द्र बनाना आवश्यक है।
यह कर्णाली प्रदेश में विकास का गुणात्मक प्रभाव डालेगा।
इसी प्रकार, दाङ-राप्ती सहित तीव्र शहरीकरण वाले हिमाली और पहाड़ी क्षेत्रों की 31 गाउँपालिकाओं को नगरपालिकाओं में स्तरोन्नत्त किया जाना चाहिए, जिससे प्रभावी शहरी प्रबंधन और सेवा प्रदान सुनिश्चित हो सके।
अंतरराष्ट्रीय अभ्यास
दुनिया के सफल संघीय देश समय-समय पर स्थानीय सरकारों की संख्या घटाने या बढ़ाने का अभ्यास करते हैं।
डेनमार्क में 2007 में लागू स्थानीय सरकार संरचनात्मक सुधार ने छोटे नगरपालिकाओं को मिलाकर बड़े और सक्षम स्थानीय सरकार बनाए।
जापान में 1990 के दशक के अंत में आर्थिक मंदी और घटती जनसंख्या के कारण मर्जर कार्यक्रम लागू हुआ। 1999 में लगभग 3,230 नगरपालिका वाली जापान में 2010 तक यह संख्या 1,720 तक आ गई।
इससे अधिकांश स्थानीय सरकारों का एकीकरण हुआ देखा गया।
कनाडा के टिल्ट कोव नगर में 400 से कम जनसंख्या है, यह कनाडा के सबसे छोटे शहरों में से एक है।
कनाडा में नगरपालिकाओं का वर्गीकरण केवल जनसंख्या पर आधारित नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक स्थिति, भौगोलिक दूरी, सेवा आवश्यकताओं और प्रशासनिक परंपरा पर आधारित होता है, जिससे छोटे आकार के स्थानों को भी स्थानीय सरकार के रूप में बनाए रखा जाता है।
यह दर्शाता है कि नगरपालिका घोषणा करते समय केवल जनसंख्या नहीं, बल्कि भौगोलिक स्थिति, पहुँच, सेवा वितरण और स्थानीय आवश्यकताएं भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।
नेपाल में भी आगामी पुनर्संरचना केवल प्रशासनिक विभाजन नहीं, बल्कि आर्थिक क्षेत्रीय क्लस्टर विकास के आधार पर होनी चाहिए।
मजबूत वडाएं और पहचान का संरक्षण
वडों को केवल ‘सिफारिश केन्द्र’ तक सीमित रखना स्थानीय सरकार की मूल संरचना को कमजोर करता है।
वड़ा नागरिकों के सबसे नजदीकी प्रशासनिक इकाई होते हैं, जिसमें सेवा प्रवाह, योजना चयन और सामाजिक उत्तरदायित्व में निर्णायक भूमिका होती है।
लेकिन अत्यंत छोटे, बिखरे और संसाधनहीन वडें पर्याप्त तकनीकी जनशक्ति बनाए नहीं रख पातीं और प्रभावी सेवा प्रदान करने में असमर्थ होती हैं।
इसलिए जनसंख्या, भौगोलिक पहुंच और सेवा क्षेत्र के आधार पर ऐसी वडाओं को एकीकृत कर “मजबूत वड़ा” बनाना आवश्यक है, जो प्रशासनिक खर्च कम करते हुए सेवा की गुणवत्ता और जिम्मेदारी दोनों बढ़ाएं।
तेजी से हो रहे शहरीकरण के संदर्भ में प्रत्येक नगरपालिका में कम से कम एक शहरी योजनाकार और एक पर्यावरण विशेषज्ञ की पदावनत्ति अनिवार्य होनी चाहिए।
वर्तमान में कई नगर और गाउँपालिकाओं में तकनीकी क्षमता के अभाव के कारण बेतरतीब बसावट, पर्यावरणीय जोखिम और असंतुलित अवसंरचना विकास देखने को मिल रहा है।
यदि पर्याप्त तकनीकी जनशक्ति उपलब्ध हो तो भूमि उपयोग योजना, हरित क्षेत्र संरक्षण, जोखिम प्रबंधन और सतत अवसंरचना विकास को संस्थागत किया जा सकता है।
स्थानीय तह की पुनर्संरचना केवल राजनीतिक और प्रशासनिक सुधार ही नहीं, बल्कि नेपाल के आर्थिक विकास, सतत शहरी प्रबंधन और संघीयता के सुदृढ़ीकरण से जुड़ी एक महत्वपूर्ण रणनीतिक एजेंडा है।
संघीयता के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए मजबूत स्थानीय सरकार पहली शर्त है। इसके लिए समय की मांग के अनुसार स्थानीय तह की संरचनात्मक सुधार और तहगत सरकारों में स्पष्ट कार्य विभाजन आवश्यक है।
तीनों स्तरों की सरकारों के बीच प्रभावी समन्वय सुनिश्चित करने के लिए संस्थागत पुनर्संरचना जरूरी है।
संघीय मामिला को प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद कार्यालय के अंतर्गत रखकर अंतर-सरकारी समन्वय को मजबूत करना और सामान्य प्रशासन को मानव संसाधन और प्रबंधन केंद्रित एक स्वतंत्र विभाग के रूप में विकसित करना उपयुक्त होगा।
सरकार द्वारा आगे बढ़ाए गए प्रशासनिक सुधार एजेंडे में इस विषय को नीति रूप में सम्मिलित करना जरूरी है।
ऐसे महत्वपूर्ण पहलू की अनुपस्थिति में अपेक्षित सुधार प्राप्त करना कठिन होगा। तथापि, संविधान संशोधन की पहल सकारात्मक है और क्षेत्रीय सुधार एजेंडे में इसे शामिल किया जाना आवश्यक है।
अधिनियम के स्पष्ट प्रावधानों के अनुसार स्थानीय सरकार की वर्गीकरण, स्तरोन्नति, सीमा संशोधन, समायोजन और विवाद समाधान आगामी चुनाव से कम से कम एक वर्ष पहले पूरा होना चाहिए।
इसलिए, नगरपालिका और उपमहानगरपालिकाओं में स्तरोन्नति की संभावनाएं रखने वाले क्षेत्रों और सीमा विवाद वाले स्थानों का समय पूर्व समाधान करने के लिए नेपाल सरकार को तकनीकी टीम गठित कर विवादित क्षेत्रों का जीपीएस सर्वेक्षण और साइट पर अध्ययन तुरंत प्रारंभ करना चाहिए।
साथ ही वर्गीकरण, स्तरोन्नति, सीमा संशोधन या समायोजन से संबंधित प्रस्तावों को मंत्रिपरिषद से शीघ्र स्वीकृति लेकर राजपत्रित करने की प्रक्रिया भी तुरंत आगे बढ़ानी चाहिए।
क्षेत्रीय पुनर्संरचना एक निरंतर गतिशील प्रक्रिया है। अतः सरकार को केवल तात्कालिक विवाद समाधान नहीं करना चाहिए, बल्कि दीर्घकालीन रणनीति भी बनानी चाहिए।
इसके लिए सीमा विवादों की पहचान, प्राकृतिक संसाधनों की उत्पादकता का मूल्यांकन और वस्तुनिष्ठ मानदंडों पर वर्गीकरण और स्तरोन्नति को निरंतर सुधारने के लिए स्थायी संस्थागत संरचना स्थापित करना आवश्यक है। साथ ही समयानुकूल कानूनी संशोधनों के माध्यम से समस्याओं का स्थायी समाधान सुनिश्चित करना होगा।
(देवकोटा नेपाल, नेपाल नगरपालिका संघ के कार्यकारी निर्देशक हैं।)