
मल्ल ने बचाया कम्युनिस्ट का किला
समाचार सारांश
- रमेश मल्ल ने सल्यान में २३,१८९ मतों के साथ पहली बार संसद में जीत हासिल कर कम्युनिस्ट किले को बचाया।
- मल्ल ने बताया कि सल्यान की माओवादी आंदोलन की विरासत, नेतृत्व टीम, युवाओं की भावना और गांव-गांव की अंतःक्रिया से उनकी जीत सुनिश्चित हुई।
- उन्होंने कहा कि आधारभूत आवश्यकताएँ पूरी न होने के कारण मतदाताओं ने मत बदले, लिहाजा वाम आंदोलन को पुनः एकीकृत करना आवश्यक है।
४ चैत्र, काठमांडू। नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (नेकपा) के पक्ष में समग्र चुनावी नतीजे उतने सकारात्मक नहीं रहे। लेकिन रमेश मल्ल ने सल्यान में अपनी जीत सुनिश्चित करते हुए कम्युनिस्ट किले को बचा लिया। रास्वपा के पक्ष में उभार आने के बावजूद वह २३,१८९ मतों के साथ निर्वाचित हुए।
उनके प्रतिद्वंदी रास्वपा के ललितकुमार चन्द को २०,९०४, कांग्रेस के केशव बहादुर विष्ट को १७,५५८ और एमाले के गुलावजंग शाह को १५,३७३ मत प्राप्त हुए।
कड़ी प्रतिस्पर्धा के बीच रोमांचक जीत निकालने वाले मल्ल ने कहा, ‘चुनाव में जाते समय मुझे विश्वास था कि सल्यान जीतेंगे, लेकिन अंतिम परिणाम आने पर यह जीत और भी रोमांचक हो गई।’
मतगणना के दौरान देश भर में रास्वपा की बढ़त की खबरें सुनकर वे थोड़े आशंकित हो गए थे। उन्होंने बताया, ‘मुझे लगा था कि इतनी बड़ी लहर नहीं आएगी। गणना में हम दंग रह गए। लेकिन सल्यान में जीत की मेरी पूरी उम्मीद थी और वह सच साबित हुई।’
मल्ल ने सल्यान में जीत के चार कारण बताए।
पहला– सल्यान माओवादी आंदोलन का मुख्य आधार है। उन्होंने कहा, ‘यहाँ बड़े बलिदान हुए हैं। ढाई सौ से अधिक शहीद और कई गुमशुदा हैं। उस बलिदान की विरासत ने यहाँ का जनाधार बनायीं है।’

दूसरा– पार्टी के पास एक मजबूत नेतृत्व टीम थी। मल्ल ने कहा, ‘टीम एकजुट होकर कार्यरत थी और अभिभावक की भूमिका निभा रही थी।’
तीसरा– उन्होंने युवाओं की भावनाओं को समझकर अपने आप को उम्मीदवार बनाया, जिससे वे विजयी हुए। उन्होंने बताया, ‘मेरी उम्मीदवारी ने युवा पीढ़ी का स्वामित्व दिखाया और युवाओं को आकर्षित किया।’
चौथा– उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों के साथ अंतःक्रिया की, जिससे उनकी जीत सुनिश्चित हुई। मल्ल ने कहा, ‘किसान, मजदूर और बुद्धिजीवियों से जुड़ कर हमने यह प्रेम और विश्वास पाया, यही इस जीत का परिणाम है।’
यह मल्ल का संसद में पहली बार प्रवेश था और पहली कोशिश में ही वे सफल हुए। हालांकि उन्होंने माना कि पार्टी के कमजोर नतीजे अपेक्षा के अनुरूप काम न कर पाने का परिणाम हैं।
मल्ल के अनुसार, आधारभूत आवश्यकताओं के पूरा न होने के कारण मतदाता ने अपना मत बदला। उन्होंने कहा, ‘पार्टी को इसका गंभीर समीक्षा करनी चाहिए। युवा पीढ़ी अपना स्थान खोज रही है। पारदर्शिता, जवाबदेही और प्रदर्शन आवश्यक है, और हम अपेक्षा अनुसार काम नहीं कर पाए।’
मल्ल का यह भी तर्क है कि पार्टी सरकार में रही लेकिन प्रयास पर्याप्त नहीं थे। उन्होंने कहा, ‘राजनीतिक परिवर्तन में योगदान दिया, पर उनकी सेवा में सफल नहीं रहे। यही कमजोरी है। नई पीढ़ी को स्थान देने में हिचकिचाहट दिखी, इसलिए नई पीढ़ी ने विकल्प खोजा।’
२०६४ में माओवादी बहुत बड़ी शक्ति बनी, लेकिन पार्टी के विभाजन से जनता के म्यान्डेट का ठीक उपयोग नहीं हो सका। इसीलिए इस चुनाव में नई शक्ति उभरी। मल्ल के अनुसार, ‘चुनाव जीत-हार से बड़ा लोकतंत्र का सुदृढ़ीकरण है। चुनाव फिर होंगे, लेकिन प्रणाली मजबूत होनी चाहिए।’
मल्ल ने कहा, ‘गांवों में अभी भी बिजली, पानी, सड़क, मोबाइल चार्जिंग की समस्याएं हैं। स्वास्थ्य और शिक्षा कमजोर हैं। रोजगार नहीं है, युवाओं का पलायन हो रहा है। जनताएं मूलभूत सुविधाएं चाहती हैं, इस चुनाव में यही वोटर की निराशा थी।’
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि विकास के कुछ काम हुए हैं। ‘सल्यान में बिजली पहुंच ५ प्रतिशत से बढ़कर ८० प्रतिशत हो गई है। सड़क, टेलिकॉम टावर और कृषि उत्पादन भी बढ़ा है, पर उम्मीदें ज्यादा हैं और उपलब्धि पूरी नहीं मानी जा सकती।’
अब मल्ल वाम आंदोलन को पुनः एकीकृत करने पर जोर देते हैं। वे कहते हैं, ‘पुरानी पीढ़ी को अपनी गलतियाँ माननी चाहिए और नई पीढ़ी को नेतृत्व लेने का साहस दिखाना होगा।’
अगले संसद में उनकी पार्टी की सीट संख्या कम होगी, लेकिन वे जनता की आवाज को बुलंद बनाएंगे। मल्ल कहते हैं, ‘पहली प्राथमिकता जनता की मूलभूत आवश्यकताएं हैं – बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य एवं शिक्षा के लिए लड़ाई लड़ूंगा।’
शांति प्रक्रिया के बाकी कार्य अभी पूर्ण नहीं हुए। रास्वपा की बड़ी ताकत बनने के कारण यह जिम्मेदारी अब उसी के कंधों पर है। मल्ल ने कहा, ‘शांति प्रक्रिया और संविधान के क्रियान्वयन का नेतृत्व अब रास्वपा के कंधे पर है।’
मल्ल माओवादी आंदोलन के दौरान १० वर्ष की कठिन भूमिगत जीवन से राजनीति में आए नेता हैं। वे सल्यान से ही छात्र राजनीति शुरू करने के कारण एक परिचित चेहरा हैं, जिसे जीत हासिल करने में मदद मिली।
उनका राजनीतिक सफर २०५० साल में तत्कालीन माओवादी निकट अनेरास्ववियु (क्रान्तिकारी) से छात्र आंदोलन शुरू करने के साथ हुआ। २०५३ में वे शीतल उच्च मावि इकाई समिति सदस्य बने, २०५४ में सल्यान जिला समिति सदस्य और २०५६ में जिला अध्यक्ष बने।
शांति प्रक्रिया के बाकी कार्य अभी भी अधूरे हैं और रास्वपा बड़ी ताकत होने के नाते उसकी जिम्मेदारी उसके कंधों पर आ गई है, ऐसा मल्ल कहते हैं।
उन्होंने २०५८ में विराटनगर में सम्पन्न अनेरास्ववियु (क्रान्तिकारी) एकता राष्ट्रीय सम्मेलन से केन्द्रीय सदस्य का मार्ग भी बनाया। २०५९ से २०६२ तक सेती-महाकाली क्षेत्रीय समन्वय समिति संयोजक, बाद में सचिवालय सदस्य, केन्द्रीय समिति कोषाध्यक्ष, उपाध्यक्ष और २०७१ में केन्द्रीय संयोजक बने। २०७२ में अखिल क्रान्तिकारी के केन्द्रीय अध्यक्ष रहे।

२०५४ में पूर्णकालीन कार्यकर्ता बनकर तत्कालीन नेकपा माओवादी के सशस्त्र संघर्ष में भाग लेने वाले मल्ल पार्टी के संगठित सदस्य बने। २०५७ में जिला समिति सदस्य और २०६० में सेती-महाकाली क्षेत्रीय ब्यूरो सदस्य की जिम्मेदारी संभाली। २०६१ में पश्चिम केन्द्रीय कमान्ड के स्कूल विभाग सदस्य रहे।
मल्ल २०६५ में एकीकृत नेकपा (माओवादी) के नेवा राज्य समिति सदस्य, २०७३ में नेकपा (माओवादी केन्द्र) के केन्द्रीय सदस्य एवं पोलिटब्यूरो सदस्य, २०७८ में पोलिटब्यूरो सदस्य और उपत्यका विशेष प्रदेश के सह-इन्चार्ज रहे। वर्तमान में वे नेकपा के केन्द्रीय सदस्य हैं।
२०७९ पौष से २०८१ असार तक उन्होंने प्रधानमंत्री पुष्पकमल दाहाल प्रचंड के निजी सचिव के रूप में भी कार्य किया।
त्रिभुवन विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त मल्ल ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव के अर्निको प्रावि से ली, माध्यमिक शिक्षा रुकुम के शीतल उमावि चौरजहारी से पूरी की और अब जनता ने उन्हें पहली बार संसद में भेजा है।
तस्वीर/वीडियो : कमल प्रसाईं