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सम्पत्ति जाँचबुझ के हो ? आयोगले कसरी गर्छ काम ? – Online Khabar

सम्पत्ति जाँच क्या है? आयोग कैसे करता है काम?

समाचार सारांश प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह के नेतृत्व में सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश राजेन्द्रकुमार भण्डारी की संयोजकता में पांच सदस्यीय संपत्ति जाँच आयोग का गठन किया है। इस आयोग को 2048 साल से सार्वजनिक पदों पर रहने वाले उच्च पदस्थ राजनेताओं और कर्मचारियों की संपत्ति की जांच करने का आदेश मिला है। यह आयोग तथ्यांक एकत्रित कर विश्लेषण करेगा, सरकार को रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा और आगे की जांच के लिए सुझाव देगा। 3 वैशाख, काठमांडू। प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह की अगुवाई में सरकार बनने के बाद पहली मंत्रिपरिषद बैठक में प्रधानमंत्री एवं मंत्रिपरिषद कार्यालय के अधीन संपत्ति जांच समिति बनाने की घोषणा की गई थी। लगभग तीन सप्ताह में सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश राजेन्द्रकुमार भण्डारी की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय संपत्ति जांच आयोग गठित करने का निर्णय लिया। आयोग में पुनरावेदन अदालत के दो पूर्व न्यायाधीश, नेपाल पुलिस के एक पूर्व डीआईजी तथा एक चार्टर्ड अकाउंटेंट सदस्य भी शामिल हैं। जबकि सरकार ने आयोग के अधिकार क्षेत्र को सार्वजनिक नहीं किया है, पुराने निर्णयों के अनुसार 2048 साल से सार्वजनिक पदों पर रहे उच्च पदस्थ राजनेताओं और कर्मचारियों की संपत्ति की जांच का उल्लेख है। सरकार के अनुसार संपत्ति जांच दो चरणों में होगी – 2062/63 साल से वर्तमान तक तथा 2048 साल तक की अवधि।

संपत्ति जांच क्या है? आयोग कैसे काम करता है और क्या प्रकार के सुझाव दे सकता है? इस विषय पर पत्रकार कृष्ण ज्ञवाली द्वारा तैयार किए गए सवाल-जबाव इस प्रकार हैं: जांच आयोग क्या है? यह राज्य के उन नियमित तंत्रों के लिए बनता है जिनके लिए विशिष्ट मामलों की जांच करना मुश्किल होता है। यह फक्ट फाइंडिंग कमीशन होता है। 2026 साल में जारी जांच आयोग अधिनियम के तहत नेपाल में इस प्रकार के आयोग बनाए जाते हैं। ये आयोग न्यायालय के समान अधिकार रखते हैं, जिनके पास व्यक्तियों को तलब करने, बयान लेने व सबूत मांगने का अधिकार है। आयोगों के पास सहयोग न करने वालों को गिरफ्तार करने और जुर्माना लगाने का भी अधिकार है। आयोग तथ्य एकत्रित कर उन्हें विश्लेषित करते हुए सरकार को रिपोर्ट प्रस्तुत करता है और आवश्यकतानुसार आगे की जांच की सिफारिश करता है। प्रमुख न्यायाधीश के नेतृत्व वाले आयोग में संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ सदस्य होते हैं और पदाधिकारी गोपनीयता की शपथ लेते हैं। सरकार भी इस प्रक्रिया में सहयोग करती है।

जांच आयोग और संपत्ति जांच आयोग में क्या अंतर है? नेपाल में सामान्यत: आपराधिक घटनाओं या मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाओं में विशेषज्ञ आयोग बनाए जाते हैं। लेकिन, 2058 साल में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश भैरवप्रसाद लम्साल की अध्यक्षता में विशेष संपत्ति जांच आयोग गठित किया गया था जिसका उद्देश्य सार्वजनिक पदाधिकारियों की संपत्ति की जांच करना था। अन्य आयोग अपराध अनुसंधान करते हैं जबकि संपत्ति जांच आयोग सार्वजनिक पदाधिकारियों की संपत्ति की छानबीन करता है। राजनीतिक बदलाव और संपत्ति जांच का संबंध राजनीतिक परिवर्तन के बाद पूर्व सत्ताधारी वर्ग की संपत्ति की जांच करना प्रचलित रहा है। सार्वजनिक पद पर रहते हुए दुरुपयोग से अर्जित अवैध संपत्ति की खोज ही संपत्ति जांच का मूल उद्देश्य है।

2046 साल से पंचायती कालीन नेताओं की संपत्ति जांच की मांग होती रही है किन्तु यह ठोस रूप नहीं ले सकी। 2058 में गठित लम्साल आयोग इसका एक उदाहरण है। माओवादी शांति प्रक्रिया में भ्रष्टाचार और अवैध संपत्ति की जांच व्यवस्था थी, परन्तु उसे लागू नहीं किया गया। हालिया राजनीतिक उठापटक के चलते यह विषय फिर सक्रिय हुआ है। संपत्ति जांच कैसे होती है? आयोग उच्च पदों पर रहे सार्वजनिक पदाधिकारियों से संपत्ति विवरण मांगती है और आय के अनुरूप उनकी संपत्ति का विश्लेषण कर असामान्य संपत्ति का पता लगाती है। यदि संदेह होता है तो बयान भी लिया जा सकता है। नेपाल में 2058 साल से सार्वजनिक पद पर रहे लोगों को संपत्ति विवरण देना जरूरी है जिसे आयोग जांच के लिए उपयोग करता है। संपत्ति को वैध या गैरकानूनी कैसे माना जाता है? संविधान के अनुसार प्रत्येक नागरिक को संपत्ति का अधिकार है, किन्तु सार्वजनिक पदाधिकारियों को वैध माध्यम से ही संपत्ति अर्जित करनी होती है। आयोग मुख्य रूप से वैध आय से तुलना कर असामान्य संपत्ति पाए जाने पर जांच की सिफारिश करता है।

संपत्ति मूल्यांकन का मानदंड क्या है? 2058 में गठित लम्साल आयोग से लेकर आज तक अख्तियार के अनुभव, सर्वोच्च न्यायालय के फैसले और न्यायिक सिद्धांतों के आधार पर संपत्ति परीक्षण के मानदंड बनाए गए हैं। मूल रूप से सार्वजनिक पद पर रहने वाले व्यक्ति की तनख्वाह और सुविधाओं से 70 प्रतिशत की बचत अनुमानित की जाती है। इसी आधार पर उससे अधिक संपत्ति होने पर उसे संदिग्ध माना जाता है। गैरकानूनी संपत्ति एक अपराध है जिसके लिए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 2059 की धारा 20 के अंतर्गत 1 से 3 साल तक जेल व जुर्माना हो सकता है। संपत्ति जब्त करने के साथ एक वर्ष अतिरिक्त कैद भी हो सकती है। आयोग न्यायाधीश व सैनिकों की संपत्ति की जांच भी कर सकता है। आयोग की रिपोर्ट के आधार पर अन्य संस्थाएं विस्तृत जांच और कार्रवाई करती हैं। रिपोर्ट के आधार पर ही मुकदमा चलाया नहीं जाता। वरिष्ठ अधिवक्ता राजुप्रसाद चापागाई के अनुसार आयोग मुकदमा नहीं चला सकता, केवल संदेहित पक्षों की आगे जांच की सलाह देता है।

क्यों शक्तिशाली आयोग का गठन? नियमित संस्थाओं पर राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण प्रभावी जांच कठिन होने पर सरकार ने विशेष जांच आयोग गठित किया है। वरिष्ठ अधिवक्ता हरिहर दाहाल बताते हैं कि आयोग का कार्य तथ्य संग्रहण तक सीमित होता है, वह मुकदमेबाजी नहीं करता। रिपोर्ट के आधार पर संबंधित संस्था आगे जांच करती है।

लम्साल आयोग की महत्वपूर्ण रिपोर्ट 2058 में भैरव लम्साल की अध्यक्षता में बनी रिपोर्ट में प्रमुख राजनेताओं और प्रशासकों की अवैध संपत्ति उजागर हुई थी। लेकिन राजनीतिक कारणों से प्रभावी कार्रवाई नहीं हो पाई। जांच के दायरे में कौन-कौन आते हैं? पहले चरण में पूर्व प्रधानमंत्री, उच्च पदाधिकारी और संवैधानिक संस्थाओं के व्यक्तियों की संपत्ति जांच में आ सकती है। इनमें कुछ पूर्व राजनीतिज्ञ आर्थिक विवादों में भी शामिल हैं। संपत्ति जांच की चुनौतियां और सहजताएं 2058/59 के आसपास नेपाली समाज में सार्वजनिक पद पर रहते हुए संपत्ति जमाने का चलन शुरू हुआ था। भ्रष्टाचार से जमा संपत्ति सामाजिक प्रतिष्ठा का साधन भी बन गई थी। लेकिन हाल के दशकों में भ्रष्टाचार व संपत्ति छुपाने की प्रवृत्ति विदेशों तक फैल गई है। अख्तियार सहित कई संस्थाओं ने भ्रष्टाचार और संपत्ति संबंधी मामले दर्ज किए हैं एवं विविध आर्थिक अपराधों के आरोप लगाए हैं। पत्रकार हरिबहादुर थापा के अनुसार नया आयोग कुछ क्षेत्रों में सुविधा प्रदान करेगा किन्तु चुनौतियां भी हैं क्योंकि संपत्ति छुपाने के तरीके और जटिल हो गए हैं।

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