
तालिबान कौन हैं? पाकिस्तान के साथ उनके संघर्ष के कारण क्या हैं?
समाचार सारांश
समीक्षा के बाद प्रस्तुत।
- तालिबान ने सन 1996 से 2001 तक अफगानिस्तान में शासन किया और 2021 में पुनः सत्ता संभाली, वर्तमान में शरिया कानून पर आधारित शासन चला रहा है।
- पाकिस्तान ने 17 लाख अफगान शरणार्थियों को निर्वासित करने और सीमा पर घेराबंदी तेज करने से दोनों देशों के बीच संघर्ष बढ़ गया है।
- तालिबान द्वारा शासित अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच युद्ध केवल दो देशों तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण और मध्य एशिया की स्थिरता को खतरे में डाल रहा है।
काठमांडू। अफगानिस्तान के आकाश में पाकिस्तानी लड़ाकू विमानों की गर्जना और जमीन पर तालिबान की तोपों की आवाज़ से दक्षिण एशिया की शांति भंग हो रही है। पूर्वी प्रांतों नंगरहार, पाक्तिका और खोस्त में तालिबानी लड़ाके पाकिस्तानी सैन्य ठिकानों पर भीषण हमले कर रहे हैं।
पाकिस्तान ने आधिकारिक तौर पर ‘खुला युद्ध’ की घोषणा किए जाने के बाद सीमा क्षेत्र युद्ध भूमि बन गया है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, फरवरी 2026 के अंतिम सप्ताह में ही 6,600 से अधिक अफगान नागरिक विस्थापित हुए हैं।
भू-राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस विनाशकारी संघर्ष के केंद्र में तालिबान है। पाकिस्तान के लिए जिसे कभी अपनी ‘रणनीतिक गहराई’ माना जाता था, यह संगठन अब सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है।
यह रिपोर्ट सोवियत आक्रमण से अमेरिकी फिर्ती तक और तेहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के उदय से लेकर वर्तमान संघर्ष तक के ऐतिहासिक व राजनीतिक यात्रा का दस्तावेज़ है।
तालिबान का जन्म कैसे हुआ?
‘तालिबान’ शब्द पश्तो भाषा के ‘तालिब’ से निकला है, जिसका अर्थ ‘विद्यार्थी’ है। यह कट्टरपंथी इस्लामी लड़ाकू समूह है जिसने सन 1996 से 2001 तक अफगानिस्तान में शासन किया और अगस्त 2021 में पुनः सत्ता संभाली। इनके वैचारिक आधार देवबंदी इस्लाम की कठोर व्याख्या और पश्तुन परंपरा (पश्तुनवाली) का मिश्रण है।
तालिबान की उत्पत्ति 1979 के सोवियत आक्रमण के समय हुई थी। सोवियत यूनियन द्वारा अफगानिस्तान के कम्युनिस्ट सरकार को समर्थन देने के लिए सेना भेजे जाने पर ‘मुजाहिदीन’ ने प्रतिरोध शुरू किया। पाकिस्तान के राष्ट्रपति जिया-उल-हक और अमेरिकी गुप्तचर एजेंसियों ने उन मुजाहिदीन को भारी मात्रा में हथियार और प्रशिक्षण दिया।
पाकिस्तान ने इस समूह को अपनी रणनीतिक हथियार बनाया था, जो अब उसके खिलाफ खड़ा है।
गुप्तचर एजेंसी आइएसआई ने सम्पूर्ण सहायता नियंत्रण में रखी थी। 1989 में सोवियत फौज की वापसी के बाद मुजाहिदीन समूहों के बीच गृहयुद्ध छिड़ गया, जिससे देश में अराजकता फैल गई।
इसी वैकल्य में 1994 में कंधार के मुल्ला मोहम्मद उमर ने तालिबान की स्थापना की। उमर स्वयं सोवियत विरोधी पूर्व सैनिक थे। उन्होंने पाकिस्तानी मदरसों में पढ़ने वाले पश्तुन विद्यार्थियों को एकजुट किया, जिन्होंने इस नाम ‘तालिबान’ को अपनाया।
उन्होंने सुरक्षा और शरीयत कानून लागू करने का वादा करते हुए 1996 में काबुल पर कब्जा कर अफगानिस्तान को ‘इस्लामिक एमिरेट’ घोषित किया। लेकिन 2001 में अल-कायदा के ओसामा बिन लादेन को आश्रय देने के कारण अमेरिका ने हमला किया और शासन खत्म कर दिया। इसके बाद 20 वर्षों तक उन्होंने पाकिस्तान में पुनर्गठन किया और 2021 में वापस सत्ता में आए।
आंतरिक राजनीति : शरीयत शासन और महिला अधिकारों का संकट
2021 के बाद तालिबान ने पुनः ‘इस्लामिक एमिरेट अफ़ अफ़ग़ानिस्तान’ की स्थापना की। इसका सर्वोच्च नेतृत्व हिबातुल्लाह अखुंदजादा के हाथ में है, और वे कंधार से डिक्री के द्वारा शासन करते हैं। संसद और संविधान पहले ही खारिज कर दिए गए हैं और न्याय प्रणाली पूरी तरह शरीयत पर आधारित है।
महिलाओं की स्थिति अत्यंत दयनीय है। जनवरी 2026 में जारी नई फौजदारी संहिता ने महिलाओं की स्वतंत्रता को पूरी तरह रोक दिया है। माध्यमिक और उच्च शिक्षा पर प्रतिबंध, सरकारी नौकरियों से निषेध, और सार्वजनिक स्थानों पर आवाज उठाने पर भी रोक लगाई गई है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इसे लैंगिक भेदभाव के रूप में देखा है। आर्थिक रूप से देश संकट में है; विदेशी सहायता बंद है और 7 अरब डॉलर के बैंक रिजर्व फ्रीज किए गए हैं, जिसके कारण तालिबान सरकार अफीम व्यापार और खनिज निर्यात पर निर्भर हो गई है।
वैश्विक और भू-राजनीतिक समीकरण
तालिबान की वैश्विक छवि अब परिवर्तन के दौर में है। 1996 में केवल पाकिस्तान, सऊदी अरब और यूएई ने ही इसे मान्यता दी थी। पर अब स्थिति भिन्न है। 3 जुलाई 2025 को रूस ने तालिबान को औपचारिक मान्यता दी और चीन ने राजदूत स्वीकार किया है।
भू-राजनीतिक दृष्टि से अफगानिस्तान अभी भी ‘ग्रेट गेम’ का केंद्र है। चीन अपनी ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) और अफगानिस्तान की लिथियम तथा तांबे की खानों में रुचि रखता है। रूस ने सुरक्षा और व्यापार मार्ग सुनिश्चित करने के लिए तालिबान के साथ साझेदारी बढ़ाई है।
साथ ही, 1893 में ब्रिटिश द्वारा बनायी गई ‘डूरंड लाइन’ विवाद ने अफगानिस्तान और पाकिस्तान के संबंधों को हमेशा तनावपूर्ण बनाया है।
पाकिस्तान के लिए चिंता का विषय : ‘बाएं वापस’ का परिणाम
पाकिस्तान द्वारा रणनीतिक हथियार मानी जाने वाली यह समूह अब उसके खिलाफ खड़ी हो गई है। 2007 में तेहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) का गठन हुआ, जो पाकिस्तानी मुजाहिदीन का समूह है जिसने देश के खिलाफ युद्ध की घोषणा की है।
टीटीपी का अफगान तालिबान से वैचारिक और जातीय संबंध है। 2021 में तालिबान के सत्ता कब्जा करने के बाद टीटीपी के हमले तेज हो गए। पाकिस्तान ने तालिबान से टीटीपी को नियंत्रित करने का दबाव डाला, पर तालिबान ने ‘पश्तुन भाईचारे’ के नाम पर उन्हें आश्रय दिया।
इसी कारण पाकिस्तान ने 17 लाख अफगान शरणार्थियों को निर्वासित करना और सीमा पर घेराबंदी तेज की, जिससे दोनों देशों के बीच युद्ध की स्थिति पैदा हुई।
2026 के खुले युद्ध और तालिबान की भूमिका
अक्टूबर 2025 में पाकिस्तान ने काबुल में टीटीपी के नेता नूर वली मेहसूद को निशाना बनाते हुए हवाई हमला किया, जिससे संघर्ष तेज हुआ। फरवरी 2026 में पाकिस्तान ने नंगरहार और खोस्त में पुनः हमले किए, जिसके बाद तालिबान ने महासंग्राम की घोषणा की।
26 फरवरी को तालिबान ने पाकिस्तानी सीमा चौकियों पर हमला कर 110 सैनिकों की हत्या और 27 चौकियों पर कब्जा करने का दावा किया। इसके जवाब में पाकिस्तान ने ‘ऑपरेशन ग़ज़ब लिल हक’ के तहत काबुल और कंधार में भीषण बमबारी की। इस युद्ध में तालिबान ने केवल टीटीपी को ही नहीं, बल्कि विस्थापित अफगानों को भी भर्ती कर पाकिस्तान के खिलाफ मोर्चा बनाया है।
तालिबान का इतिहास सिखाता है कि बाहरी शक्तियों और रणनीतिक हितों से जन्मा समूह अंततः अपने सृजक को चुनौती देता है। पाकिस्तान का ‘रणनीतिक गहराई’ का सपना आज गहरे घाव में बदल चुका है।
यह संघर्ष केवल दो देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे दक्षिण और मध्य एशिया की स्थिरता को संकट में डाल रहा है। डूरंड लाइन विवाद और टीटीपी की समस्या के समाधान के बिना इस क्षेत्र में शांति बहाल करना कठिन प्रतीत होता है।