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नेतृत्व न वित्तीय व्यवस्थापन – Online Khabar

नेतृत्व की कमी और वित्तीय संकट से जूझ रहा स्वास्थ्य बीमा बोर्ड

९ वैशाख, काठमाडौं। वित्तीय संकट के कारण स्वास्थ्य बीमा बोर्ड नेतृत्वहीन स्थिति में पहुंच गया है। स्वास्थ्य तथा जनसंख्या मंत्री निशा मेहता ने मंत्रीस्तरीय निर्णय के तहत स्वास्थ्य बीमा बोर्ड के कार्यकारी निर्देशक डॉ. कृष्ण पौडेल की नियुक्ति वापस लेकर उन्हें गजेन्द्रनारायण सिंह अस्पताल में स्थानांतरित कर दिया, जिससे बोर्ड नेतृत्वविहीन हो गया है।

नेतृत्व तुरंत कौन संभालेगा, इस बारे में स्पष्टता न होने के कारण बोर्ड इस समय असमंजस में है। जिम्मेदारी के स्पष्ट निर्देश न मिलने की वजह से डॉ. पौडेल गजेन्द्रनारायण अस्पताल लौटने की तैयारी में हैं।

इससे पहले गत माघ ४ तारीख को तत्कालीन कार्यकारी निर्देशक डॉ. रघुराज काफ्ले ने पद संभाल न पाने का हवाला देते हुए इस्तीफा दे दिया था। तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री डॉ. सुधा शर्मा गौतम ने मंत्रालय की नीति, योजना एवं अनुगमन महाशाखा प्रमुख डॉ. पौडेल को कार्यकारी जिम्मेदारी सौंपी थी।

बोर्ड पिछले तीन महीनों से नेतृत्वविहीन है। अब तक सरकार निर्देशक नियुक्ति के लिए आवश्यक प्रक्रिया शुरू नहीं कर पाई है। स्वास्थ्य बीमा बोर्ड के कार्यकारी निदेशक की नियुक्ति लोक सेवा आयोग के माध्यम से खुली प्रतिस्पर्धा द्वारा की जाती है। मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार यदि अभी विज्ञापन दिया जाए तो लगभग दो महीने लगेंगे।

स्थानांतरण पत्र पर प्रतिक्रिया देते हुए डॉ. पौडेल ने कहा कि उन्हें स्वास्थ्य बीमा के कार्य को निरंतर जारी रखने का स्पष्ट निर्देश नहीं मिला है।

‘मैं प्रशासनिक परिचालन के तहत स्थानांतरित हुआ हूँ, आज-कल रमाना लेकर जाऊंगा,’ डॉ. पौडेल ने कहा, ‘मेरे पत्र में केवल स्थानांतरण का उल्लेख है। मैं सरकारी कर्मचारी हूँ, जहाँ भेजा जाएगा वहीं जाना होगा।’

स्वास्थ्य तथा जनसंख्या मंत्री निशा मेहता

स्वास्थ्य मंत्री मेहता ने मंत्रालय की जिम्मेदारी संभालने के बाद बीमा बोर्ड के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत की थी। चर्चा के दौरान बोर्ड अधिकारियों ने बताया कि सेवा प्रदायक अस्पतालों को समय पर दावा भुगतान न होने के कारण अस्पतालों ने बीमा सेवाएं रोकने की स्थिति उत्पन्न हो गई है।

मंत्री मेहता ने भी बीमा कार्यक्रम के संकट को दूर करने का आश्वासन दिया था, लेकिन अब जब बोर्ड ही नेतृत्वहीन हो गया है तो संकट और बढ़ गया है।

सेवा प्रदायक अस्पतालों को अरबों रुपये का भुगतान न मिलने की वजह से यह कार्यक्रम प्रभावहीन होता जा रहा है। कुछ बड़े अस्पतालों ने तो सेवा देना पूरी तरह बंद कर दिया है। नेपाल में लगभग एक करोड़ नागरिक जुड़े इस बीमा कार्यक्रम को अस्पतालों को अरबों के भुगतान न करने के कारण जकड़ दिया गया है।

स्वास्थ्य बीमा बोर्ड के ताजा आंकड़ों के अनुसार सेवा प्रदायक स्वास्थ्य संस्थाओं को बकाया राशि १६ अरब रुपये से अधिक हो गई है।

स्वास्थ्य संस्थाओं से प्रतिदिन लगभग ८ करोड़ रुपये के बीमा दावे सामने आ रहे हैं। बोर्ड पर मासिक औसत करीब २.५ अरब रुपये से अधिक अतिरिक्त आर्थिक दबाव है। कार्यक्रम को नियमित रूप से संचालित करने के लिए वार्षिक २५ से २६ अरब रुपये की आवश्यकता है।

लेकिन राजस्व और खर्च के बीच भारी अंतर है। बीमाकृतों से सालाना संकलित प्रीमियम लगभग ४ अरब रुपये है जबकि सरकार की ओर से दिया जाने वाला वार्षिक अनुदान १० अरब रुपये जोड़ने के बावजूद कुल खर्च का आधा भी पूरा नहीं होता।

बीमा बोर्ड के सूचना अधिकारी विवेक मल्ल के अनुसार करीब ६ अरब रुपये के दावे पुनरावलोकन के बाद भुगतान हेतु स्वास्थ्य मंत्रालय के माध्यम से अर्थ मंत्रालय को भेजे जा चुके हैं।

करीब १० अरब रुपये के दावे अभी भी पुनरावलोकन के लिए बाकी हैं। मल्ल ने बताया कि सेवा प्रदायक संस्थाओं को भुगतान १६ अरब रुपये से अधिक रुका हुआ है।

बोर्ड खाते में मौजूद राशि पहले ही भुगतान में खर्च हो चुकी है।

‘अब बोर्ड के पास और भुगतान के साधन नहीं हैं,’ मल्ल ने कहा, ‘भुगतान कब होगा, यह विश्वास से कह पाना मुश्किल है।’

कार्यक्रम शुरू हुए लगभग एक दशक बाद स्वास्थ्य बीमा की मांग बढ़ी है, लेकिन बीमा नवीनीकरण नहीं कराने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। अब तक इस योजना में ९८ लाख ७४ हजार ४१५ नागरिक शामिल हुए हैं, लेकिन सक्रिय बीमित केवल ५९ लाख ७० हजार हैं। कुल बीमित में करीब ६० प्रतिशत ही सक्रिय हैं। लगभग ४० प्रतिशत बीमा नवीनीकरण न कराने से कार्यक्रम की स्थिरता पर प्रश्न उठ रहे हैं।

बीमा बोर्ड के मुताबिक, आर्थिक संकट को तुरंत नहीं सुलझाने पर और अधिक जटिलता उत्पन्न होने का खतरा है। भुगतान न होने के कारण सेवा प्रभावित होने से नागरिकों की असंतुष्टि बढ़ रही है और नवीनीकरण दर गिरने के संकेत मिल रहे हैं।

‘पहले नवीनीकरण दर ६० से ८० प्रतिशत तक थी, लेकिन अब सेवा प्रभावित होने के कारण यह ५० प्रतिशत से भी कम हो सकती है,’ बोर्ड के एक कर्मचारी ने कहा।

देश भर के ५०५ से अधिक स्वास्थ्य संस्थाओं के माध्यम से प्रतिदिन ५० हजार बीमित सेवा प्राप्त कर रहे हैं। बोर्ड के अनुसार दावों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है और दावा पुनरावलोकन के लिए जनशक्ति कम होने के कारण प्रशासनिक समस्याएं उत्पन्न हुई हैं।

सेवा उपयोग दर अधिक है। बीमितों में से लगभग ९३ प्रतिशत ने किसी न किसी रूप में स्वास्थ्य सेवा का उपयोग किया है। वित्तीय वर्ष २०७९/०८० में ८९.१ प्रतिशत, २०८०/०८१ में ९२.४ प्रतिशत और २०८१/०८२ में ९२.८ प्रतिशत बीमितों ने सेवा प्राप्त की।

आय के कमजोर स्रोत और दावों में निरंतर वृद्धि से कार्यक्रम की वित्तीय असंतुलन गंभीर हो गई है, जिससे स्वास्थ्य बीमा के दीर्घकालीन भविष्य पर प्रश्न उठ रहा है।

बोर्ड के एक कर्मचारी के अनुसार वर्तमान स्थिति अत्यंत संवेदनशील है।

‘स्वास्थ्य बीमा अत्यंत संकटग्रस्त स्थिति में है। बोर्ड के निदेशकों ने अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया है,’ वह कर्मचारी कहते हैं, ‘सरकार की आर्थिक सहायता नहीं मिलने से बीमा कार्यक्रम बंद होने की स्थिति आ गई है।’

२१ माघ को तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री डॉ. सुधा शर्मा ने प्रधानमंत्री सुशीला कार्की से अर्थ मंत्रालय की ओर से सहयोग न मिलने की शिकायत की थी।

डॉ. शर्मा ने कहा था कि वे दिन-रात मेहनत कर रही हैं लेकिन अर्थ मंत्रालय से आवश्यक सहायता नहीं मिल रही।

‘मैं सभी के सामने विनम्र निवेदन करती हूँ कि यदि आर्थिक अनुदान नहीं दिया गया तो बीमा कार्यक्रम बंद हो जाएगा,’ डॉ. शर्मा ने कहा, ‘ऐसी स्थिति में स्वास्थ्य मंत्रालय के अस्पतालों को भी बंद करने की अनुमति दी जाए।’

अर्थ सचिव घनश्याम उपाध्याय और मंत्री शर्मा के बीच भी विवाद हुआ था। उपाध्याय के अनुसार मौजूदा बीमा कार्यक्रम सही मॉडल पर नहीं है और अर्थ मंत्रालय अतिरिक्त बजट नहीं दे सकता। वित्तीय संकट के कारण बोर्ड की नेतृत्वहीनता ने बीमा कार्यक्रम को और अनिश्चित बना दिया है।

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