
अन्धकार को चीर कर उजाले का सृजन कर रहे विकटलाल चौधरी
१० वैशाख, घोडाघोडी (कैलाली)। जीवन में हमेशा उजाला देखने के लिए आँखों की जरूरत नहीं होती, कभी-कभी आत्मविश्वास, मेहनत और दृढ़ इच्छाशक्ति ही रास्ता दिखाते हैं। बर्दगोरिया गाउँपालिका–३, रानीकुण्डा के ४२ वर्षीय विकटलाल चौधरी इसका जीवंत उदाहरण हैं। जन्म से दृष्टिहीन होने के बावजूद उन्होंने अंधकारमय भविष्य को पीछे छोड़कर उजाले की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। उन्होंने न केवल अपने लिए बल्कि हजारों विद्यार्थियों के भविष्य को उज्ज्वल बनाने की यात्रा में खुद को समर्पित किया है। २०६५ से जगदम्बिके भगवती माध्यमिक विद्यालय में शिक्षण पेशे से जुड़े चौधरी पिछले १५ वर्षों से अधिक समय कक्षा में बिता चुके हैं। उनके लिए विद्यालय केवल नौकरी नहीं, बल्कि जीवन का लक्ष्य है। वे कक्षा में खड़े होकर आखों से न देख पाने के बावजूद विद्यार्थियों की क्षमता, संभावनाओं और भविष्य को आत्मदृष्टि से देखते हैं।
उनके पढ़ाए छात्र आज विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित हैं। ग्रामीण क्षेत्र से आए उन छात्रों की सफलता देखकर उन्हें उनका संघर्ष सार्थक लगता है। वे कहते हैं, ‘मेरे छोटे से ज्ञान से किसी के जीवन में बदलाव आया है तो इससे बड़ा सुख और क्या हो सकता है।’ पर उनकी जीवन यात्रा आसान नहीं रही। बचपन में उन्होंने पिता-माता दोनों खो दिए थे। पारिवारिक स्थिति कमजोर होती गई। दृष्टिहीन होने के कारण दैनिक जीवन और भी चुनौतीपूर्ण हो गया। उनके बड़े भाई भी दृष्टिहीन हैं और वे बहनों, भाभी और भांजी के साथ रहते हैं।
बाल्यकाल में सहनी पड़ी अपमान और पीड़ा आज भी यादों में ताज़ा है। गांव के कई लोग उन्हें ‘अंधा’ कहकर अपशब्द कहते और साथ चलने से डरते थे। चल फिर करना, स्कूल जाना तथा रोजमर्रा की जिंदगी पूरी करना सभी में चुनौतियाँ थीं। इन कठिनाइयों ने उन्हें कमजोर करने की बजाय और मजबूत बनाया। शुरू में वे सोचते थे कि पढ़ नहीं पाएंगे, लेकिन एक शिक्षक के सहयोग और प्रेरणा से उनकी सोच बदल गई। शिक्षक उनके घर आकर पढ़ाई में मदद करते और इससे आत्मविश्वास बढ़ने लगा। उन्होंने समझ लिया कि शारीरिक अक्षमता के बावजूद सीखने की इच्छा और मेहनत से संभावनाएं अनंत हैं।
एसएलसी उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने शिक्षण कार्य में कदम रखा। यह उनके लिए केवल नौकरी की शुरुआत नहीं, बल्कि जीवन को नई दिशा देने वाला मोड़ था। दृष्टिहीन होते हुए भी कक्षा में खड़ा होकर पढ़ाना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने खुद को कमजोर कभी नहीं समझा। कमजोरी को ताकत बनाकर आगे बढ़े। पढ़ाई के साथ उन्होंने उच्च माध्यमिक स्तर भी पूरा किया। वे कक्षा में केवल पुस्तक की बातें नहीं करते बल्कि जीवन के अनुभव भी बाँटते हैं।
उनका पारिवारिक जीवन भी संघर्षपूर्ण है। उनकी पत्नी भी दृष्टिहीन हैं। वे दोनों १३ वर्षीय बेटी और दो वर्ष के छोटे बेटे की देखभाल साथ मिलकर करते हैं। उनकी बेटी भी कम उम्र में बड़ी जिम्मेदारी संभाल रही है। घर के काम से लेकर माता-पिता की देखभाल तक सभी में सक्रिय है। चौधरी के जीवन में संगीत और साहित्य का भी विशेष स्थान है। कभी-कभी वे गीत गाते हैं, तो कभी कविताएं लिखते हैं। बचपन में लिखी उनकी कविता आज भी उनकी सोच को दर्शाती है: ‘आँखें बंद हों तो भी दिमाग बंद नहीं होता।’ इसी विश्वास ने उन्हें निरंतर आगे बढ़ने की ऊर्जा दी है।
समाज में दिव्यांगता के प्रति नजरिया धीरे-धीरे सकारात्मक हो रहा है। ‘पहले जो लोग तिरस्कार करते थे वे आज सम्मान के साथ बुलाते हैं और सलाह लेते हैं,’ वे कहते हैं। गांव में जब भी कोई कार्यक्रम होता है, उन्हें विशेष रूप से बोलाया जाता है। वे अब सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि अनुभव और प्रेरणा का स्रोत बन गए हैं। उनका मानना है कि दिव्यांग व्यक्तियों को दया नहीं बल्कि अवसर मिलना चाहिए। ‘हमारे कमजोर समझ कर पीछे नहीं रखना चाहिए, अवसर दिया जाए तो हम भी काम कर सकते हैं,’ उन्होंने कहा।