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होल्डिङ सेन्टरबाट परीक्षा केन्द्र धाइरहेकी विद्यार्थी

होल्डिङ सेन्टर से परीक्षा केंद्र की ओर जा रहे विद्यार्थियों की शिकायत

समाचार सारांश: सुकुमवासी बस्ती में डोजर चलाए जाने के बाद, १७ वर्षीय छात्रा ने परीक्षा के दौरान पढ़ाई में आए प्रभाव की शिकायत की। परिवार ने ऋण लेकर कॉलेज की ५० हजार की दाखिला राशि भरी है और अध्ययन पर तीन लाख रुपए खर्च आने की वजह से चिंता जाहिर की। सरकार ने अस्थायी आश्रम में रहने की व्यवस्था तो की है, लेकिन स्थायी आवास और शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित नहीं कर पाया है। १३ वैशाख, काठमांडू। ‘अब कॉलेज पढ़ना है या नहीं,’ रविवार को त्रिपुरेश्वर स्थित दशरथ रंगशाला के होल्डिङ सेंटर पहुंची १७ वर्षीय छात्रा ने इस प्रकार की शिकायतें कीं। वह काठमांडू के शान्तिनगर–गैरीगाँउ की सुकुमवासी बस्ती में जन्मी हैं और बीसीए (कंप्यूटर एप्लिकेशन) प्रथम वर्ष की छात्रा हैं, जो स्नातक की परीक्षा दे रही हैं। परीक्षा के दौरान ही बस्ती में डोजर चली। ‘यह मेरी फाइनल परीक्षा है। परीक्षा देकर मैं यहां आई हूं। लिखाई भी कर रही हूं। लेकिन कल से पढ़ाई बाधित हो गई है,’ उन्होंने बताया कि डोजर के कारण उनके घर पर असर पड़ा और पढ़ाई में बाधा आई। होल्डिङ सेंटर पहुंचने पर भी उनका झोला था और वे अपने ९ वर्षीय छोटे भाई का हाथ पकड़े थीं। ऐसी स्थिति में उन्हें परीक्षा की तैयारी करनी थी, लेकिन रहने की जगह और पढ़ाई दोनों असुविधाजनक थे। रविवार शाम रंगशाला में सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें खाना दिया, लेकिन वे नाखुश रहकर खाना नहीं खाईं। उनके पिता ने एक कमरा किराए पर लिया था, जिसमें सामान रखा गया था। लेकिन चार सदस्यीय परिवार वहां रह नहीं पाया। स्थान की कमी ने पढ़ाई को और भी प्रभावित किया। ‘पढ़ाई तो करनी है, लेकिन कैसे पढ़ना है, पता नहीं,’ उन्होंने आँसू भरे स्वर में कहा, ‘पिता-माता ने संघर्ष करके पढ़ाया है।’ उनके पिता घरों में रंग भरने का काम करते हैं जबकि माता अन्य घरों में काम करती हैं। ‘कभी-कभी माँ सड़क साफ करने भी जाती हैं। अब पिताजी-माँ पढ़ाई का खर्च कहाँ से जुटाएंगे?’ उन्होंने सवाल उठाया, ‘पूरा कॉलेज तीन लाख रुपए का खर्च है, अब कैसे चुकाएंगे?’ परिवार ने छात्रा की पढ़ाई के लिए ऋण लिया है। ‘दाखिले के समय ५० हजार रुपये जमा करने थे। वह राशि जुटाने के लिए ऋण लेना पड़ा,’ उन्होंने कहा, ‘पहले ३० हजार रुपए की बात हुई थी, लेकिन कॉलेज ने ५० हजार मांगे और ऋण लेकर भरे।’ कॉलेज की आंतरिक परीक्षा में उन्होंने दूसरा स्थान हासिल किया है, लेकिन फाइनल परीक्षा को लेकर तनाव में हैं। ‘कहां जाना है, क्या करना है, कुछ सोच नहीं पा रही। पिता-माता के पास पैसा नहीं है। अब कैसे पढ़ूं?’ यह उनका सवाल है। होल्डिङ सेंटर में अन्य बच्चे भी थे जो विद्यालय जाने के उम्र के थे। कुछ खेल रहे थे, कुछ बारिश की वजह से सामान समेट रहे थे। दसियों सालों से रह रहे घरों के ध्वस्त हो जाने से माता-पिता अपनी संतानों की शिक्षा को लेकर चिंतित हैं। नया शैक्षिक सत्र शुरू होने वाला है। १५ वैशाख से दाखिला प्रक्रिया प्रारंभ होगी और २१ वैशाख से पढ़ाई शुरू होगी। जिस जगह वे रह रहे थे, उसका सौदा नहीं रह जाने से अभिभावक अनिश्चित हैं कि अपने बच्चों को कहां पढ़ाएं। थापाथली और शान्तिनगर–गैरीगाउँ के भूमिहीनों को कीर्तिपुर स्थित राधास्वामी सत्संग व्यास आश्रम में अस्थायी आवास दिया गया है। लेकिन स्थायी आवास के लिए सरकार ने कोई इंतजाम नहीं किया। अस्थायी आश्रम में रहने वाली एक महिला ने अपने बच्चे की पढ़ाई को लेकर चिंता जताई। कहा कि कक्षा पाँच में पढ़ने वाले बेटे का दाखिला कहां होगा, पता नहीं। ‘हमारे पास रहने का पता ही नहीं है। बच्चे को स्कूल में दाखिला करना होता है। नई जगह पर क्या होगा, पता नहीं,’ उन्होंने कहा। संविधान की धारा ३१ प्रत्येक नागरिक को आधारभूत शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित करती है। निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने का प्रावधान भी संविधान में है। लेकिन सुकुमवासी बस्ती के अभिभावक अपने बच्चों को शिक्षा से वंचित नहीं होने देना चाहते। संविधान अपंगों और आर्थिक रूप से पिछड़े नागरिकों को निशुल्क उच्च शिक्षा का कानूनी अधिकार देता है, लेकिन वहां के गरीब परिवारों के बच्चों को यह संवैधानिक अधिकार व्यवहार में नहीं मिल पा रहा।

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