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चट्टान तोड़कर पानीघट्ट के चक्का बनाते हैं ६३ वर्षीय पुरानाराम

समाचार सारांश

एआई द्वारा तैयार। संपादकीय समीक्षा की गई।

  • सल्यान के सिद्ध कुमाख गाउँपालिका-३ फँलाटेका पुरानाराम रेउले ४७ वर्षों से पारंपरिक पानी घट्ट बनाने के पेशे में हैं।
  • दम की बीमारी से पीड़ित होने के बावजूद भी उन्होंने छह सदस्यीय परिवार पालने के लिए पानी घट्ट, जातो और सिलौटा बनाने का काम नहीं छोड़ा है।
  • उनके १५ वर्षीय पोते सुजन ने भी यह पेशा सीखकर जारी रखने की इच्छा जताई है।

१४ वैशाख, सल्यान । सल्यान के सिद्ध कुमाख गाउँपालिका-३ फँलाटेका ६३ वर्षीय पुरानाराम रेउले पारंपरिक पानी घट्ट बनाने के पेशे से परिचित हैं। ४७ साल पहले शुरू किया यह पेशा वे आज भी निरंतरता दे रहे हैं।

कठोर चट्टान तोड़कर सांचो और हथौड़े की मदद से पत्थर काटकर पानी घट्ट के चक्का, जातो के चक्का और सिलौटा बनाना उनकी दिनचर्या है। शारीरिक बीमारी के बावजूद भी रेउले ने परिवार चलाने के लिए यह पेशा नहीं छोड़ा है। वे दम की बीमारी से पीड़ित हैं।

“१६ वर्ष की उम्र से मैं यह पेशा कर रहा हूँ। अपने बेटे, पोते और पत्नी सहित छह सदस्यों के परिवार का पालन-पोषण करता हूँ,” उन्होंने बताया, “हाथ दर्द करता है, कमर दर्द करता है, मैं दम का मरीज हूँ। दूर नहीं जा सकता, यही काम कर परिवार चला रहा हूँ,” वे कहते हैं।

एक दशक पहले तक पानी घट्ट के लिए चक्कों की मांग इतनी अधिक होती थी कि वह पूरी करना मुश्किल हो जाता था। फिर नदी के घट्टों का बंद हो जाना मांग पर असर पड़ा, वे बताते हैं। हाल के दो सालों में बिजली से चलने वाले उपकरण आ जाने से फिर मांग बढ़ी है।

“१० से १२ साल पहले मांग इतनी बड़ी थी कि पूरी करना मुश्किल होता था, सालाना १२ से १६ लाख रूपये तक की बिक्री होती थी,” उन्होंने कहा, “लेकिन धीरे-धीरे नदी के घट्ट बंद होने से मांग कम हुई। पिछले दो वर्षों में बिजली से चलने वाले उपकरण आने से फिर कुछ मांग बढ़ी है, अब सालाना ६ से ७ लाख रूपये की बिक्री होती है।”

पोते का साथ

पछली पीढ़ी पारंपरिक पेशे में ज्यादा रूचि नहीं दिखाती जिससे इस कौशल के खत्म होने का खतरा बढ़ता जा रहा है, पुरानाराम रेउले ने बताया। वे खुद सीखाने की कोशिश करते हैं लेकिन नई पीढ़ी खास दिलचस्पी नहीं दिखाती। लेकिन उनका १५ वर्षीय पोता सुजन इस पेशे को सीखकर जारी रखने की दिशा में बढ़ रहा है।

कक्षा 10 में पढ़ रहे सुजन ने बताया कि छुट्टियों में वे घट्ट, जातो और सिलौटा बनाना सीख चुके हैं। “मेरी उम्र १५ वर्ष है। मैं कक्षा १० में पढ़ता हूँ। छुट्टियों में समय बेकार न जाए इसलिए दादाजी के साथ सीख रहा हूँ,” वे कहते हैं, “अब तक ६ जोड़ी जातो-सिलौटा बेच चुका हूँ। पढ़ाई के साथ-साथ इस पेशे को जारी रखने की इच्छा है।”

यदि सुजन जैसे युवाओं ने इस पेशे को आगे जारी रखा तो यह पारंपरिक पेशा अगली पीढ़ी तक जा कर जीवित रहेगा।

बाजार और कीमत

आकार के अनुसार एक जोड़ी पानी घट्ट के चक्के की कीमत ३० हजार से लेकर एक लाख रुपये तक होती है। वहीं, जातो २,५०० से ५,००० रुपये तथा सिलौटा ५०० से ३,००० रुपये तक बिकता है।

फिलहाल घट्ट के चक्के की तुलना में जातो और सिलौटा की मांग बढ़ रही है। रेउले द्वारा बने उत्पाद रुकुम, रोल्पा, सुर्खेत, दैलेख, जाजरकोट और दाङ तक पहुंचते हैं।

फँलाटेका दर्जन भर से अधिक परिवार इसी पेशे से जुड़े हुए हैं। इसी से वे अपने घर खर्च चलाते हैं। पारंपरिक कौशल और मेहनत पर आधारित इस पेशे का संरक्षण और संवर्धन के लिए राज्य तथा स्थानीय निकायों का ध्यान आवश्यक है, उनका कहना है।

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