
राघव चड्ढा ने भारतीय जनता पार्टी में क्यों किया प्रवेश?
१५ वैशाख, काठमाडौं। “भाजपा हमारी पार्टी के एक साधारण स्वयंसेवक को भी क्यों नहीं सहन कर पाती, प्रदेश सभा के सदस्य और सांसदों की बात तो छोड़िए,” करीब साढ़े चार वर्ष पूर्व आम आदमी पार्टी (आप) के तत्कालीन प्रवक्ता राघव चड्ढा ने पत्रकारों के सामने ऐसे ही शब्दों का प्रयोग करते हुए उनके चेहरे पर रोष और आत्मविश्वास दोनों के मिश्रण को स्पष्ट देखा जा सकता था। “भाजपा धोखाधड़ी की पार्टी है,” उन्होंने कहा था। २४ अप्रैल को वही राघव चड्ढा अपनी पार्टी आप के छह अन्य राज्यसभा सांसदों के साथ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल हो चुके हैं। उनके इस राजनीतिक ‘यू-टर्न’ को कई लोगों ने आदर्शवाद का सबसे विडंबनापूर्ण अंत बताया है। आम आदमी पार्टी अपनी स्थापना से कई झटकों से गुजरती रही है। योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, कुमार विश्वास जैसे नेताओं के पार्टी से अलग होने के बाद अब आप को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। हालांकि, दो तिहाई सदस्यों के चले जाने से यह पार्टी गंभीर रूप से प्रभावित हुई है। राजनीति में नैतिकता और अवसरवाद के बीच की सीमा कितनी धुंधली हो सकती है, इसका उदाहरण राघव चड्ढा के हालिया कदम ने दिया है।
भाजपा को “लोकतांत्रिक मूल्यों का हत्यारा” और “हॉर्स ट्रेडिंग” में संलिप्त बताते चड्ढा आज उसी दल की छत्रछाया में आ गए हैं। राघव चड्ढा: सैनिक बनने के सपने से अन्ना आंदोलन तक – भारतीय राजनीति के प्रभावशाली युवा चेहरों में शुमार राघव चड्ढा का उदय किसी पारिवारिक विरासत या पारंपरिक राजनीतिक पृष्ठभूमि से नहीं हुआ। ११ नवंबर १९८८ को नई दिल्ली के एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे चड्ढा का प्रारंभिक जीवन सामान्य सहरी विद्यार्थियों जैसा रहा। उन्होंने दिल्ली के प्रतिष्ठित ‘मॉडर्न स्कूल, बाराखंबा रोड’ से अपनी शिक्षा पूरी की। हालांकि उस समय वे अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर अनजान थे, परंतु विद्यालय के शैक्षणिक माहौल ने उनकी नेतृत्व क्षमता को मजबूत आधार दिया।
सन् २०११ में समाजसेवी अन्ना हजारे के नेतृत्व में शुरू हुए ‘इंडिया अगेन्स्ट करप्शन’ अभियान ने देश में बड़ा हलचल मचाई थी। उस वक्त २२ वर्ष के युवा चार्टर्ड अकाउंटेंट राघव भी भ्रष्टाचार के खिलाफ उस आंदोलन से दूर नहीं रह सके। उन्होंने ‘जन लोकपाल विधेयक’ की मांग को लेकर सड़कों पर हजारों नागरिकों के बीच हिस्सा लिया। यहीं से उनकी राजनीतिक यात्रा का निर्णायक मोड़ शुरू हुआ। आंदोलन के दौरान उनकी मुलाकात भ्रष्टाचार विरोधी कार्यकर्ता और दिल्ली के भावी मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से हुई। चड्ढा की वित्तीय विशेषज्ञता और तीव्र विश्लेषण क्षमता से केजरीवाल प्रभावित हुए और केवल २४ वर्ष की उम्र में उन्होंने राघव को ‘दिल्ली लोकपाल विधेयक’ का मसौदा तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी।
आखिरकार २४ अप्रैल को यह प्रक्रिया औपचारिक रूप से पूरी हुई। अरविंद केजरीवाल दिल्ली के नए सरकारी आवास में परिवार सहित शिफ्ट हो रहे थे और सोशल मीडिया पर जानकारी देते हुए चड्ढा सहित संदीप पाठक, स्वाति मालीवाल, हरभजन सिंह जैसे सात प्रभावशाली सांसदों ने पार्टी छोड़ कर भाजपा में विलय होने की घोषणा की। उन्होंने राज्यसभा अध्यक्ष को आवश्यक दस्तावेज सौंपे और भाजपा के केन्द्रीय कार्यालय जाकर औपचारिक रूप से सदस्यता ली। पार्टी में शामिल होने के बाद २७ अप्रैल को चड्ढा ने विस्तृत वीडियो संदेश के जरिए अपने फैसले का औचित्य समझाने का प्रयास किया। उन्होंने आप के भीतर विषाक्त कार्य परिवेश को मुख्य कारण बताया और कहा कि सात सांसद एक साथ गलत नहीं हो सकते। हालांकि आप ने इस कदम को अवैध और असंवैधानिक कहते हुए कड़ी आलोचना की।
सोशल मीडिया पर चल रहा ‘#UnfollowRaghavChadha’ ट्रेंड ने उन्हें एक वक्त के युवा आइकन से पाखंडी नेता बना दिया है। खासकर जेन-जेड मतदाताओं के लिए यह ‘यू-टर्न’ उनके राजनीतिक सपनों का अंत है। क्रांतिकारी राघव और आज के सत्ता आकांक्षी राघव के बीच की खाई ने उनकी दशक लंबी राजनीतिक पूंजी को एक झटके में कमजोर कर दिया है।