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सरकार की 15-दिन तलब प्रणाली: कर्मचारियों के जीवन में राहत या तनाव?

सरकार ने हाल ही में कर्मचारियों की तलब 15-15 दिन में भुगतान करने की नई प्रणाली शुरू की है। पिछले चार वर्षों में कर्मचारियों की तलब में कोई ठोस वृद्धि नहीं हुई है, जिससे महंगाई ने कर्मचारियों को गरीब वर्ग में धकेल दिया है। लेखक ने तलब वृद्धि, स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाओं, तथा भ्रष्टाचार नियंत्रण के लिए कड़ी कार्रवाई की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है। देश की प्रशासनिक संरचना में कर्मचारी प्रणाली को राज्य संचालन की मेरुदंड माना जाता है। नीति निर्माण से लेकर सेवा प्रवाह तक सब कुछ कर्मचारियों की जिम्मेदारी होती है। लेकिन दुःख की बात है कि वही मेरुदंड आज आर्थिक अभाव और महंगाई के तेज दबाव में दबा हुआ है।

हाल ही में सरकार ने 15-15 दिन में तलब भुगतान करने की नई प्रणाली की शुरुआत की है। सुनने में यह प्रबंधन आधुनिक और आकर्षक लगता है, लेकिन क्या यह कर्मचारियों के जीवन में वास्तविक राहत लाएगा या केवल एक प्रशासनिक प्रयोग बनकर रह जाएगा? यह आज एक गंभीर बहस का विषय है। पिछले दशकों में नेपाल में गठबंधन सरकारें बनी थीं। एमाले, कांग्रेस और माओवादी नेतृत्व वाली सरकारों ने लगभग हर दो वर्षों में बजट के माध्यम से 10-15 प्रतिशत तक तलब वृद्धि की थी, जो एक नियमित प्रक्रिया के रूप में स्थापित हो गई थी। लेकिन पिछले चार वर्षों से कर्मचारियों की तलब में कोई ठोस वृद्धि नहीं हुई है।

15-दिन की तलब प्रणाली से कर्मचारियों के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह प्रश्न उठ रहा है। 15 दिन में मिलने वाली 50 प्रतिशत तलब एक कर्मचारी की किन-किन आवश्यकताओं को पूरा कर सकेगी? घर का किराया, बैंक की किस्तें, बच्चों के महंगे स्कूल और ट्यूशन फीस जैसे खर्च काफी बड़े होते हैं। आधी तलब से सिर्फ गैस और सामान्य घरेलू खाद्य पदार्थ खरीदे जा सकते हैं। बाकी 15 दिनों की जरूरतें कैसे पूरी होंगी? यह व्यवस्था कर्मचारियों को और अधिक मानसिक तनाव में डाल रही है।

भ्रष्टाचार नियंत्रण और सुशासन की बातें आजकल फैशन की तरह हो गई हैं। जब राज्य अपने कर्मचारियों को ‘सम्मानजनक जीवन’ जीने के लिए पर्याप्त वेतन नहीं देता, तब कर्मचारी वैकल्पिक और गैरकानूनी रास्ते खोजने के लिए मजबूर होते हैं। नेपाल में स्थिति उल्टी है। सरकार सुशासन का नारा लगाती है, मगर कर्मचारियों को भुखा रखकर ईमानदारी की उम्मीद करती है। 15 दिन में तलब देने का निर्णय केवल एक तकनीकी सुधार है। लेकिन नेपाल के कर्मचारी तंत्र को केवल तकनीकी सुधार ही नहीं, आर्थिक न्याय और सम्मान की आवश्यकता है।

(लेखक शाही करनाली प्रदेश डोल्पा में कार्यरत एक निजामती कर्मचारी हैं।)

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