
पश्चिम बंगाल में भाजपा विस्तार के ५ मुख्य कारण
समाचार सारांश: पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी ने २९४ में से १९३ सीटों पर बढ़त लेकर तृणमूल कांग्रेस के १५ वर्षों के शासन को खत्म करने की संभावनाएं बढ़ा दी हैं। भाजपा ने महिला सुरक्षा, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के खिलाफ नाराजगी को चुनावी मुद्दा बनाया है। भाजपा ने ‘ब्रांड मोदी’ और हिन्दू मतध्रुवीकरण की रणनीति के साथ विकास और सामाजिक योजनाओं का वादा करके चुनावी मैदान में प्रभाव जमाया है। २१ वैशाख, काठमाडौं। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस की १५ वर्ष पुरानी किले को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा ध्वस्त किए जाने की संभावना लगभग तय हो गई है। विधानसभा चुनाव में राज्य की २९४ सीटों में से २९३ सीटों की मतगणना जारी है और भाजपा पूर्ण बहुमत की ओर बढ़ रही है। बहुमत के लिए १४८ सीटें आवश्यक थीं, लेकिन खबर तैयार होने तक भाजपा १९३ सीटों पर आगे चल रही थी।
सन् २०११ के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस को कड़ी चुनौती दी थी, मगर अंतिम परिणाम तृणमूल के पक्ष में आया था। उस चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने १७७ सीटें जीतकर सत्ता बनाए रखी थीं। उस समय भाजपा पहली बार मुख्य विपक्षी दल बनी थी और प्रभावशाली प्रदर्शन करते हुए ७७ सीटें जीती थीं। लेकिन इस बार भाजपा सहज बहुमत हासिल करने की दिशा में बढ़ रही है। हालांकि, ममता बनर्जी ने दावा किया है कि अंतिम विजेता तृणमूल कांग्रेस ही होगी।
पश्चिम बंगाल के मतदाताओं ने भाजपा को चुनने के ५ संभावित कारण निम्नलिखित हैं:
- सत्ता विरोधी लहर और भाजपा का बढ़ता जनाधार: तृणमूल कांग्रेस २०११ में सत्ता में आई थी और ममता बनर्जी ने वामपंथी किले को ध्वस्त कर इतिहास रचा था। लेकिन १५ साल सत्ता में रहने के दौरान सरकार के खिलाफ असंतोष बढ़ता गया। इसका फायदा भाजपा ने उठाया है। पिछले दस वर्षों में भाजपा ने मजबूत विपक्षी दल के रूप में खुद को बदला। सन् २०१६ में १० प्रतिशत वोट पाने वाली भाजपा ने सन् २०२१ में ३८ प्रतिशत और सन् २०२४ के लोकसभा चुनाव में लगभग ३९ प्रतिशत वोट हासिल किए।
- तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ असंतोष और भ्रष्टाचार के खिलाफ आक्रोश: ममता बनर्जी अभी भी लोकप्रिय हैं, लेकिन बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और सुशासन में विपक्षी दल की आक्रामक भूमिका ने अनिश्चित मतदाताओं को भाजपा की ओर आकर्षित किया है। तृणमूल सरकार पर शिक्षक भर्ती घोटाला, राशन घोटाला सहित बड़े भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। पूर्व मंत्री पार्थ चटर्जी की गिरफ्तारी जैसी घटनाओं ने पार्टी की छवि पर प्रभाव डाला है।
- महिला सुरक्षा का मुद्दा: राजी कर अस्पताल जैसी घटनाओं ने महिला सुरक्षा को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया है। कोलकाता के सरकारी अस्पताल में कार्यरत महिला चिकित्सक के साथ यौन दुर्व्यवहार की घटना सार्वजनिक होने के बाद देशव्यापी आक्रोश फैला। उत्तर २४ परगना जिले के सन्देशखाली इलाके की स्थानीय महिलाओं ने कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों पर यौन शोषण, जमीन कब्जा और धमकी देने के आरोप लगाए, जिनमें सत्तारूढ़ दल के नेता शामिल बताए गए।
- ‘ब्रांड मोदी’ का प्रभाव और हिन्दू मतध्रुवीकरण: नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को आगे रखते हुए भाजपा चुनाव मैदान में उतरी है। ममता की प्रभावशाली राज्य सरकार का सामना करने में ‘मोदी ब्रांड’ निर्णायक भूमिका निभा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने ‘डबल इंजन सरकार’ का सूत्रपात किया है और विकास का वादा किया है। खासकर महिलाओं को लक्षित करते हुए मासिक तीन हजार रुपये खाते में भेजने का वादा किया गया है। इसके साथ ही भाजपा ने हिन्दू मतदाताओं को एकजुट करने का प्रयास किया है। तृणमूल कांग्रेस को मुस्लिम समर्थक पार्टी के रूप में प्रचारित करके भाजपा ने मतध्रुवीकरण की रणनीति अपनाई है।
- बंगालादेशी घुसपैठ का मुद्दा और मतदाता सूची संशोधन का प्रभाव: पश्चिम बंगाल में बंगालादेशी घुसपैठ लंबे समय से विवादित विषय है। विपक्ष ने सरकार पर नरमी बरतने का आरोप लगाते हुए कड़ी आलोचना की है। चुनाव से पहले मतदाता सूची संशोधन अभियान चलाया गया, जिसमें लाखों मतदाताओं के नाम हटाए जाने के आरोप लगे। यह चुनावी समीकरणों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालने वाला माना जा रहा है।