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५० वर्षपछि भारतका कुनै पनि राज्यमा रहेन वामपन्थी सरकार, केरलमा कांग्रेसको जित

५० वर्षों के बाद भारत के किसी भी राज्य में वामपंथी सरकार नहीं, केरल में कांग्रेस की जीत

२२ वैशाख, काठमाडौं। ५० वर्षों के बाद पहली बार भारत के किसी भी राज्य में वामपंथी सरकार का अस्तित्व नहीं रहेगा। वामपंथी दलों का अंतिम मजबूत गढ़ माने जाने वाले केरल भी इस बार उनकी पकड़ से बाहर हो गया है। विधानसभा चुनाव के नतीजों ने केरल राज्य में कांग्रेस नेतृत्व वाले यूडीएफ गठबंधन को १० वर्षों बाद फिर सत्ता में ला दिया है। कुल १४० सीटों वाले केरल में कांग्रेस पार्टी अकेले ही ६३ सीटें जीत गई है। कांग्रेस के सहयोगी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने २२ सीटें हासिल की हैं जबकि अन्य सहयोगी दलों ने १७ सीटें जीती हैं। दूसरी ओर, वामपंथी दलों ने केवल ३५ सीटें जीत पाई हैं। इससे केरल में वामपंथी सत्ता गंवाने की स्थिति निश्चित हो गई है।

केरल में वर्ष २०१६ से २०२६ तक दो कार्यकाल तक वामपंथी सरकार रही है। केरल खो जाने के बाद भारत के किसी भी राज्य में वामपंथी दल की सरकार नहीं रहने की स्थिति बन गई है, ऐसा भारतीय मीडिया ने बताया है। समाचार एजेंसी आईएएनएस के अनुसार, १९७० के दशक के बाद पहली बार ऐसा होगा जब भारत के किसी भी राज्य में वामपंथी सरकार नहीं होगी। वर्ष १९७७ में पश्चिम बंगाल में सीपीआई-एम की सरकार बनी थी, जो २०११ तक चली। उसके बाद राज्य में तृणमूल कांग्रेस की सरकार बनी। हालिया विधानसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस केवल ८१ सीटों तक सीमित रही, जबकि भाजपा ने २०६ सीटें हासिल कीं। पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट पार्टी ने केवल २ सीटें जीतीं। इसी प्रकार, १९९८ से २०१८ तक त्रिपुरा में भी लेफ्ट फ्रंट की सरकार थी। २०१८ में वह राज्य भी भाजपा के नियंत्रण में आ गया था।

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