
इस वर्ष की मानसून में कम वर्षा और अधिक गर्मी की संभावना
समाचार सारांश
प्राविधिक समीक्षा किया गया।
- नेपाल में इस वर्ष मानसून अवधि में औसत से कम वर्षा और अधिक गर्मी की संभावना जताई गयी है।
- प्रशांत महासागर के एल नीनो और हिन्द महासागर के इंडियन ओशन डाइपोल मानसून कमजोर होने के मुख्य कारण माने जा रहे हैं।
- कमजोर मानसून के कारण कृषि और जलविद्युत क्षेत्रों में प्रभाव पड़ने और खाद्य सुरक्षा जोखिम बढ़ने की आशंका है।
२३ वैशाख, काठमांडू। नेपाल में इस वर्ष मानसून अवधि में औसत वर्षा की तुलना में कम वर्षा और अधिक तापमान होने का अनुमान लगाया गया है।
प्रशांत महासागर में विकसित ‘एल नीनो’ और हिन्द महासागर के ‘इंडियन ओशन डाइपोल’ की तटस्थ स्थिति के कारण इस वर्ष मानसून कमजोर रहने का अनुमान है। हालांकि नेपाल के कुछ इलाकों में सामान्य से अधिक वर्षा होने की संभावना भी है।
नेपाल में जून से सितंबर तक की अवधि मानसून काल के रूप में मानी जाती है। इस दौरान कुल वर्षा का लगभग ८० प्रतिशत होता है। मानसून या वर्षा सीधा प्रभाव डालती है फसलों और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर। साथ ही, बाढ़ और भू-स्खलन के कारण जन और संपत्ति का नुकसान होता है, इसलिए मानसून पर सभी की नजरें रहती हैं।
इसीलिए दक्षिण एशियाई देशों के ऋतुगत मौसम पूर्वानुमान संगठन, दक्षिण एशियाई जलवायु दृष्टिकोण मंच (सास्कोफ) हर साल मानसून की जानकारी जारी करता है। इसी रिपोर्ट के आधार पर नेपाल के जल और मौसम विज्ञान विभाग भी संभावित मानसून की स्थिति की सूचना प्रदान करता है। विभाग ने आगामी शुक्रवार को सभी संबंधित पक्षों को एकत्रित करके इस वर्ष के मानसून की स्थिति पर जानकारी देने का कार्यक्रम रखा है।
सास्कोफ की रिपोर्ट में क्या कहा गया है?
हाल ही में मालदीव के माले में सास्कोफ की बैठक सम्पन्न हुई, जिसमें अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव, म्यांमार, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका समेत नौ देशों के मौसम विशेषज्ञ शामिल थे।
बैठक में मई से सितंबर तक की मानसून अवधि के दौरान दक्षिण एशिया के उत्तर-पश्चिमी, उत्तर-पूर्वी और दक्षिणी क्षेत्रों के कुछ हिस्सों में सामान्य या सामान्य से अधिक वर्षा होने का अनुमान लगाया गया। जबकि मध्य क्षेत्र में वर्षा सामान्य से कम रहने का अनुमान है।

नेपाल के पूर्वी हिस्से उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के निकट हैं, इसलिए ये सामान्य या सामान्य से अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में आते हैं। परन्तु नेपाल का बड़ा हिस्सा मध्य भाग में पड़ता है जो कम वर्षा वाले क्षेत्र में आता है। इसलिए कुछ जगहों पर भारी वर्षा हो सकती है लेकिन कुल मिलाकर कम वर्षा होने की उम्मीद है।
त्रिभुवन विश्वविद्यालय के जल तथा मौसम विभाग के सहप्राध्यापक डॉ. विनोद पोखरेल ने बताया कि इस वर्ष मानसून शुरुआती चरण में कमजोर होगा और ज्यादातर क्षेत्रों में औसत से कम वर्षा होने की संभावना है। उनके अनुसार आगामी जेठ १५ से सावन १५ (जून और जुलाई) तक का समय सूखा रहेगा।
मानसून की इस अस्थिरता का कृषि और जलविद्युत क्षेत्रों पर सीधा असर होगा। कमजोर मानसून के कारण पहले आधे काल में केवल लगभग ३०-४० प्रतिशत रोपाई संभव हो पाने का डॉ. पोखरेल ने उल्लेख किया।
मानसून कमजोर होने के कारण
विशेषज्ञों के अनुसार इस वर्ष मानसून कमजोर होने के दो मुख्य मौसमी कारण हैं – ‘एल नीनो’ प्रभाव और हिन्द महासागर में ‘इंडियन ओशन डाइपोल’ (आईओडी) की स्थिति।
प्रशांत महासागर में तापमान औसत से अधिक होना ‘एल नीनो’ कहलाता है, जो दक्षिण एशिया के मानसून को प्रभावित करता है। एल नीनो की स्थिति हालांकि अब तटस्थ हो रही है, लेकिन इसके शेष प्रभाव और वायुमंडलीय परिवर्तनों के कारण जून और जुलाई में बादल बनने की प्रक्रिया धीमी हो सकती है।
इसी प्रकार, नेपाल के मानसून पर हिन्द महासागर के तापमान (इंडियन ओशन डाइपोल) का बड़ा प्रभाव होता है। अंतरराष्ट्रीय मॉडलों के अनुसार इस वर्ष जून-जुलाई के दौरान हिन्द महासागर की स्थिति तटस्थ रहेगी, जिससे नेपाल तक नमी युक्त हवा पहुंचने में कठिनाई हो सकती है।
जलवायु और आपदा विशेषज्ञ डॉ. धर्मराज उप्रेती ने बताया कि जून के मध्य तक पानी अच्छे तौर पर पड़ सकता है लेकिन जून के अंत में सूखा आएगा और जुलाई में कम वर्षा होने की संभावना है। फिर सितंबर के अंत में मानसून सक्रिय हो सकता है।
डा. उप्रेती कहते हैं, ‘आईओडी अभी तटस्थ है और प्रशांत महासागर में सुपर एल नीनो की स्थिति है। सुपर एल नीनो के दौरान अत्यधिक सूखा पड़ता है। अगर अप्रैल से जून तक यही स्थिति रही तो जुलाई से सितंबर तक दूसरी स्थिति देखने को मिलेगी।’
इस प्रकार जून के मध्य तक बारिश हो सकती है लेकिन अंत में सूखा बढ़ेगा और जुलाई में कम वर्षा होगी। उसके बाद सितंबर के अंत तक आईओडी सकारात्मक स्थिति में पहुंच सकता है, जिससे दशहरा-तिहार के समय मानसून पुनः सक्रिय हो सकता है, डॉ. उप्रेती ने बताया।
नेपाल की अर्थव्यवस्था में कृषि का प्रमुख योगदान होता है, जो लगभग ७५ से ९० प्रतिशत मानसूनी वर्षा पर निर्भर है। कम वर्षा से धान और अन्य वार्षिक फसलों पर असर पड़ेगा तथा खाद्य असुरक्षा का खतरा बढ़ेगा। इसके अलावा, अधिकांश जलविद्युत आयोजन नदी के जल प्रवाह पर आधारित हैं, जिससे वर्षा कम होने पर सर्दियों में लोडशेडिंग या ऊर्जा संकट की समस्या दोबारा हो सकती है।

जल तथा मौसम विज्ञान विभाग क्या कहता है?
इस वर्ष मानसून अवधि में वर्षा कम होने के साथ-साथ दिन और रात के तापमान (अधिकतम और न्यूनतम) भी औसत से अधिक रहने की संभावना जताई गई है, जिससे जन स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है। खासकर तराई क्षेत्र में कृषि उत्पादन और दैनिक जीवन प्रभावित होने की आशंका है।
जल तथा मौसम विज्ञान विभाग की प्रवक्ता विभूति पोखरेल ने कहा कि नेपाल में मानसून को प्रभावित करने वाले कई अन्य कारक भी हैं, इसलिए अभी यह निश्चित रूप से कहना कठिन है कि इस मानसून का स्वरूप कैसा होगा।
‘एल नीनो है, लेकिन नेपाल में मानसून पर प्रभाव डालने वाले कई अन्य कारण भी हैं, इसलिए अभी यह कहना संभव नहीं कि मानसून यहीं रहेगा,’ उन्होंने कहा। ‘मानसून की स्थिति बीच-बीच में अपडेट की जाती है, इसलिए इसे करीब से नजर रखना आवश्यक है।’
कुछ सालों में जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम में व्यापक बदलाव देखा गया है। बारिश के दौरान कहीं अत्यधिक वर्षा हुई है तो कहीं सूखा पड़ा है।
इसलिए विशेषज्ञों ने कम वर्षा वाले क्षेत्रों में उपयुक्त वैकल्पिक फसलों का चयन, पीने का पानी और सिंचाई के जल संचयन, तापमान नियंत्रण तथा अन्य अनुकूलन कार्यक्रम अपनाने की सलाह दी है।