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प्रधानमन्त्रीसँग प्रतिपक्षी दलका नेताको सवालजवाफ – Online Khabar

प्रधानमंत्री और विपक्षी दल के नेता के बीच प्रश्नोत्तर सत्र

समाचार सारांश

OK AI द्वारा निर्मित। सम्पादकीय समीक्षा गरिएको।

  • संवैधानिक परिषद की बैठक में प्रधानमंत्री बालेन शाह ने प्रधानन्यायाधीश के लिए वरिष्ठता क्रम में बदलाव करते हुए डॉ. मनोज शर्मा का नाम प्रस्तावित किया।
  • नेता भीष्मराज आङ्देम्बे ने वरिष्ठता उल्लंघन का कड़ा विरोध किया और कांग्रेस के समर्थन की कमी जताई।
  • प्रधानमंत्री और विपक्षी नेता के बीच लगभग डेढ़ घंटे तक न्यायिक सिफारिश के आधार पर प्रश्नोत्तर सत्र चला।

२४ वैशाख, काठमांडू। संवैधानिक परिषद की बैठक में प्रधानमंत्री बालेन शाह और प्रमुख विपक्षी दल नेपाली कांग्रेस के नेता भीष्मराज आङ्देम्बे के बीच लंबा प्रश्नोत्तर हुआ है।

संवैधानिक परिषद के एक सदस्य के अनुसार, बैठक शुरू होते ही प्रधानमंत्री बालेन शाह ने प्रधान न्यायाधीश सिफारिश के एजेंडा को आगे रखा। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठता क्रम के अनुसार चौथे स्थान के न्यायाधीश डॉ. मनोज शर्मा को प्रधान न्यायाधीश बनाने का प्रस्ताव रखा।

प्रस्ताव के बाद अधिकांश सदस्यों ने चुप्पी साध ली। राष्ट्रीय सभा के अध्यक्ष नारायण दाहाल और उपसभापति रूबी कुमारी ने भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। लेकिन विपक्षी दल के नेता भीष्मराज आङ्देम्बे ने प्रस्ताव का तीव्र विरोध किया।

उन्होंने बैठक में प्रधानमंत्री बालेन शाह से कहा, ‘आपने वरिष्ठता क्रम तोड़ा है। ८० वर्षों के न्यायिक इतिहास में वरिष्ठता उल्लंघन का कोई उदाहरण नहीं है। आपने चौथे स्थान के न्यायाधीश को प्रस्तावित किया है। आप संविधान का उल्लंघन कर रहे हैं। कांग्रेस इस पर समर्थन नहीं देगी।’

उसके बाद संवैधानिक परिषद के सदस्यों के अनुसार प्रधानमंत्री और भीष्मराज आङ्देम्बे के बीच प्रश्नोत्तर शुरू हुआ।

प्रधानमंत्री बालेन शाह ने जवाब में कहा, ‘न्याय सम्पादन के आधार पर संकलित आंकड़ों के अनुसार सिफारिश की गई है। सबसे अधिक न्यायकार्य डॉ. मनोज शर्मा ने किया है।’

आङ्देम्बे ने उत्तर दिया, ‘क्या न्याय सम्पादन ही प्रधान है? आपको वरिष्ठता को तोड़ने का अधिकार नहीं है।’

प्रधानमंत्री शाह ने कहा, ‘न्यायाधीश मनोज शर्मा ने पाँच वर्षों में लगभग ७,५०० केस निपटाए हैं। वहीं वरिष्ठ प्रधान न्यायाधीश सपना प्रधान मल्ल ने लगभग ४,००० फैसले दिए हैं। इसलिए वह उपयुक्त हैं।’

विपक्षी सदस्य ने विरोध करते हुए कहा, ‘आपके लिए यह देखना गलत है कि किसने कितने मामले निपटाए। वरिष्ठतम न्यायाधीश और विधि परंपरा के अनुसार नाम प्रस्तावित होना चाहिए था। संविधान की धारणा का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। मैं विधि, परंपरा और संविधान का पक्ष लेता हूँ।’

प्रधानमंत्री ने पुनः कहा, ‘सबसे अधिक न्याय सम्पादन करने वाला ही योग्य होता है।’

लगभग डेढ़ घंटे तक दोनों के बीच प्रश्नोत्तर चलता रहा। इस दौरान अन्य सदस्य अधिकांशतः चुप थे। प्रधानमंत्री लगातार न्याय सम्पादन के आंकड़ों को आधार बताते हुए डॉ. मनोज शर्मा की सिफारिश दोहरा रहे थे।

प्रधानमंत्री के सचिवालय के अनुसार, पिछले पाँच वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय के छह न्यायाधीशों के न्याय सम्पादन के आंकड़े प्रस्तुत किए गए। इनमें डॉ. मनोजकुमार शर्मा ने लगभग ७,४०० मामले निपटाए हैं।

उसी आंकड़े के अनुसार कार्यवाहक प्रधान न्यायाधीश सपना प्रधान मल्ल ने लगभग ४,७०० मामलों का निपटारा किया है। शर्मा के बाद हरि फुँयाल और कुमार रेग्मी ने सबसे अधिक मामलों का निपटारा किया है। संवैधानिक परिषद के सदस्य के अनुसार प्रधानमंत्री ने न्याय सम्पादन के आंकड़ों को ही डॉ. मनोज शर्मा की सिफारिश का आधार बनाया।

लंबे प्रश्नोत्तर के बाद बैठक निर्णय की कार्यवाही तैयार करने का प्रस्ताव आया। उसी दौरान विपक्षी दल के नेता आङ्देम्बे ने अपनी लिखित असहमति दर्ज कराने का बयान दिया। इस असहमति में राष्ट्रीय सभा के अध्यक्ष नारायण दाहाल भी शामिल थे।

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