
नेपाल की राजनीति: विचारधारा की कमी और दीर्घकालीन स्थिरता के लिए चुनौती
नेपाल में राजनीतिक विचारधारा और सिद्धांतों की कमी ने दीर्घकालीन राजनीतिक स्थिरता और सामाजिक परिवर्तन में चुनौतियां पैदा की हैं। पुराने दल अपने वैचारिक सिद्धांतों को व्यवहार में लागू नहीं कर सके, जबकि नई राजनीतिक शक्तियाँ स्पष्ट वैचारिक आधार स्थापित करने में असफल रही हैं। केवल तब नेपाल की राजनीति स्थायी बन सकती है जब नई राजनीतिक शक्तियाँ स्पष्ट वैचारिक जिम्मेदारी और संस्थागत संस्कार विकसित करें।
प्रदीप गिरि राजनीतिक विचारधारा और दर्शन पर चर्चा करते थे। उनकी बात सुनने वालों को आकर्षित करने की क्षमता थी। कुछ लोग ध्यान से सुनते थे, जबकि कुछ आमतौर पर एक कान से सुनकर दूसरे कान से उड़ा देते थे। आज दर्शन संबंधी विचारों को आगे बढ़ाने वाले एक नेता घनश्याम भूसाल हैं। उनका दर्शन है कि राजनीति मूल रूप से सिद्धांतों से निर्देशित होनी चाहिए। उनका मानना है कि केवल वैचारिक आधार पर राजनीति करनी चाहिए, लेकिन ऐसे विचार के बावजूद वे अपना उदय करने वाली पार्टी एमाले में अच्छा सम्मान नहीं पा सके।
जनता ने दशकों तक विभिन्न राजनीतिक आंदोलनों में भाग लेकर बलिदान दिया, शासन व्यवस्था बदली, संविधान बनाया, राजतंत्र समाप्त किया और गणतंत्र स्थापित किया; लेकिन इतने सारे परिवर्तनों के बावजूद सामान्य जनजीवन में अपेक्षित सुधार क्यों नहीं दिख रहा है, यह आज सबसे बड़ा सवाल है। इन सवालों के जवाब न मिलने से एक गंभीर प्रश्न उभरा है – क्या सिद्धांत से भूख मिटती है? इसी निराशा के कारण अब पुराने राजनीतिक दलों के प्रति वितृष्णा और नई राजनीतिक शक्तियों के प्रति असाधारण आकर्षण उत्पन्न हुआ है।