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संसद्को विशेष दिनमा बालेनको बिझाउने दृश्य – Online Khabar

संसद के विशेष दिन पर प्रधानमंत्री बालेन्द्र का असभ्य व्यवहार

28 वैशाख, काठमाडाैँ। संसदीय व्यवस्था में सदन तीन तरीकों से संचालित होता है: विधि, परंपरा और मर्यादा। इसलिए संसद में प्रतिनिधित्व करने वाले जनप्रतिनिधियों को ‘माननीय’ संबोधित किया जाता है। संसदीय बहुमत जब किसी को ‘माननीय’ का अविश्वास दिलाता है, तो वह व्यक्ति प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति या सभामुख बनता है और उसे ‘सम्माननीय’ कहा जाता है। संसद को मर्यादित बनाने के लिए सुरक्षाकर्मी भी मर्यादापालक के रूप में तैनात होते हैं। ऐसे मर्यादापूर्ण माहौल में सोमवार को एक दुखद दृश्य देखने को मिला। संघीय संसद के संयुक्त बैठक में सरकार की नीति तथा कार्यक्रम राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे थे, तभी प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने बैठक बीच में छोड़कर बाहर चले गए। अपनी ही सरकार द्वारा तैयार की गई नीति तथा कार्यक्रम को राष्ट्रप्रमुख द्वारा प्रस्तुत किए जाने पर प्रधानमंत्री का बैठक छोड़ना संसदीय अभ्यास के अनुरूप अनुचित माना गया।

संसद सचिवालय के पूर्वमहासचिव मनोहरप्रसाद भट्टराई ने कहा, ‘करीब 40 वर्षों के संसदीय सेवा काल में मैंने ऐसा दृश्य कभी नहीं देखा। संसद मर्यादा और शिष्टाचार का स्थान है। उसके उल्लंघन से संसदीय गरिमा प्रभावित होती है।’ राष्ट्रपति का संसद में सरकार की नीति तथा कार्यक्रम प्रस्तुत करने का संवैधानिक प्रावधान है। प्रत्येक वर्ष यह कार्यक्रम संसद में पेश किया जाता है और राष्ट्रपति इसे वाचन करते हैं। राष्ट्रपति के इस वक्त हर साल सरकार द्वारा निर्धारित कार्यक्रम की परंपरागत भूमिका में प्रधानमंत्री प्रमुख होते हैं। लेकिन सोमवार की बैठक में प्रधानमंत्री शाह ने राष्ट्रपत्या के प्रति मर्यादापूर्ण व्यवहार नहीं दिखाया। राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल को नीति तथा कार्यक्रम पूरी तरह प्रस्तुत करने में लगभग एक घंटा दस मिनट लगे, जबकि प्रधानमंत्री शाह लगभग 15 मिनट पूर्व ही बैठक छोड़कर चले गए थे।

नीति तथा कार्यक्रम के पूर्ण वाचन के बाद सभामुख डीपी अर्याल ने सांसदों को सम्मान स्वरूप खड़े होने का निर्देश दिया। संयुक्त संसद के सांसदों ने राष्ट्रपति पौडेल का खड़ा होकर विदाई की, लेकिन प्रधानमंत्री की कुर्सी खाली रही। प्रधानमंत्री शाह कुछ समय बाद प्रतिनिधि सभा की बैठक में लौटे, जहां उन्होंने राष्ट्रपत्या द्वारा प्रस्तुत नीति तथा कार्यक्रम सदन में टेबल किया। धन्यवाद प्रस्ताव पारित होने से पहले ही प्रधानमंत्री बैठक कक्ष से बाहर चले गए, जिससे सभामुख भी असमंजस में पड़ गए। कुछ सांसदों ने इस अवसर पर हँसी भी की। लेकिन रास्वपाका कुछ सांसदों ने प्रधानमंत्री बालेन्द्र के व्यवहार और उनका समर्थन करने वाले सांसदों की हूटिंग पर विरोध जताया और इसे दल के अंदर भी उठाने की बात कही।

प्रधानमंत्री शाह पर संसद की गतिविधियों को प्राथमिकता न देने की लगातार आलोचना हो रही है। यह उनका दूसरा अधिवेशन है और अब तक उन्होंने संसद में कोई भाषण नहीं दिया है। फागुन में हुए चुनाव से वे लगभग दो-तिहाई समर्थन लेकर प्रधानमंत्री बने, फिर भी जनप्रतिनिधि संस्था में उनकी स्थायी उपस्थिति नहीं रही। संसदीय समितियों में भी वे भाग नहीं लेते। पिछले अधिवेशन में भी वे बोलें नहीं और नए अधिवेशन की पहली बैठक में भी उपस्थित नहीं हुए। इनके स्थान पर कानून मंत्री ने उनकी ओर से अध्यादेश प्रस्तुत किए।

संसद परंपरा अनुसार संचालित होने वाला स्थान है, जहां राष्ट्रप्रमुख को विशेष सम्मान के साथ संसद कक्ष तक लाया जाता है। आज भी यही परंपरा निभाई गई। संसदीय जानकारों के अनुसार इस अवसर पर सभामुख और राष्ट्रिय सभा के अध्यक्ष राष्ट्र प्रमुख का स्वागत करते हैं और प्रधानमंत्री विदाई करते हैं। लेकिन सोमवार को प्रधानमंत्री ने यह परंपरा नहीं निभाई। पूर्वमहासचिव भट्टराई ने कहा, ‘सभी बातें नियमावली में नहीं लिखी होतीं, परंपरा और व्यवहार भी पालन करना आवश्यक है। सम्मानित व्यक्तियों को विशेष सतर्कता दिखानी चाहिए।’ संघीय संसद की संयुक्त बैठक राज्य की संवैधानिक गरिमा, संसदीय संस्कार और लोकतांत्रिक परंपरा का सार्वजनिक प्रदर्शन करने वाला स्थान है।

प्रधानमंत्री के इस व्यवहार के खिलाफ विपक्षी दलों ने भी आपत्ति जताई है। धन्यवाद प्रस्ताव पारित करने के लिए बुलाए गए बैठक में विपक्षी एमाले के सांसद गुरु बराल ने प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रपति का अपमान करने का आरोप लगाते हुए संसदीय मर्यादा के उल्लंघन की बात कही। नेकपा संसदीय दल के प्रमुख सचेतक युवराज दुलाल ने भी प्रधानमंत्री का बैठक छोड़कर जाना गलत बताया और व्यंग्यात्मक टिप्पणी की। कुछ लोग प्रधानमंत्री के इस स्टाइल को नया कह सकते हैं, लेकिन इससे राज्य प्रणाली पर पड़ने वाले प्रभाव पर सवाल उठते हैं। संसदीय लोकतंत्र केवल चुनाव की जीत और प्रधानमंत्री बनने की प्रक्रिया नहीं है, इसमें प्रधानमंत्री को संस्कार, अनुशासन एवं जिम्मेदारी स्वीकारनी पड़ती है।

आज के व्यवहार से स्पष्ट होता है कि प्रधानमंत्री संवैधानिक संस्कार और परंपरा के प्रति कितने गंभीर हैं। राष्ट्रपति भी संसद द्वारा चयनित हैं और राष्ट्रप्रमुख की मर्यादा ही राष्ट्र की गरिमा का प्रतीक होती है। हमें उनका सम्मान करना आवश्यक है। राष्ट्रपति द्वारा सरकार के कार्यक्रम के प्रस्तुति के दौरान प्रधानमंत्री की कुर्सी खाली रहना क्या दर्शाता है? सरकार मुखिया द्वारा संसद की गरिमा के प्रति उदासीनता दिखाना मंत्रियों, सांसदों और कर्मचारीतंत्र के लिए किस प्रकार का संदेश है? नेतृत्व का व्यवहार प्रणाली के चरित्र को बनाता है। प्रधानमंत्री संसदीय प्रक्रिया को हल्के में क्यों लेते हैं? अभी संसद में नया चलन कहकर परंपरा के विरुद्ध विद्रोह और उसका समर्थन बढ़ा है, लेकिन यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत है। संस्थागत स्थिरता और गरिमा बनाए रखने के लिए कुछ परंपराएं अपरिहार्य हैं। संसद, राष्ट्र प्रमुख, प्रधानमंत्री और सभामुख को विशेष सम्मान दिया जाता है। नेपाल आज संस्थागत अविश्वास, अराजकता और अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है, ऐसे में युवा प्रधानमंत्री को परिपक्वता और धैर्य का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। आज प्रधानमंत्री ने बैठक छोड़ी, तो कल कोई राष्ट्रप्रमुख के संबोधन को अस्वीकार कर सकता है, परसों संवैधानिक प्रक्रियाओं की उपेक्षा हो सकती है, जो संस्थाओं को कमजोर बनाता है। प्रधानमंत्री को समझना होगा — यदि सुधार के नाम पर बुनियादी संस्कार और मर्यादा को तोड़ा गया तो अंततः यह उनकी ही कमजोरी होगी और जनता का भरोसा डिगेगा।

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