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बदनाम उपभोक्ता समिति ब्युँताउने तयारीमा मधेश सरकार

मधेश सरकार बदनाम उपभोक्ता समिति के जरिए काम चलाने की तैयारी में

समाचार सारांश

संपादकीय रूप से समीक्षा किया गया।

  • मधेश प्रदेश सरकार २५ लाख रुपये तक के योजनाओं को उपभोक्ता समितियों के माध्यम से कार्यान्वित करने की तैयारी कर रही है।
  • भौतिक पूर्वाधार मंत्रालय ने अपने अधीन कार्यालयों को मौखिक रूप से उपभोक्ता समितियों के जरिए काम करने का निर्देश दिया है।
  • सरकार ने सार्वजनिक खरीद अधिनियम के तहत अतीत की चिट्ठी खरीद-बिक्री जैसी अनियमितताओं को न दोहराने की प्रतिबद्धता जताई है।

6 चैत, जनकपुरधाम। मधेश प्रदेश में उपभोक्ता समितियों के माध्यम से योजनाओं के काम करने की प्रणाली पहले काफी बदनाम रही है। योजनाओं में चिट्ठी (ठेके) खरीद-बिक्री के व्यापक आरोपों के बाद तत्कालीन प्रदेश सरकार ने इस वर्ष उपभोक्ता समितियों के माध्यम से काम न करने का निर्णय लिया था।

लेकिन वर्तमान गठबंधन सरकार पुरानी बदनाम प्रणाली को फिर से संचालित करने की तैयारी कर रही है। नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन ने समय अभाव का हवाला देते हुए पुरानी प्रणाली से काम करने का निर्णय लिया है।

मधेश में सबसे अधिक योजनाएं भौतिक पूर्वाधार विकास मंत्रालय की हैं, जहाँ लगभग २५ लाख रुपये तक की करीब 2500 योजनाएं हैं।

यह मंत्रालय अपने अधीन भौतिक पूर्वाधार कार्यालयों को उपभोक्ता समितियों के माध्यम से काम करने के लिए मौखिक निर्देश दे चुका है। मंत्रालय के निमित्त सचिव संजयकुमार साह ने २५ लाख रुपये तक की योजनाएं उपभोक्ता समितियों से कार्यान्वित करने के लिए मौखिक निर्देश मिलने की पुष्टि की।

उन्होंने कहा, ‘पत्राचार तो नहीं हुआ है, लेकिन २५ लाख रुपये तक की योजनाओं के लिए अधीनस्थ निकायों को मौखिक रूप से निर्देश दिया गया है।’

२५ लाख रुपये तक की योजनाएं ऊर्जा, सिंचाई एवं पेयजल मंत्रालय, उद्योग पर्यटन मंत्रालय, भूमि व्यवस्था और कृषि सहकारी मंत्रालय, शिक्षा एवं संस्कृति मंत्रालय, खेलकूद एवं सामाजिक कल्याण मंत्रालय, स्वास्थ्य एवं जनसंख्या मंत्रालय समेत अन्य में हैं। इन मंत्रालयों और उनके अधीन निकायों में उपभोक्ता समितियों के माध्यम से होने वाली योजनाओं के लिए सांसद, बिचौलिये और करीबी कार्यकर्ता चिट्ठी पाने की होड़ में जुटे हैं।

वर्तमान सत्ता साझेदार जसपा नेपाल और नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी समेत गठबंधन पुरानी आदतों को दोहराते हुए उपभोक्ता समितियों के जरिए काम करना चाहते हैं।

गत वित्तीय वर्ष 2081/082 में तत्कालीन जनमत पार्टी के सतीशकुमार सिंह नेतृत्व वाली सरकार ने बजट वक्तव्य में खुला प्रतिस्पर्धा द्वारा काम करने का उल्लेख करते हुए उपभोक्ता समितियों के काम करने पर रोक लगाने का प्रयास किया था। हालांकि, एमाले और कांग्रेस सहित दलों के दबाव में वे पीछे हट गए और सदन से प्रस्ताव पारित कर ५० लाख तक की योजनाएं उपभोक्ता समितियों से कार्यान्वित करने का प्रावधान रखा।

इस तरीके से कार्य करते हुए चिट्ठी खरीद-बिक्री का मामला खूब चर्चा में आया था। प्रमुख विपक्षी जसपा नेपाल और विपक्षी नेकपा माओवादी केंद्र इसके खिलाफ थे। लंबे समय के दबाव के बाद प्रदेश सभा में जेठ २२ को जांच समिति गठित हुई, जिसका रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं हुआ है।

अब सत्ता साझा करने वाले जसपा नेपाल और नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी सहित गठबंधन फिर से इसी पुरानी प्रणाली को अपनाने की कोशिश कर रहे हैं।

जसपा उपभोक्ता समितियों का सबसे अधिक समर्थन कर रहा है क्योंकि अधिकांश उपभोक्ता समिति आधारित काम भौतिक पूर्वाधार मंत्रालय के अंतर्गत आता है जो उसका हिस्सा है।

जसपा संसदीय दल के नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री सरोजकुमार यादव का कहना है कि समय की कमी के कारण योजनाओं के कार्यान्वयन के लिए उपभोक्ता समितियों से काम कराने की तैयारी की गई है।

उन्होंने कहा, ‘समय कम है इसलिए सभी योजनाएं टेंडर के माध्यम से कर पाना सम्भव नहीं है। उपभोक्ता समितियों से काम कराना गलत नहीं है, चिट्ठी खरीद-बिक्री करना गलत है। पहले उपभोक्ता समितियों से १० हजार से अधिक योजनाएं कार्यान्वित हुई हैं। कई बार भ्रष्टाचार जांच में आई पर कोई दोष नहीं मिला। जबकि टेंडर प्रणाली में कई मुकदमों में फंसे हैं।’

भौतिक पूर्वाधार मंत्री राजकुमार गुप्ता ने उपभोक्ता समितियों से काम करने के विषय में दलों के बीच चर्चा जारी होने की बात कही है।

अर्थ मंत्री भी रह चुके जनमत संसदीय दल के नेता महेशप्रसाद यादव के अनुसार २५ लाख रुपये तक की योजनाओं को उपभोक्ता समितियों से कार्यान्वयन करने पर सर्वदलीय सहमति हो चुकी है।

उन्होंने कहा, ‘गठबंधन और अन्य दलों की बैठकें हो चुकी हैं। मुख्यमंत्री जी ने उपभोक्ता समितियों में न जाने की अड़चन जताई थी, लेकिन सभी पक्षों ने समय की कमी, सचिवों की प्रतिस्पर्धात्मक प्रक्रिया से योजनाएं टूटने और कार्यान्वयन में समस्या आने की वजह बताई।’

मंत्री यादव के अनुसार पिछले भ्रष्टाचार न हो इसलिए सार्वजनिक खरीद अधिनियम के अनुसार ही कार्यान्वयन करने की मौखिक सहमति सर्वदलीय बैठक में हुई है।

उन्होंने कहा, ‘समय की तंगी और योजनाओं के टूटने से कार्यान्वयन में कमजोरी न आये इसलिए सर्वदलीय सहमति से व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाया गया है। यदि पूर्व की तरह चिट्ठी खरीद-बिक्री जैसी गड़बड़ी हुई तो संबंधित मंत्री और दल जिम्मेदार होंगे।’

हालांकि वर्तमान सरकार के माओवादी केन्द्र (अब नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी) के संसदीय दल नेता युवराज भट्टarai का दावा है कि २५ लाख रुपये तक की योजनाओं को उपभोक्ता समितियों से कार्यान्वयन करने पर कोई चर्चा या सहमति नहीं हुई है।

उपभोक्ता समितियों के जरिए काम करने की अवधारणा के अनुसार मधेश में यह प्रणाली पहले कारगर नहीं रही है।

उनका कहना है, ‘गठबंधन के भीतर उपभोक्ता समितियों के जरिए काम करने पर कोई सहमति नहीं है।’

सुशीला कार्की के नेतृत्व वाली सरकार ने गत असोज में सभी प्रदेश सरकारों और स्थानीय निकायों को १० लाख रुपये से अधिक की योजनाओं के लिए खुली प्रतिस्पर्धा का निर्देश दिया था।

उनके पत्र की धारा १४ में कहा गया था, ‘नेपाल सरकार द्वारा संचालित या वित्तीय हस्तांतरण प्राप्त प्रदेश और स्थानीय तहों में १० लाख रुपये से अधिक की परियोजना उपभोक्ता समितियों के माध्यम से नहीं कार्यान्वित की जाएगी। साथ ही योजना को तोड़कर उपभोक्ता समितियों से कार्य करने की अनुमति नहीं दी जायेगी।’

लेकिन मधेश सरकार सुशासन कायम करने और विकृतियों को कम करने के बजाय बदनाम प्रणाली को बढ़ावा देने की ओर बढ़ती नजर आ रही है।

मधेश में उपभोक्ता समिति क्यों बदनाम हुई?

सार्वजनिक खरीद कानून के अनुसार एक करोड़ तक की योजनाओं को उपभोक्ता समितियों से कार्यान्वित करने की व्यवस्था है, लेकिन जिस तरह काम होना चाहिए उसके अनुरूप मधेश में उपभोक्ता समितियों से सही तरीके से कार्य नहीं हुआ।

कार्यालयों द्वारा विभिन्न स्तरों पर खुली बैठक कर उपभोक्ता समिति बनानी होती है, लेकिन यहाँ मंत्री सचिवालय द्वारा नामावली बनाकर कार्यालय को भेजी जाती है, उस सूची में शामिल लोग सांसद, बिचौलिये और अन्य प्रभावी लोगों के दबाव में चिट्ठी लेकर गोपनीय रूप से प्रक्रिया पूरी कर उपभोक्ता समिति बनाते हैं। इसके बाद ठेकेदार को पेटी कॉन्ट्रैक्ट पर काम देना प्रचलित हो गया है। इससे उपभोक्ता समिति की छवि खराब हुई है।

इस बार भी सरकार उपभोक्ता समितियों से काम नहीं कराने का प्रयास कर रही थी, पर तत्कालीन विवादित मुख्यमंत्री और एमाले संसदीय दल के नेता सरोजकुमार यादव के फैसले ने राहत दी।

उन्होंने मंत्रिपरिषद से २५ लाख रुपये से ऊपर की योजनाओं को खुली प्रतिस्पर्धा से कार्यान्वित करने का निर्णय लिया था। कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार बनने के बाद उनकी कर्मचारी स्थानांतरण संबंधी निर्णय रद्द हो गए, लेकिन यह निर्णय बरकरार रखा गया। इसी आधार पर मधेश सरकार २५ लाख रुपये तक की योजनाएं उपभोक्ता समितियों से करने की योजना बना रही है।

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