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‘प्रधानमन्त्रीले चाहे ७० प्रतिशत भ्रष्टाचार रोक्न सक्छन्’

‘प्रधानमंत्री चाहें तो ७० प्रतिशत भ्रष्टाचार को रोक सकते हैं’

समाचार सारांश

  • प्रधानमंत्री कार्यालय देश की शासन व्यवस्था का मुख्य केंद्र है और मंत्रिपरिषद के निर्णयों के क्रियान्वयन एवं निगरानी करता है।
  • प्रधानमंत्री कार्यालय में कर्मचारियों के ट्रांसफर, प्रमोशन और नियुक्ति में हस्तक्षेप हो रहा है, जिसे रोकना आवश्यक है, त्रिताल ने कहा।
  • भ्रष्टाचार नियंत्रण के लिए शक्तिशाली आयोग बनाकर पूर्व पदाधिकारियों की संपत्ति की जांच और जमीन-जायदाद के दुरुपयोग की जांच आयोग आवश्यक है, त्रिताल ने बताया।

बालुवाटार स्थित प्रधानमंत्री सरकारी निवास की जमीन भूमाफियाओं द्वारा व्यक्तिगत नाम पर रजिस्टर्ड किए जाने की जांच कर चर्चित पूर्व सचिव शारदाप्रसाद त्रिताल हैं। लालिता निवास प्रकरण के नाम से प्रसिद्ध इस प्रकरण की अध्ययन समिति के अध्यक्ष रहे त्रिताल के पास प्रधानमंत्री कार्यालय सुधार का अनुभव भी है।

शाखा अधिकारी, उप सचिव और सह सचिव के पद पर प्रधानमंत्री कार्यालय में कार्यरत रहे त्रिताल ने १९९७ (२०५४) से शुरू हुए प्रधानमंत्री कार्यालय परिवर्तन प्रयासों का निकट से अनुभव किया है। बालेन शाह के नेतृत्व में नई सरकार बनने पर प्रधानमंत्री तथा मन्त्रिपरिषद कार्यालय को जनमुखी बनाने के लिए पूर्व सचिव त्रिताल के साथ हुई बातचीत का संपादित अंश प्रस्तुत है:

नए प्रधानमंत्री बालेन शाह सिंहदरबार से शासन संभालते हुए सुधार की शुरुआत कहाँ से करें?

हमारी शासन व्यवस्था में प्रधानमंत्री सबसे जिम्मेदार पदाधिकारी हैं। सभी प्रबंध प्रधानमंत्री के निर्देशन और नेतृत्व में चलते हैं। प्रधानमंत्री तथा मन्त्रिपरिषद कार्यालय प्रधानमंत्री के कार्य में सहयोग करने वाला मुख्य निकाय है। पूरे देश की शासन प्रणाली का प्रमुख केंद्र यही कार्यालय है।

पहले प्रधानमंत्री बालुवाटार को केंद्र बनाते थे। वास्तव में सुशासन का उदाहरण सिंहदरबार या प्रधानमंत्री तथा मन्त्रिपरिषद कार्यालय ही है। मंत्रिपरिषद के निर्णयों को लागू कराने वाला मुख्य निकाय भी यही कार्यालय है।

यह कार्यालय निर्णयों को अन्य निकायों को भेजने, उनके क्रियान्वयन की निगरानी, नीतियों का विश्लेषण तथा निर्माण में भूमिका निभाता है। मंत्रालयों के प्रस्तावों की जाँच-परख कर उपयुक्तता मूल्यांकन भी करता है। प्रधानमंत्री कार्यालय और मन्त्रिपरिषद सचिवालय देश के कानून निर्माण की प्रारंभिक जगह हैं।

यहीं निर्णय होते हैं, जिससे कानून का मसौदा संसद में प्रस्तुत किया जाता है। नीतियां यहीं तय होती हैं और संसद द्वारा बनाए गए कानूनों के कुशल कार्यान्वयन पर भी निगरानी इसी कार्यालय की होती है।

प्रधानमंत्री कार्यालय सभी प्रकार की सूचनाओं का केंद्रीय स्थल होना चाहिए। देश के विकास और सुशासन के लिए आवश्यक सभी सूचना यहां उपलब्ध होनी चाहिए, जिन्हें प्रधानमंत्री का सही उपयोग करना चाहिए।

सबसे उच्चतम स्तर से सुधार शुरू होना चाहिए। परिवर्तन और सरकार के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय मजबूत व सक्षम होना आवश्यक है। यह संस्था प्रभावी हुई तो अन्य संस्थाएं भी प्रभावशाली होंगी।

प्रधानमंत्री कार्यालय में सुधार की शुरुआत कहाँ करें? सबसे पहले जनशक्ति प्रबंधन क्षेत्र से?

प्रधानमंत्री कार्यालय में आमतौर पर ईमानदार कर्मचारी अनुभवहीनता के कारण रुक-रुक कर काम करते हैं। उनका सहयोग अगर मिलता तो सुधार संभव था, लेकिन ट्रांसफर और प्रमोशन में दखल के कारण कर्मचारी असहज महसूस करते हैं। उन्हें टालना और नजरअंदाज करना सामान्य बात बन गई है।

अन्य लोकतांत्रिक देशों में नीति निर्माण और विश्लेषण के लिए सबसे सक्षम और ईमानदार कर्मचारी नियुक्त किये जाते हैं। भारत में सबसे योग्य कर्मचारी प्रधानमंत्री कार्यालय या सचिवालय में काम करना चाहते हैं, लेकिन हमारे यहां यह सोच परम्परागत नहीं है।

प्रधानमंत्री कार्यालय का मूल चरित्र कैसा होना चाहिए? निगरानी केंद्रित, समन्वय केंद्रित या नीति चर्चा केंद्रित?

प्रधानमंत्री कार्यालय अनुसंधानपरक और नवाचारात्मक होना चाहिए। समन्वयकारी शैली भी आवश्यक है। कर्मचारी ट्रांसफर, खरीद, प्रमोशन, नियुक्ति आदि कार्यों में दखल बंद होना चाहिए।

नीति, कार्यान्वयन और परिणामों में हस्तक्षेप आवश्यक है – जहां कार्य बेहतर हो वहां विस्तार करना चाहिए और जहां सुधार की जरूरत हो वहां हस्तक्षेप करना जरूरी है।

प्रधानमंत्री व्यक्ति और कार्यालय की प्राथमिकताएँ अलग होती हैं या समान?

प्रधानमंत्री की इच्छाओं को वैधानिकता देने का काम मंत्रिपरिषद का होता है। प्रधानमंत्री अकेले निर्णय नहीं करते, योजनाएं केवल मंत्रिपरिषद के निर्णय से लागू होती हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय कार्यान्वयन का माध्यम है। देश की सभी संस्थाओं की मूल संस्था प्रधानमंत्री तथा मंत्रिपरिषद कार्यालय है। ये दोनों भिन्न नहीं हैं और प्राथमिकताएँ भी समान होती हैं।

प्रधानमंत्री राजनीतिक दल और अन्य गतिविधियों को समय देते हैं, क्या यह अलग है?

यह अलग बात है लेकिन प्रधानमंत्री दल के प्रवक्ता नहीं हो सकते। वे सभी दलों और सांसदों के नेता होते हैं। राजनीतिक दल से ऊपर उठकर देश का नेतृत्व करना होगा। सरकार का दलगत नाम से अलग होना आवश्यक है।

सरकार को यह दिखाना होगा कि वह भ्रष्टाचार नियंत्रण में संलग्न है। जमीन के दुरुपयोग की जांच और संपत्ति की जांच के लिए आयोग बनाना होगा। छोटे-छोटे भ्रष्टाचार रोकने का दावा पूरा करने के लिए सरकार को सशक्त होना पड़ेगा।

प्रधानमंत्री कार्यालय में प्रशासनिक संरचना और सचिवालय की भूमिका कैसी होनी चाहिए?

प्रधानमंत्री कार्यालय में सलाहकार और विशेषज्ञ होते हैं, जिन्होंने अपने कार्यालय स्थापित कर सरकारी संसाधनों का उपयोग कर कर्मचारियों पर शासन करने का रुझान विकसित किया, जो गलत है। विशेषज्ञ टीम बालुवाटार में ही रहे और केवल सलाहकार भूमिका निभाएं।

विशेषज्ञों को कर्मचारियों के साथ समन्वय करना चाहिए अन्यथा दबाव बढ़ेगा और कार्यक्षमता घटेगी। वर्तमान में ईमानदार कर्मचारी काम करना कठिन समझ रहे हैं, जिसे रोकना आवश्यक है।

क्या प्रधानमंत्री अपनी टीम बना सकते हैं?

प्रधानमंत्री टीम बना सकते हैं, लेकिन बालुवाटार में रहकर समूह में चर्चा करनी चाहिए। विशेषज्ञ टीम को सामूहिक संवाद की आदत डालनी चाहिए अन्यथा कर्मचारियों पर दबाव पड़ सकता है।

प्रधानमंत्री कार्यालय सिंहदरबार में न होकर बालुवाटार से काम करने पर मीडिया आलोचना करता है, क्या यह सही है?

प्रधानमंत्री को सिंहदरबार से ही काम करना चाहिए। विशेषज्ञों को प्रशासनिक संरचना में दखल देना गलत है।

जनता द्वारा निर्वाचित प्रधानमंत्री के चुनाव घोषणा पत्र में शामिल विषयों को सरकार के कार्यक्रम में कैसे शामिल करें? राजनीति को कितना स्थान दें?

दूसरों की तुलना में द्वैत मत हासिल दल को घोषित वादे कार्यान्वित करने चाहिए, लेकिन यह मंत्रिपरिषद के निर्णय अथवा कानून तो बनाकर लागू करना होता है। प्रधानमंत्री स्वयं जबरदस्ती लागू नहीं कर सकते।

अपने दल के सलाहकार लाना और सरकारी कार्यों में दल का प्रभाव बढ़ाना विकृति है। राजनीतिक सलाहकारों को गुणवत्ता दिखानी होती है, अन्यथा सुझाव नहीं माने जाते।

संघीय, प्रादेशिक और स्थानीय सरकार से समन्वय कैसा होना चाहिए?

हर स्तर पर समन्वय की व्यवस्था होनी चाहिए। प्रदेश और स्थानीय सरकार को अधीन इकाई नहीं समझना चाहिए। संविधान और कानूनों में दी गई व्यवस्थाओं को नियमित रूप से लागू करना होगा। बैठकें आयोजित कर तुरन्त समस्याओं का समाधान करना आवश्यक है।

प्रधानमंत्री कार्यालय परिवर्त्तन २०५४ से शुरू हुआ, तब से किस प्रकार के सुधार हुए?

हमने संविधान, कानून और भारत की प्रणाली का अध्ययन कर डेस्क प्रणाली अपनाने की सिफारिश की थी। पहले प्रधानमंत्री कार्यालय और मंत्रिपरिषद कार्यालय अलग थे, जिससे प्रबंधन जटिल था। एक कार्यालय बनाए जाने से प्रभाव बढ़ा, लेकिन नतीजे में बड़ी सुधार नहीं आया।

सूचना प्रौद्योगिकी के उपयोग से काम तेज हुआ है। सचिवालय और शाखा प्रबंधन पहले से बेहतर है, पर कर्मचारी अभी भी अवमूल्यित महसूस करते हैं।

संयुक्त सरकार और विभिन्न दलों के मंत्री होते समय सूचना संग्रहण में समस्याएं आईं। प्रधानमंत्री कार्यालय की कार्यक्षमता कम हुई लगती है।

प्रधानमंत्री कार्यालय मातहत संस्थाओं की निगरानी करता है, लेकिन अक्सर केवल कागजी रिपोर्ट संग्रह तक सीमित रहता है। दलगत सलाहकार और विशेषज्ञ दबाव बनाते हैं, जिससे मुख्य कार्य प्रभावित होते हैं।

अन्य देशों के प्रधानमंत्री कार्यालय से तुलना करें तो हम कितने पीछे हैं?

योजनाएं अच्छी हैं, पर जनता को महसूस होने वाला कार्य अभी भी कम है। प्रशासन बेहतर है लेकिन परिचालन में समस्या है।

पूर्व सरकार ने मंत्रियों पर नियंत्रण खो दिया और प्रधानमंत्री परिवार ने सचिवालय पर कब्जा किया, सुधार क्यों नहीं हुए?

प्रधानमंत्री के करीब कुछ लोग गैरकानूनी गतिविधियां कर रहे हैं। राजस्व जांच और संपत्ति शुद्धि विभाग को भेजना था, लेकिन परिवर्तन नहीं हुआ। विवादास्पद लोग नियुक्त होते रहे, जिन्हें राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है।

सुन तस्करी, नकली भूटानी शरणार्थी प्रकरण जैसे आर्थिक अपराध वहां मौजूद हैं। इसलिए प्रधानमंत्री कार्यालय की सत्ता का दुरुपयोग हुआ है।

उस सत्ता का सही उपयोग हो तो तुरंत सुधार नजर आएगा।

प्रधानमंत्री कार्यालय के आस-पास के संस्थान जैसे राष्ट्रीय सतर्कता केंद्र, सार्वजनिक खरीद निगरानी कार्यालय, नेपाल ट्रस्ट आदि उल्लेखनीय होते हुए भी निष्क्रिय क्यों हैं? क्या बदलाव हुआ है या सब यथावत है?

बालुवाटार में विश्वविद्यालयों के उप-कुलपति के पद प्रधानमंत्री द्वारा संरक्षित होते हैं, लेकिन समय नहीं दे पाते। राष्ट्रीय सतर्कता केंद्र भ्रष्टाचार नियंत्रण कर सकता है। मेरे अध्ययन के अनुसार यदि प्रधानमंत्री सक्रिय हों तो ७० प्रतिशत भ्रष्टाचार रोका जा सकता है।

सुशासन वाले देशों में भ्रष्टाचार नियंत्रण व्यवस्था प्रधानमंत्री के अधीन होती है। हमारे देश में भी ऐसी संस्था लेकिन कर्मचारी अव्यवस्थित हैं। नियम, संसाधन और कुशल कर्मचारी नहीं हैं।

प्रधानमंत्री इस संस्था को सशक्त बना सकते हैं, सूचना संग्रह करने और भ्रष्टाचार निरोधक संस्थान को भेजने में सक्षम कर सकते हैं। संस्था को सशक्त बनाए रखने के लिए स्थायी नेतृत्व चाहिए।

नई पीढ़ी के प्रधानमंत्रियों को क्या प्राथमिकता रखनी चाहिए?

जनजातीय युवा आंदोलन की पृष्ठभूमि से बनी नई सरकार को भ्रष्टाचार नियंत्रण, सुशासन कायम करने के साथ विकास व रोजगार के मुद्दे पूरा करने होंगे। देश की सबसे बड़ी समस्या भ्रष्टाचार है। सरकार को शुरू से ही स्पष्ट संदेश देना चाहिए कि वह भ्रष्टाचार नियंत्रण में लगी है।

नैतिक शासन स्थापित करना और राष्ट्रीय सतर्कता केंद्र को मजबूत कर उसका कार्यान्वयन करना आवश्यक है। शक्तिशाली आयोग बनाकर पूर्व पदाधिकारियों की संपत्ति की जांच की जा सकती है।

संपत्ति जांच कहां से शुरू हो?

मैं स्पष्ट हूं, जीएनके आन्दोलन से ठीक पहले की सरकार से शुरू करके पीछे जाना चाहिए। कुछ तो १९८९ (२०४६) तक भी जाना चाहेंगे। पंचायती व्यवस्था के भ्रष्टाचारों की भी जांच हो सकती है।
आयोग को चरणबद्ध प्रतिवेदन सौंपने और कार्यान्वयन शुरू करने की आवश्यकता है। प्रधानमंत्री, मंत्री, सांसद, उच्च पदस्थ कर्मचारी और राजनीतिक नियुक्तियों की संपत्ति की जांच संभव है।

क्या पंचायती काल के भ्रष्टाचार आज भी खोजे जा सकते हैं?

विशेष रूप से जमीन-जायदाद के दुरुपयोग के सबूत मिल सकते हैं। राजा के शासन में सरकारी जमीन निजी नामों पर देने की प्रथा थी जो भ्रष्टाचार है। नकली सुकुम्बासी नामों पर दे गई जमीन की न्यायिक आयोग द्वारा जाँच हो।

देश भर में जमीन-जायदाद का व्यापक दुरुपयोग है। आयोग बनाकर जांच कर कार्रवाई करनी चाहिए। निचले स्तर की रिश्वतखोरी पर नियंत्रण जरूरी है। जनता छोटी समस्याओं में परेशान न हो, लेकिन बड़े भ्रष्टाचार पर कार्रवाई शुरू होनी चाहिए।

वीडियो/तस्वीरः कमल प्रसाई

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