
नीति तो है, लेकिन कार्यान्वयन की कमी है
समाचार सारांश समीक्षा किए गए तथ्यों पर आधारित है। नेपाल ने 2012 में क्लाइमेट बजट टैगिंग प्रणाली लागू कर जलवायु वित्त प्रबंधन में अग्रणी भूमिका निभाई है। लेकिन स्थानीय स्तर पर इस प्रणाली का प्रभावी क्रियान्वयन न होने के कारण जलवायु वित्त की निगरानी और रिपोर्टिंग कमजोर है। नेपाल को जलवायु वित्त के प्रभावी अनुगमन और पारदर्शिता सुनिश्चित कर अंतरराष्ट्रीय स्रोतों से और अधिक वित्तीय सहायता प्राप्त करनी होगी। नेपाल को अक्सर दूरदर्शी जलवायु नीति वाले देशों में गिना जाता है। विश्व मंच पर जलवायु वित्त पर मजबूत आवाज बुलंद करते हुए नेपाल समुदाय की उत्तरजीविता बढ़ाने और अनुकूलन क्षमता सुदृढ़ करने के लिए अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्त की मांग करता रहा है।
विश्व के जलवायु जोखिम वाले शीर्ष 10 देशों में शामिल होने के साथ ही नेपाल 2012 में ‘क्लाइमेट बजट टैगिंग’ (CBT) लागू करने वाला पहला देश है। यह प्रणाली जलवायु परिवर्तन से जुड़े सार्वजनिक व्यय को वर्गीकृत एवं निगरानी के लिए बनाई गई है। अर्थ मंत्रालय इसका संचालन करता है। यह प्रणाली गतिविधि स्तर से अधिक परियोजना स्तर पर लागू की जाती है। इसके तहत राष्ट्रीय स्तर के परियोजनाओं को जलवायु कार्यों में योगदान के आधार पर प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष या तटस्थ माना जाता है। फिर इन्हें अनुकूलन, न्यूनीकरण या मिश्रित लाभ के क्षेत्रों में वर्गीकृत किया जाता है। जलवायु वित्त प्रबंधन और निगरानी को सशक्त करने के लिए अर्थ मंत्रालय ने 2017 में ‘क्लाइमेट चेंज फाइनेंसिंग फ्रेमवर्क’ (CCFF) भी मंजूर किया है।
नेपाल की जलवायु परिवर्तन नीति, राष्ट्रीय अनुकूलन योजना (NAP) और राष्ट्रीय निर्धारित योगदान (NDC) ने जलवायु उत्तरजीविता और कम-कार्बन उत्सर्जन के प्रति विकास प्रतिबद्धता को और मजबूत किया है। सरकार ने स्थानीय स्तर पर योजना निर्माण सुनिश्चित करने के लिए ‘लोकल अडाप्टेशन प्लान ऑफ एक्शन’ (LAPA) मॉडल को भी बढ़ावा दिया है। साथ ही कुल जलवायु वित्त के 80 प्रतिशत स्थानीय स्तर पर पहुँचाने का लक्ष्य भी निर्धारित किया गया है। कागज पर ये नीतियां, प्रणालियां और संरचनाएं प्रभावशाली लगती हैं और विश्व स्तरीय प्रथाओं तथा संस्थागत सोच पर आधारित हैं। परन्तु वास्तविकता अलग है। मौजूद प्रणाली अस्तित्व में है, लेकिन स्थानीय सरकार के अधिकारियों के साथ बातचीत में निष्कर्ष यही मिला कि जलवायु बजट टैगिंग तो है, लेकिन व्यवहार में इसका उपयोग बहुत कम होता है।
अधिकांश स्थानों पर अधिकारी इस विषय में अवगत नहीं हैं या इसे प्रभावी रूप से लागू करने के लिए आवश्यक प्रशिक्षण नहीं प्राप्त कर पाए हैं। स्थानीय योजना और बजट प्रक्रियाओं में CBT को शामिल करने के संस्थागत प्रयास सीमित हैं। इसका मतलब यह नहीं कि जलवायु-संबंधी कार्य नहीं हो रहे हैं। नगरपालिका स्तर पर ऊर्जा, कृषि, वन और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में नियमित बजट आवंटित हो रहा है। लेकिन इन्हें व्यवस्थित रूप से जलवायु वित्त के तहत टैग, मॉनिटर या रिपोर्ट नहीं किया गया है। परिणामस्वरूप जलवायु-संबंधी बड़े निवेश औपचारिक प्रणाली के बाहर रहते हैं। उदाहरण के तौर पर देवचुली और गैँडाकोट नगरपालिकाओं के बजट का प्रारंभिक विश्लेषण करने पर पाया गया कि वार्षिक बजट का लगभग 10 से 15 प्रतिशत खर्च जलवायु-संबंधी माना जा सकता है, लेकिन टैगिंग न होने के कारण ये आंकड़े रिपोर्टिंग प्रणाली में सम्मिलित नहीं हैं।
स्थानीय अधिकारी स्वयं इस कमी को स्वीकार करते हैं। एक नगरपालिका के अधिकारी ने कहा, ‘काम तो हो रहा है, अब समझ में आ रहा है कि ये जलवायु-संबंधित हैं। लेकिन अब तक इन्हें जलवायु हस्तक्षेप के रूप में अभिलेखित नहीं किया गया है।’ उन्होंने आगे कहा, ‘हम सहभागी प्रक्रियाओं द्वारा वार्षिक योजना बनाते हैं, लेकिन मेरी जानकारी में जलवायु टैगिंग का कोई उपयोग नहीं हुआ है।’ वैश्विक स्तर पर जलवायु वित्त विस्तार के दौर में नेपाल को संसाधन न मिलने का जोखिम है। ऐसा इसलिए नहीं कि पैसा उपलब्ध नहीं है, बल्कि इसका उपयोग दर्शाने वाले तंत्र का पूरी तरह से संचालित न होना समस्या है। यह दर्शाता है कि स्थानीय तह के कई कर्मचारी जलवायु वित्त तंत्र से अनजान हैं या जलवायु बजट निर्माण, रिपोर्टिंग और निगरानी के लिए आवश्यक तकनीकी क्षमता नहीं रखते।
योजना शाखा के अधिकारियों के अनुसार, योजना प्रक्रिया शुरू होने से पहले आवश्यक प्रशिक्षण दिया जाए तो CBT को शामिल किया जा सकता है। निगरानी क्यों महत्वपूर्ण है? शुरू में यह समस्या तकनीकी लग सकती है, लेकिन प्रभाव बहुत गहरा होता है। उचित निगरानी के बिना यह स्पष्ट नहीं होता कि नेपाल जलवायु क्षेत्र में कितना निवेश कर रहा है। ऐसे निवेश कितने प्रभावी हैं, यह मापना भी कठिन होता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय स्रोतों से और अधिक जलवायु वित्त आकर्षित करने के अवसर कमजोर हो सकते हैं। विश्वव्यापी जलवायु वित्त प्रणाली आज पारदर्शिता, प्रदर्शन और जवाबदेही के आधार पर चल रही है। ‘ग्रीन क्लाइमेट फंड’ (GCF), ‘ग्लोबल एनवायरनमेंट फॅसिलिटी’ (GEF) और ‘एडाप्टेशन फंड’ जैसे कोष नेपाल जैसे जोखिम वाले देशों से केवल प्रतिबद्धताएं नहीं, बल्कि मापन योग्य परिणाम भी मांगते हैं। अगर नेपाल यह स्पष्ट नहीं कर पाता कि जलवायु वित्त कहां और कैसे खर्च हो रहा है, तो ये अवसर खो सकते हैं।
समान पहुंच का प्रश्न: जलवायु वित्त किसे मिल रहा है? नेपाल की जलवायु नीतियां गरीब परिवारों, महिलाओं, सीमान्तकृत समुदायों और जलवायु जोखिम वाले क्षेत्रों के निवासियों को प्राथमिकता देने की बात निरंतर दोहराती हैं। लेकिन खर्च का स्पष्ट अभिलेख न होने से यह सुनिश्चित करना कठिन होता है कि ये समुदाय वास्तव में लाभान्वित हो रहे हैं या नहीं। मुख्य सवाल यही है: क्या जलवायु वित्त सबसे जोखिमग्रस्त समुदायों तक पहुंच रहा है? वर्तमान स्थिति से ऐसा लगता है कि अधिक संसाधन सशक्त या प्रभावशाली समुदायों को मिलते हैं, जबकि दूरदराज के जोखिमग्रस्त क्षेत्र छूट सकते हैं। निगरानी और प्राथमिकता निर्धारण के स्पष्ट तंत्र न होने के कारण समानता का लक्ष्य केवल नीति तक सीमित रह सकता है। योजना प्रक्रियाओं में जलवायु बजट टैगिंग के न होने से ये असंतुलन और बढ़ता है।
भविष्य की चुनौती: वैश्विक जलवायु कोष परिणाम आधारित वित्त, पारदर्शिता और जवाबदेही पर केंद्रित हो रहे हैं, ऐसे में नेपाल को इन स्रोतों का उपयोग करने के लिए अपनी क्षमता साबित करनी होगी। यही कारण है कि नेपाल एक द्विविधा में है। जलवायु वित्त की निगरानी के लिए नीति और संस्थागत व्यवस्था तो बनाई गई है, लेकिन व्यवहार में इन्हें प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया गया है। जब दुनिया भर में जलवायु वित्त बढ़ रहा है, नेपाल के पास संसाधन न मिलने का खतरा है। ऐसा इसलिए नहीं कि पैसा नहीं है, बल्कि उपयोग दिखाने वाले तंत्र पूरी तरह से क्रियाशील नहीं हैं। स्थानीय सरकार जलवायु निवेश का प्रभाव और उपयोग नहीं दिखा पाती, जिससे विशेष रूप से अंतरराष्ट्रीय स्रोतों से वित्तीय अवसरों का लाभ उठाना कठिन हो जाता है।
इसी बीच नेपाल में जलवायु वित्त सुशासन की एक और चुनौती बढ़ती अनुकूलन आवश्यकताओं और घरेलू वित्तीय क्षमता के असंतुलन की है। राष्ट्रीय अनुकूलन योजना (NAP) 2021/2050 ने जलवायु उत्तरजीविता को राष्ट्रीय प्राथमिकता माना है, लेकिन इसकी लगभग 90 प्रतिशत वित्तीय जरूरतें बाहरी स्रोतों पर निर्भर हैं। GCF, एडाप्टेशन फंड, GEF, द्विपक्षीय और बहुपक्षीय दाता संस्थाएं इसके प्रमुख स्रोत हैं। लेकिन इन कोषों तक पहुंचने के लिए जलवायु बजट निगरानी, पारदर्शी रिपोर्टिंग और प्रभाव के प्रमाण आवश्यक हैं। खासकर प्रदेश और स्थानीय स्तर पर संस्थागत तथा तकनीकी क्षमताएं कमजोर दिखती हैं।
मजबूत शासन व्यवस्था, प्रभावी डेटा प्रणाली, स्थानीय क्षमता वृद्धि और संस्थागत समन्वय के माध्यम से नेपाल जलवायु वित्त की जरूरत और कार्यान्वयन के बीच का अंतर कम कर सकता है। इस अंतर को कैसे कम करें? इसके लिए सभी स्तरों पर जलवायु वित्त सुशासन, संस्थागत क्षमता और जवाबदेही प्रणालियों को मजबूत बनाना आवश्यक है। सबसे जरूरी कदम है स्थानीय योजना और बजट प्रक्रिया में जलवायु बजट टैगिंग को संस्थागत रूप देना। जलवायु संबंधित निवेश को केवल परियोजना स्तर पर ही नहीं, बल्कि गतिविधि स्तर पर भी टैगिंग करना होगा ताकि अनुकूलन और न्यूनीकरण में वास्तविक योगदान का मापन हो सके। इससे स्थानीय सरकार यह स्पष्ट दिखा सकेगी कि जलवायु वित्त कहां खर्च हो रहा है और इससे क्या उपलब्धियां मिली हैं। क्षमता विकास भी समान रूप से आवश्यक है। नियमित प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन और स्थानीय एवं प्रदेश स्तर पर जलवायु-केंद्रित कर्मचारियों की नियुक्ति से योजना निर्माण प्रक्रिया अधिक प्रभावी बन सकती है।
साथ ही, सशक्त ‘मॉनिटरिंग, रिपोर्टिंग और वेरिफिकेशन’ (MRV) प्रणाली का विकास जरूरी है। अंतरराष्ट्रीय जलवायु कोष ऐसे निवेश से होने वाले जोखिम कम करने और उत्तरजीविता बढ़ाने के प्रमाण मांगते हैं। इसलिए डेटा प्रणाली, प्रभाव मूल्यांकन और अभिलेखीकरण प्रक्रियाओं को मजबूत करना आवश्यक है। संघीय, प्रदेश और स्थानीय सरकारों के बीच समन्वय और स्वामित्व भी उतना ही महत्वपूर्ण है। फिलहाल जलवायु वित्त की जिम्मेदारी विभिन्न निकायों में अलग-अलग है, जिससे दोहराव और कमजोर रिपोर्टिंग की समस्या उत्पन्न होती है। स्पष्ट भूमिकाओं के साथ नियमित विकास योजनाओं में जलवायु वित्त को शामिल करने से प्रणाली और प्रभावी हो सकती है।
निष्कर्ष: नेपाल ने जलवायु वित्त के लिए मजबूत नीतिगत संरचना बनाई है। अब इसका चुनौतीपूर्ण चरण है इसे प्रभावी ढंग से लागू करना। अंततः जलवायु वित्त केवल नीति या बजट का विषय नहीं है, बल्कि यह वह सहायता है जो सबसे जरूरतमंद समुदायों तक पहुंचनी चाहिए। यदि प्रणाली केवल कागजों तक सीमित रह गई तो जलवायु वित्त का वादा भी कागज तक सीमित रह जाएगा। लेकिन अगर ये प्रणालियां व्यवहार में उतार दी गईं तो ये समुदाय की उत्तरजीविता बढ़ाने वाला सशक्त माध्यम बन सकती हैं। इसलिए, मजबूत शासन व्यवस्था, प्रभावी डेटा प्रणाली, स्थानीय क्षमता विकास और संस्थागत समन्वय के माध्यम से नेपाल जलवायु वित्त की आवश्यकता और क्रियान्वयन के बीच का अंतर धीरे-धीरे खत्म कर सकता है। लेखक फॉरेस्ट एक्सन नेपाल में जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संबंधी विषयों के शोधकर्ता हैं।