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संसद् वाकआउट गरेर प्रधानमन्त्री बालेनले दिएको सन्देश

प्रधानमंत्री बालेन द्वारा संसद से वाकआउट पर दिया गया संदेश

समाचार सारांश

संपादकीय रूप में पुनः समीक्षा की गई।

  • श्रम संस्कृति पार्टी के सांसदों ने प्रतिनिधि सभा की बैठक में पर्चा लेकर प्रधानमंत्री से संसद के प्रति जवाबदेह होने की मांग की।
  • प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह संसद की बैठक में अनुपस्थित हैं, पर इसका कोई कारण नहीं बताया गया और इस पर संसदीय परंपरा ना निभाने की आलोचना हो रही है।
  • विशेषज्ञों का मानना है कि प्रधानमंत्री का संसद बहिष्कार अस्वीकार्य मानसिकता दर्शाता है और संसदीय मर्यादा का पालन आवश्यक है।

५ जेठ, काठमांडू। श्रम संस्कृति पार्टी (श्रसंपा) के सांसद सोमवार को प्रतिनिधि सभा की बैठक में पर्चा लेकर पहुंचे। श्रसंपा के अध्यक्ष हरकराज साम्पांग द्वारा लाए गए पर्चे में सबसे ऊपर लिखा था—प्रधानमंत्री संसद के प्रति जवाबदेह होना जरूरी है।

बैठक में बोलते हुए साम्पांग ने इसे स्पष्ट करते हुए कहा, ‘मैंने जो प्लेकार्ड पहना है, उसके बारे में सभी को जिज्ञासा होगी। मैं यह प्रश्न पूछना चाहता हूं कि क्या संसद सार्वभौम है या सरकार सार्वभौम है? यह प्रयास सरकार को संसद के प्रति जवाबदेह बनाने का है।’

प्रतिनिधि सभा से पारित सरकार के आर्थिक वर्ष २०८३/०८४ के नीति तथा कार्यक्रम को कुछ लोग भूल चुके हैं, लेकिन नीति तथा कार्यक्रम सदन में आने के बाद सरकार के प्रमुख की भूमिका पर बहस जारी है।

शरसंपा का विरोध भी इसी की निरंतरता प्रतीत होता है।

नीति तथा कार्यक्रम पास हुए कई दिन बीत गए, लेकिन प्रधानमंत्री बालेन्द्र (बालेन) शाह ने सदन में उपस्थित न होने या न हो पाने का कारण नहीं बताया है। वे न केवल संसद में, बल्कि बाहर भी कुछ बोलने से बच रहे हैं।

अपने ही चुनाव और पार्टी के दो-तिहाई बहुमत वाली संसद में प्रधानमंत्री के लिए ऐसा व्यवहार क्यों होगा? यह सवाल उठता है।

‘वे राजनीति के प्रति बहुत नकारात्मक हैं, शायद राष्ट्रपतिगी भी उन्हीं नजरिए से देखते हैं,’ प्रोफेसर कृष्ण खनाल कहते हैं, ‘संविधान और इस व्यवस्था के प्रति उनकी समझ मुझे अभी तक समझ में नहीं आयी।’

इस विषय पर रविवार को एक कार्यक्रम में प्रोफेसर खनाल ने कहा, ‘प्रधानमंत्री की पूरी कार्यशैली देखने से लग रहा है कि वे संसदीय प्रणाली के प्रधानमंत्री बनकर रहना नहीं चाहते।’

प्रधानमंत्री शाह के अतीत की घटनाएं देखे तो प्रोफेसर खनाल के तर्क से असहमत होना मुश्किल है। आइए एक उदाहरण पर नज़र डालते हैं।

तारीखः २०७९ मंसिर ४

संदर्भः प्रतिनिधि सभा एवं प्रदेश सभा चुनाव

स्थानः काठमांडू–गैरीगाउँ स्थित अन्नपूर्ण मतदान केंद्र

काठमांडू महानगर के तत्कालीन मेयर शाह मतदान केंद्र पहुंचे और प्रतिनिधि सभा के प्रत्यक्ष तथा समानुपातिक मतपत्र डालकर बाहर निकलने लगे।

उन्हें रोकते हुए सुरक्षा कर्मी ने प्रदेश सभा के मत पेटिका की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘यहां बाकी है सर!’’

शाह ने एक हाथ उठाकर उन्हें रोका और मतदान स्थल से बाहर निकल गए।

इसके बाद आलोचक उनके संघवाद के प्रति दृष्टिकोण पर संदेह करने लगे।

हालांकि नागरिकों को मतदान करने की स्वतंत्रता है, लेकिन सार्वजनिक पद पर होने के कारण संविधान की सख्ती से पालन करना चाहिए, यह बात कुछ लोगों ने उठाई और उनकी आलोचना की।

स्वतंत्र उम्मीदवारी से मेयर बने शाह ने २१ फागुन के चुनाव के पूर्व राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी (रास्वपा) में प्रवेश करके वरिष्ठ नेता का पद संभाला।

जनकपुर में दिए गए चुनावी भाषण के बाद कई लोगों ने उनका शासन तंत्र के प्रति नजरिया बदल गया माना।

मैथिली भाषा में बोलते हुए उन्होंने कहा कि काठमांडू केवल घूमने या पशुपतिनाथ दर्शन के लिए जाना है, काम के लिए वहाँ जाना आवश्यक नहीं।

झापा-५ से उम्मेदवारी देने वाले शाह ने कहा कि कर्मचारियों को वेतन देने से अर्थव्यवस्था कमजोर नहीं होगी, यह बात उन लोगों को जवाब थी जो संघवाद को महँगा मानते हैं।

पार्टी में प्रवेश से पहले वे रास्वपा अध्यक्ष रवि लामिछाने, कुलमान घिसिंग, जेनजी अभियन्ता सहित कई नेताओं से मिले थे। उन मुलाकातों में उन्होंने कुछ नेताओं को कहा था, ‘‘संघवाद जरूरी है, यह संविधान बेकार नहीं है।’’

भदौ २४ को जेनजी आंदोलन के दौरान की गई महत्वपूर्ण संरचनाओं में आग लगने और प्रदर्शनकारियों को घर लौटने तथा प्रधानसेनापति से वार्ता करने की बात शाह के सोशल मीडिया से सार्वजनिक हुई।

एमाले-कांग्रेस की सरकार गिरने पर शाह ने प्रतिनिधि सभा भंग करने की मांग की थी। यह बयान उस समय आया जब कई लोग राष्ट्रपति रामचन्द्र पौडेल के whereabouts को लेकर असमंजस में थे।

भदौ तेस्रोसाता के बाद एकके प्रत्यक्ष निर्वाचित कार्यकारी के बहस ने चर्चा पाई। ‘यह बहस बालेन को केंद्र में रखकर ही उठाई गयी,’ एक जेनजी अभियन्ता ने कहा।

यह बहस संसदीय व्यवस्था के प्रति अस्वीकृति थी या प्रत्यक्ष निर्वाचित राष्ट्रपति बनने की लोकप्रिय इच्छा, यह स्पष्ट नहीं है।

मेयर के समय से शाह ने अदालत के आदेश न मानने और सिंहदरबार जलाने जैसे बयान दिए थे। पार्टी के सांसदों की अभिमुखिकरण और संसदीय दल की बैठकों में उनकी अनुपस्थिति भी दर्ज है।

कई लोग मानते हैं कि व्यक्तिगत स्वभाव के कारण प्रधानमंत्री शाह बैठक में अनुपस्थित रहते हैं, पर संसद में उनकी उपस्थिति एक आम बैठक या अन्य चर्चा से भिन्न होती है।

वे संसदीय समितियों में जाने से भी बचते हैं, जिससे मिनी संसद की बैठकें स्थगित हो रही हैं।

संसदीय मामलों और संवैधानिक कानून के जानकार मानते हैं कि प्रधानमंत्री का अपनी जननिर्वाचित प्रतिनिधि सभा की बैठक का बहिष्कार करना सामान्य नहीं है। यह संसदीय परंपरा का पालन ना करना अस्वीकार्य मानसिकता को दर्शाता है।

सरकार के पास भारी बहुमत होते हुए भी उसने जननिर्वाचित निकाय को दरकिनार कर दर्जन भर कानून अध्यादेश द्वारा बदले, जो पिछले दलों द्वारा भी अपनाई गई प्रथा है और इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप माना जाता है।

कुछ विकसित लोकतंत्रों में संसद को दिए गए महत्त्व के उदाहरण देखें।

लोकतंत्र की जननी मानी जाने वाली ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भी संसद को चलाया। बमबारी, युद्ध और राष्ट्रीय संकट के समय वे सांसदों को नियमित रूप से जवाब देते थे। उन्होंने संकट में भी संसद के महत्व को कम नहीं होने दिया।

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र कहे जाने वाले भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू संसद को कितना महत्व देते थे, यह पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की पुस्तक ‘नेहरू एण्ड पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी’ में उल्लेखित है।

पुस्तक में नेहरू के संसद में लंबी और कभी-कभी उबाऊ बहसों में भी धैर्यपूर्वक बैठने की बात कही गई है। वे बीमार होने पर भी संसदीय सत्र नहीं छोड़ते थे।

सन् १९६१-१९६२ के भारत-चीन युद्ध के दौरान नेहरू ने संसद को निर्णय लिए बिना चलने दिया। अन्य कामों को टालकर वे संसद में मौजूद रहते।

ब्रिटिश पूर्व प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल और भारतीय पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू

नेपाली पूर्व प्रधानमंत्रियों केपी शर्मा ओली, शेरबहादुर देउवा, पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचण्ड’ समेत की संसदीय उपस्थिति संतोषजनक नहीं थी, पर उनकी आलोचना अब के प्रधानमंत्री शाह जितनी नहीं हुई।

नेपाली कांग्रेस संसदीय दल नेता भीष्मराज आङदेम्बे पुराना कहते हैं कि नेताओं को बेहतर प्रदर्शन करना चाहिए था, लेकिन ज्यादातर संसदीय मर्यादा का पालन नहीं करते।

वे कहते हैं, ‘जो नीति तथा कार्यक्रम को कर्मकांड समझते हैं, उसे ‘‘काम नहीं’’ मानते हैं, ऐसे सोच रखने वालों के कारण देश का उज्जवल भविष्य खतरे में है।’

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