
प्रधानमंत्री वलेन्द्र ने लिपुलेक मुद्दा उठाने की आवश्यकता जताई; नेपाल कोई बफर राज्य नहीं
सारांश
- डॉ. शंकर शर्मा का मुख्य रूप से मानना है कि नेपाल-भारत सीमा विवाद और EPIG रिपोर्ट का राजनीतिक समाधान होना आवश्यक है।
- उन्होंने कहा कि नेपाल को केवल दो बड़े पड़ोसी देशों के बीच बफर राज्य के रूप में नहीं देखना चाहिए और आर्थिक कूटनीति तथा पर्यटन विकास पर ध्यान देना चाहिए।
- डॉ. शर्मा ने भारत में राजनयिक पद खाली न छोड़ने और आर्थिक कूटनीति को बढ़ावा देने की सलाह दी।
डॉ. शंकर शर्मा, जिन्हें सरकार ने पिछले चैत (मार्च-अप्रैल) में वापस बुलाया था, हाल ही में नई दिल्ली से काठमांडू लौटे हैं। वे पहले नेपाल के संयुक्त राज्य अमेरिका के राजदूत रह चुके हैं और कूटनीति तथा आर्थिक क्षेत्र में अनुभवी हैं। इसके साथ ही वे राष्ट्रीय योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष भी रह चुके हैं।
नेपाल-भारत संबंध, सीमा विवाद, EPIG रिपोर्ट और नए राजदूत नियुक्ति के मुद्दों पर चल रही बहस के बीच डॉ. शर्मा का कहना है कि नेपाल अब खुद को दो बड़े पड़ोसी देशों के बीच सिर्फ ‘बफर राज्य’ के रूप में नहीं देखना चाहिए। सीमा विवाद और जल संसाधन समस्याओं का राजनीतिक समाधान जरूरी है। उनके साथ की गई विस्तृत बातचीत में आर्थिक कूटनीति, पर्यटन विकास और भू-राजनीतिक स्थिति पर चर्चा हुई।
जब आप भारत में थे तब जनआंदोलन हुआ। वहां इसे कैसे समझा गया?
उस समय कई लोगों के लिए यह आंदोलन अकल्पनीय था, इसलिए यह आश्चर्यजनक था। यह अचानक आया और नेपाल में कुछ ही दिनों में हल हो गया। भारतीय समुदाय भी इस परिवर्तन को देखकर हैरान था।
उस आंदोलन के दौरान कुछ साजिश सिद्धांत भी प्रचलित थे। क्या आपको सरकार की किसी तरह की संलिप्तता का एहसास हुआ?
मैं उस समय राष्ट्रीय रक्षा कॉलेज में था। कुछ नेताओं और गैर-सरकारी संगठनों के नाम लिए गए थे पर उनकी पृष्ठभूमि स्पष्ट नहीं थी। मुझे लगा कि सभी पक्ष पूरी तरह से स्थिति को नहीं समझ पाए थे।
पिछले चैत में सरकार ने छह राजदूतों को वापस बुलाया और भारत-चीन को लिपुलेक के उपयोग को लेकर कूटनीतिक नोट भेजा। आप उस समय कहां थे और कैसे पता चला?
यह मुद्दा कुछ समय से ही उठ रहा था। लगभग छह महीने पहले ही हमने नोट भेजकर स्थानीय प्रशासन को निर्देश दे दिए थे। उस समय चिंता व्यक्त की गई थी लेकिन मैं बाद में इस प्रक्रिया में शामिल हुआ। नेपाल लंबे समय से इस मामले में सक्रिय है। भारत और चीन जैसे संवेदनशील देशों में दूतावास प्रमुख का पद खाली नहीं रहना चाहिए।
लिपुलेक मुद्दा सबसे अधिक कहाँ चर्चा में आया?
2015 में भारत और चीन के प्रधानमंत्रियों के बीच बीजिंग में लिपुलेक मार्ग से तीर्थयात्रा और व्यापार पर सहमति हुई थी। इसके बाद भारत ने धारचुला मार्ग से सड़क बनाई जिसका उद्घाटन भारतीय रक्षा मंत्री ने किया। इसने नेपाल को दरकिनार कर कई समस्याएं पैदा कीं।
नेपाल और भारत के बीच जन स्तर के मजबूत संबंध हैं, जो सीमा विवाद के प्रभाव को कम कर सकते हैं। सीमा क्षेत्र में विवाद तीव्र नहीं होना चाहिए क्योंकि इससे स्थानीय लोगों को परेशानी होती है। आवेग में आने से पहले ऐसे क्षेत्र के मुद्दों का शीघ्र समाधान आवश्यक है।
2019 में भारत ने नया राजनीतिक नक्शा जारी किया था, आप उस समय भारत में राजदूत थे। भारत का व्यवहार कैसा रहा?
सीमा विवाद पहले से था। भारत ने नेपाल के विरोध पर कड़ा रुख अपनाया। बातचीत की कोशिशें हुईं लेकिन संवाद सीमित रहा और स्थायी समाधान नहीं निकला। यह मुद्दा राजनीतिक रूप से उठाना आवश्यक है।
EPIG रिपोर्ट प्रधानमंत्री को पूरी तरह समझ में क्यों नहीं आई लगती?
EPIG रिपोर्ट में दो दृष्टिकोण प्रस्तुत किए गए हैं और अब यह पुरानी हो चुकी है। यह 2018 में तैयार हुई थी और वर्तमान स्थिति के लिए अपर्याप्त हो सकती है। रिपोर्ट ने 1950 के समझौते जैसे विषयों को उठाया है, जो जनस्तर के संबंधों को प्रभावित करते हैं।
नेपाल को बफर राज्य के रूप में देखने की धारणा कैसी है?
विदेशी विशेषज्ञ नेपाल को बफर राज्य मानते रहे हैं, पर अब नेपाल को इस दृष्टिकोण से बाहर आकर आधुनिक सोच अपनानी होगी। आर्थिक कूटनीति, पर्यटन विकास और विविध क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जाना जरूरी है।
भारत और अमेरिका में राजदूत रहने का आपका डिप्लोमेटिक अनुभव कैसा रहा?
राजदूत अपनी समझ ज़ाहिर करते हैं, लेकिन नीति निर्धारण सरकार की जिम्मेदारी है। नेपाल का अमेरिका और भारत के साथ संबंध लोकप्रियता, साझेदारी और भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से अलग-अलग हैं। अमेरिका के साथ संबंध अधिक स्थायी और सक्रिय रहता है।
MCC (मिलेनियम चैलेंज कॉर्पोरेशन) के बारे में आपके विचार?
MCC परियोजना बिजली प्रसारण और सड़क निर्माण में लाभकारी है। यह ऊर्जा निर्यात में भी सहायक होगा। संसद में विभिन्न मत हैं, लेकिन कार्य चल रहे हैं।
प्रधानमंत्री वलेन्द्र शाह के नेतृत्व के बारे में आपकी राय?
मैं नेपाल की संस्थागत कमजोरियों और शासकीय समस्याओं को अच्छे से समझता हूं। अब तक काम करने का तरीका सकारात्मक दिख रहा है और इसे दीर्घकालिक बनाना जरूरी है। प्रधानमंत्री के प्रयास अच्छे संदेश दे रहे हैं।
आर्थिक कूटनीति और विदेशी निवेश के लिए क्या सुझाव देंगे?
पहले आर्थिक कूटनीति केवल सहायता पर निर्भर थी। अब निवेश आकर्षित करने के लिए प्राथमिकताएं तय करनी होंगी। उद्योग, सूचना प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और कृषि आधारित क्षेत्र में विकास पर जोर देना चाहिए।
पर्यटन विस्तार और विकास कैसे करें?
पर्यटकों को लंबे समय तक बनाए रखकर आर्थिक लाभ लेना आवश्यक है। ग्रेटर लुम्बिनी विकास जैसी पहलें धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देंगी। साथ ही पूर्व से पश्चिम तक पांच या छह हिमालयी पर्यटन क्षेत्र स्थापित करना भी उपयोगी होगा।
नेपाल को किस तरह की कूटनीतिक शैली अपनानी चाहिए?
आर्थिक कूटनीति सतर्क और जिम्मेदार होनी चाहिए। प्राथमिकता स्वयं निर्धारित करें और सहयोग को साझेदारी समझें। यह पुनः राजनीतिक शासन तक सीमित नहीं, विभिन्न क्षेत्रों का मुद्दा है।
सरकार की राजदूत नियुक्ति रणनीति कैसी होनी चाहिए?
योग्य उम्मीदवारों का प्रतिस्पर्धात्मक चयन बेहतर है, लेकिन राजनीतिक कुशलता वाले व्यक्तियों को भी उपयुक्त पद दिया जा सकता है। राजदूतों को अपनी भूमिका अच्छी तरह समझकर प्रभावी ढंग से काम करना चाहिए।
प्रधानमंत्री के भारत दौरे की तैयारी कैसी है?
प्रधानमंत्री मोदी ने आमंत्रण दिया है; दौरा तय होगा। कार्यक्रम और तैयारी में कुछ समय लगेगा।
विदेशनीति के मामले में आपकी संतुलित दृष्टि क्या है?
संतुलित नीति आवश्यक है। रिश्तों को समय और परिस्थितियों अनुसार बनाए रखना चाहिए। औपचारिक समझौतों के बिना भी संवाद चलता रहना चाहिए।
अंत में वर्तमान स्थिति और सरकार के दीर्घकालिक दृष्टिकोण पर आपके विचार?
नेपाल अब खुद को केवल बफर राज्य तक सीमित नहीं रखेगा, बल्कि आर्थिक विकास और साझेदारों पर ध्यान देगा। सरकार के पास पांच साल की स्थिरता का अवसर है। जनता में उम्मीद है और भविष्य सकारात्मक दिखता है।




तस्वीर / वीडियो: कमल प्रसाईन