
तलब वृद्धि पर सरकार का संशय, मौन ट्रेड यूनियन और दो-तिहाई सरकार की जिम्मेदारी
समाचार सारांश
- पिछले चार वर्षों से सरकारी कर्मचारियों की तलब वृद्धि पर रोक होने से उनकी क्रय क्षमता लगभग २५ प्रतिशत कम हुई है।
- निजामती सेवा अधिनियम २०४९ के अनुसार हर तीन वर्षों में वेतन पुनरावलोकन अनिवार्य है, लेकिन सरकार इसे लागू नहीं कर रही है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रेड यूनियनों से संबंधित निर्णय को कार्यान्वित न करने का आदेश दिया है, बावजूद कर्मचारियों के संगठन मौन हैं।
नेपाल के सार्वजनिक प्रशासन और राजनीतिक संबंध हमेशा उतार-चढ़ाव वाले रहे हैं। राजनीतिक नेतृत्व के बार-बार बदलने के बीच राज्य तंत्र को निरंतरता देने और नागरिकों के द्वार तक सेवा पहुंचाने का काम निजामती सेवा अर्थात् ‘स्थाई सरकार’ करती है। परंतु आज यह स्थाई सरकार गंभीर निराशा, आर्थिक संकट और पहचान संकट से जूझ रही है। पिछले चार वर्षों से सरकारी कर्मचारियों के वेतन में कोई वृद्धि नहीं हुई है।
मूल्यवृद्धि सूचकांक लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है, जिससे देश के शासन प्रशासन के सारथी रोजमर्रा के जीवन में कर्ज और दबाव में हैं।
हाल ही में राजनीतिक व कानूनी घटनाक्रम जैसे कि शक्तिशाली दो-तिहाई सरकार का गठन, ट्रेड यूनियन पर प्रतिबंध और सर्वोच्च न्यायालय के अंतरिम आदेश के बाद ट्रेड यूनियनों की मौनता ने कर्मचारी प्रशासन के भविष्य की दिशा पर प्रश्न उठाए हैं। चार वर्षों के बाद वेतन बढ़ेगा या स्थिति यथावत रहेगी? यह सवाल केवल लाखों कर्मचारियों का ही नहीं बल्कि देश के सुशासन, भ्रष्टाचार नियंत्रण और संघीयता के प्रभावी कार्यान्वयन से भी जुड़ा है।
निजामती अधिनियम और कानूनी बाध्यता का उपहास
कानूनी राज्य को देखते हुए जरूरी है कि राज्य स्वयं द्वारा बनाए गए नियमों का पालन करे या नहीं। निजामती सेवा अधिनियम २०४९ की धारा २७ (१ख) स्पष्ट रूप से कहती है– भारत सरकार के मुख्य सचिव की अध्यक्षता में वेतन पुनरावलोकन समिति गठित की जाएगी, जो हर तीन वर्षों में राजस्व वृद्धि दर, कुल पद संख्या तथा पिछले तीन वर्षों के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आधार पर वेतन भत्ता और अन्य सुविधाओं का पुनरावलोकन करेगी।
यह केवल एक नैतिक आग्रह नहीं, बल्कि कानूनी बाध्यता है। आर्थिक वर्ष २०७९/८० के बजट में तत्कालीन सरकार ने १५ प्रतिशत वेतन वृद्धि की थी, लेकिन यह व्यवस्था अब पुरानी हो चुकी है।
तीन वर्षों में होनी चाहिए पुनरावलोकन चार वर्षों में भी नहीं हो पाने से सरकार द्वारा बनाये गए कानून का उल्लंघन सिद्ध होता है। उच्च स्तर की वेतन प्रस्ताव आयोग की न्यूनतम पारिश्रमिक संबंधी रिपोर्ट भी सिंहदरबार में पड़ी हुई हैं।
बढ़ती महंगाई और खाली झोले
पिछले तीन-चार वर्षों के आर्थिक आंकड़ों के अनुसार नेपाल में औसत उपभोक्ता मूल्य मुद्रास्फीति वार्षिक लगभग ६ प्रतिशत रही है। यानी पिछले चार वर्षों में वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें २० से २४ प्रतिशत तक बढ़ी हैं, जबकि कर्मचारियों की आय स्थिर रहने से उनकी क्रय शक्ति करीब २५ प्रतिशत घट गई है।
निम्न या मध्यम स्तर के निजामती कर्मचारी (जैसे: सुब्बा या खरिदार) का मासिक वेतन आधुनिक महंगे शहरी जीवन को सहन नहीं कर पाता। वेतन महीने के पहले खत्म हो जाता है, और घर का किराया, बच्चे की शिक्षा शुल्क, गैस, खाद्य सामग्री व स्वास्थ्य खर्च निकालना मुश्किल हो जाता है।
सरकार द्वारा हाल में लागू १५-१५ दिन में आधा वेतन देने की प्रणाली नगद प्रवाह को थोडा़ नियंत्रित करती है, मगर समस्या का मुख्य कारण ‘अपर्याप्तता’ को दूर नहीं करती। राशि की संख्या से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि जो पैसा आता है, क्या वह पूरे महीने खर्च संभाल पाएगा या नहीं।
भ्रष्टाचार नियंत्रण और न्यून वेतन का दुष्चक्र
सुगठित शासन और भ्रष्टाचार मुक्त समाज आज की सरकार की मुख्य प्राथमिकताएं हैं। मगर कर्मचारियों को भूखा या आर्थिक दबाव में रखकर सुशासन की कल्पना करना व्यर्थ है। विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय अध्ययनों से पता चलता है कि सार्वजनिक सेवा में होने वाला भ्रष्टाचार केवल नैतिक पतन से नहीं बल्कि आर्थिक असुरक्षा और जीवन निर्वाह संबंधी कठिनाइयों से भी होता है।
जब राज्य कर्मचारियों को बाजार मूल्य के अनुसार उचित वेतन नहीं दे पाता, तो वे वैकल्पिक, अनैतिक या अवैध रास्तों (जैसे रिश्वतखोरी या राजस्व चोरी) की ओर आकर्षित होने का खतरा बढ़ जाता है।
इसके विपरीत यदि कर्मचारियों को पर्याप्त वेतन और सामाजिक सुरक्षा दी जाए तो उनका मनोबल बढ़ेगा और भ्रष्टाचार में संलिप्तता कम होगी। इसलिए वेतन वृद्धि को ‘अनुत्पादक खर्च’ के बजाय सुशासन स्थापित करने और भ्रष्टाचार नियंत्रण करने का पहली और प्रभावी निवेश माना जाना चाहिए।
दो-तिहाई सरकार के उद्देश्य और नेतृत्व की चुनौती
इस समय देश में प्रमुख दलों के संयुक्त सहयोग से दो-तिहाई बहुमत वाली सशक्त सरकार है। यह राजनीतिक स्थिरता कायम कर देश को आर्थिक समृद्धि की दिशा में आगे ले जाने का बड़ा अवसर है। सरकार का उद्देश्य सुशासन, वित्तीय अनुशासन और सार्वजनिक सेवा सुधार को सशक्त करना है।
लेकिन सेवा प्रदायन के मुख्य तंत्र माने जाने वाले निजामती प्रशासन में असंतोष और निराशा होने से सरकार के ये लक्ष्य पूरा होने में प्रश्न चिन्ह लग जाता है। अपमानित कर्मचारी वर्ग राजनीतिक योजनाओं और सुधारों को उत्साह से लागू नहीं कर सकता। दो-तिहाई सरकार को यदि वाकई नागरिकों को परिणाममूलक सेवा देनी है, तो आगामी बजट में कर्मचारियों की न्यायसंगत मांगें पूरी करना आवश्यक होगा।
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश और ट्रेड यूनियनों की मौनता
कुछ समय पहले सरकार ने अध्यादेश के माध्यम से निजामती सेवा अधिनियम संशोधित कर आधिकारिक ट्रेड यूनियन से जुड़ी व्यवस्थाओं को रद्द करने और कार्यालय बंद करने के कड़े फैसले लिए। इसे कर्मचारियों के संघटन संबंधी अधिकारों पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास माना गया। इसके खिलाफ नेपाल निजामती कर्मचारी संगठन द्वारा दायर याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को तत्काल इस निर्णय को लागू न करने का अंतरिम आदेश दिया।
सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान की धारा १७ (संगठन स्थापित करने की स्वतंत्रता) और धारा ३४ (ट्रेड यूनियन अधिकार) की पुष्टि की, मगर इसके बाद ट्रेड यूनियन मौन हैं। पहले जो वेतन वृद्धि के लिए सड़कों और सदनों तक आंदोलन करते थे, वे आज शांत या प्रतीक्षारत क्यों हैं?
चार साल की लंबी रोक के बाद वेतन बढ़ेगा या नहीं, यह सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति और नजरिए पर निर्भर है। आर्थिक संसाधनों के अभाव और मंदी को बहाना बनाकर कानूनी प्रावधानों की अनदेखी की संभावनाएं अब दो-तिहाई सरकार के लिए संभव नहीं हैं।
इसकी दो मुख्य वजहें हैं: पहला, राजनीतिक दबाव और भय। दो-तिहाई सरकार होने के कारण कर्मचारी नेतृत्व सरकार से सीधे टकराव से डरते हैं। दूसरा, दलगत संबद्धता। अधिकांश ट्रेड यूनियन राजनीतिक दलों के सहायक संगठन की तरह काम करते हैं, जिससे वे अपनी पार्टी के खिलाफ कड़ा आंदोलन करने में असमर्थ हैं। परिणामस्वरूप, ट्रेड यूनियन ‘देखो और सोचो’ की भूमिका निभा रही हैं, जिससे कर्मचारियों की आवाज दब गई है।
मजेदार बात यह है कि दो-तिहाई सशक्त सरकार के पास आर्थिक संकट का बहाना बनाकर कानूनी प्रावधानों और कर्मचारियों के जीवन से खिलवाड़ करने की कोई छूट नहीं है।
यदि देश में वाकई सुशासन, भ्रष्टाचार नियंत्रण और स्थाई सरकार को गतिशील बनाना है, तो आगामी बजट में ये कदम आवश्यक हैं:
मूलभूत वेतन वृद्धि
चार वर्षों से न बढ़े वेतन को महंगाई के स्तर के अनुरूप कम से कम २५ से ३० प्रतिशत तक बढ़ाना होगा।
फालतू खर्च कटौती
सरकार ने प्रशासनिक पुनर्गठन कर २२ मंत्रालयों को घटाकर १८ किया है। लगभग २५ हजार पद घटाये जा रहे हैं। गैर-उत्पादक भत्ते और राजनीतिक नियुक्तियों को समाप्त कर इस बचत राशि को कर्मचारियों की भलाई में लगाया जाना चाहिए।
परिणामोन्मुख प्रशासन
ट्रेड यूनियनों को राजनीतिक अखाड़ा बनाने के बजाय, व्यावसायिक और प्रदर्शन आधारित बनाना होगा ताकि वे बेहतर सेवा में सहयोग दें।
कर्मचारी वर्ग को मजबूत और संतुष्ट होना चाहिए, अन्यथा देश की समृद्धि का रास्ता बंद हो जाएगा। दो-तिहाई सरकार प्रचार और तकनीकी विवादों में उलझे बिना स्थाई सरकार को आर्थिक न्याय और सुरक्षा प्रदान करे। सफेद एप्रन या औपचारिक पोशाक में खाली झोले सुशासन को लंबे समय तक नहीं टिकाएंगे।
(लेखक: शाही, कर्णाली प्रदेश डोल्पा में कार्यरत निजामती कर्मचारी)