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नाचो, नेपाल, नाचो!

समाचार सारांश

  • देश के पूर्व शासक और स्वयं को मुख्य शक्ति मानने वाले राजनीतिक नेता आज न्यायिक प्रक्रिया का सामना कर अपने अस्तित्व की रक्षा में संघर्षरत हैं।
  • परिवर्तन और नई आशाओं के साथ उभरे नए नेतृत्व ने उम्मीदें जगाई हैं, लेकिन इससे उत्पन्न हो सकने वाले और जोखिमों को लेकर चिंता भी बढ़ी है।
  • बार-बार बदलते सत्ता समीकरण और अस्थिर लोकतंत्र के बीच सामान्य नागरिक अपनी दिनचर्या में व्यस्त हैं।

नाचो, नेपाल, नाचो-

अब वह पुराने मादल की ताल पर नहीं,

बल्कि हवा में फैल रही हलचल की ताल पर।

चौराहों में भाषणों के जंगली झाड़ फैले हुए हैं,

जहाँ कभी

देश का गौरव माना जाने वाला ‘सुनहरा सिंहासन’

इतिहास की धूल में दबी हुई है।

आज का काठमांडू

जुए के अंतिम दांव में जीत हासिल करने वाला उन्मत्त खिलाड़ी जैसा है-

आंखों में रहस्यमय चमक,

होंठों पर कांपती मुस्कान।

कल तक सायरन की आवाज़ में सोने वाले चेहरे

आज अपने ही बिस्तर की परछाईं देखकर डर जाते हैं।

चाय की दुकानों पर

देश की कड़वी किस्मत उबल रही है।

कहीं नाई की दूकान पर

कल की रूपरेखा बनाई जा रही है,

कहीं पहियों से जर्जर सड़कों पर

क्रांति के भटकते ज्योतिष नए ग्रहों की भविष्यवाणी कर रहे हैं।

चाय की भाप के बीच चेहरा छिपाकर खुशी मनाते हुए

कोई कहता है-

‘देश को परिवर्तन के ऐतिहासिक मोड़ पर ले आए हैं।’

दूसरा

रोकने की कोशिश करते-करते आधा बुझा हुआ धुआं छोड़कर कहता है-

‘यहाँ बकवास की बार-बार भ्रूणहत्या होती है।’

सवेरे ही दरवाजे पर अखबार बिछ जाते हैं-

नींद उड़ा देने वाले छापामार की तरह।

वही लोग जो कल धड़कते दिल से

देश के ‘मिओ’ होने की घोषणा करते थे,

आज अदालत की गलियों में अपने नाम का अर्थ खोज रहे हैं।

एक जीर्ण-शीर्ण खिड़की से फीकी रोशनी में

एक पूर्व शासक अकेले बैठे हैं।

वह अब समझ रहे हैं-

सत्ता तो बस वैशाख की धूप में

ओस की बूंदों में भीगी माला है।

रंगीन फोन सन्नाटे में हैं,

दल की सायरनें थकी हुई हैं,

और अंगरक्षकों तक

अपनी ही परछाईं से डरने लगे हैं।

सड़कें तालियाँ बजा रही हैं,

और एक सूखा हुआ पीपल गिर रहा है-

धूल के बादल उठाते हुए,

हाथों में लटके झुंडों को डराते हुए,

आकाश में एक क्षणिक खाली जगह बना रहा है।

लेकिन जड़ों को अच्छी तरह पता है-

एक बूढ़ा पेड़ गिरता है

तो जंगल की कहानी खत्म नहीं होती!

मिट्टी में सनी मिट्टी में

नए नायक मशाल लेकर दौड़ रहे हैं।

उनकी आँखों में

इस शहर को साफ करने का सपना है,

लेकिन वे भूल जाते हैं-

सपने कभी-कभी

पूरा शहर जलाकर राख भी कर देते हैं।

आज न्याय और बदला

एक ही दर्पण के सामने खड़े होकर

एक-दूसरे के चेहरे देख रहे हैं।

टेलीविजन की बहसों में

गुस्सा और आक्रोश का बाजार लग रहा है,

और लोग जाड़े में कोट बदलते जैसे

अपनी आस्था का रंग बदल रहे हैं।

आज शिकार होने वाले कल के शिकारी थे।

क्या पता, कल फिर

जंगल का नियम बदल जाए।

देश एक अनंत स्क्रॉल की तरह बह रहा है-

हथकड़ी, भाषण, षड्यंत्र और उत्सव।

आजकल लोकतंत्र

मोबाइल की स्क्रीन की तरह

बार-बार ‘स्लीप मोड’ में चला जाता है।

जिसे जीवित रखने के लिए हर पल

किसी न किसी को ‘रिफ्रेश’ करना पड़ता है।

दूर-दराज के पहाड़ों के एकांत आँगन में

एक बूढ़ा किसान

रेडियो की मधुर आवाज सुनते हुए

अंधकार में हँसिया तेज़ कर रहा है।

उसने पहचाना है कि मुकुटों का उदय और पतन देखा है,

रक्त की नदियां बहती देखी हैं,

सपनों के जंगल धधक कर राख होते देखे हैं।

इसलिए वह मुस्कुराता है-

शांत, गंभीर, और निष्पक्ष।

क्योंकि उसे पता है-

यह देश कभी सीधे रास्ते पर नहीं चलता।

यह कभी तूफान की छाती पर,

कभी आग की ज़ुबान पर,

कभी अपनी ही राख पर खड़ा होकर,

फिर उठता है,

और नाचता है।

नाचो, नेपाल, नाचो!

नाचो, नेपाल, नाचो!

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