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कुटा बीच की समुद्री लहरों में सगरमाथा की परछाई

समाचार सारांश

संपादकीय समीक्षा के बाद तैयार।

  • नेपाल से रमा अधिकारी समेत की टीम २४ से २७ अप्रैल तक इंडोनेशिया के बाली में आयोजित चार दिवसीय डिजिटल तकनीक से संबंधित प्रशिक्षण में भाग लिया।
  • कलात्मक मूर्तियों और हिंदू सांस्कृतिक आस्थाओं के कारण इंडोनेशिया के बाली और नेपाल के काठमांडू के बीच गहरा आत्मीय संबंध है।
  • बाली की अर्थव्यवस्था ८० प्रतिशत पर्यटन पर आधारित है और वहां की धार्मिक सहिष्णुता भी उदाहरणीय मानी जाती है।

मैं वह व्यक्ति हूं जो अपनी खुद की भूगोल में आनंद लेना पसंद करता है। एक छोटे परिवेश में पूरी दुनिया का सुख महसूस करने वाला और अपने परिवार के साथ समय बिताने की चाह रखने वाला, जहां देने और लेने की प्रतिस्पर्धा कभी खत्म न हो। मैं उसी सपने का शहर बनाने के लिए उत्साहित हूं।

बताना भी एक अर्थ रखता है।

इंडोनेशिया के बाली में होने वाले प्रशिक्षण में भाग लेने के लिए कार्यालय के मानव संसाधन विभाग से अचानक फोन आया। शायद ऐसी पेशकश पर खुशी में एक ही सांस में ‘जाऊंगी’ कहना चाहिए था, लेकिन मेरी स्वभाव ने अनुमति नहीं दी।

मैंने जीवन साथी को फोन किया, ‘कार्यालय से इंडोनेशिया जाने का प्रस्ताव आया है। तुम्हें और बेटी को भी साथ लेकर चलना होगा।’

‘सबकुछ ठीक रहा तो चलेंगे, क्या हुआ?’

उत्तर मिलने पर मन आशावादी हुआ।

बेटी और उनके पिता के साथ बाली की गलियों में घूमना, वहां के मंदिरों और मूर्तियों से मुलाकात करना, समुद्री लहरों के साथ बातें करना और उस चाह को गहरा करना मन हुआ। कभी मेरे हाथ लगा हुआ ‘इंडोनेशिया की महिलाएं’ नामक किताब भी याद आई।

शांति और मानवता के लिए इंडोनेशिया में हुए जेनजी आंदोलन और नेपाल में भ्रष्टाचार के खिलाफ हुई जेनजी क्रांति दोनों घटनाएं मेरे दिमाग में जुड़ गईं। देश की समस्याओं को सुधारने के अभियान में जेनजी आंदोलन का बीजारोपण इंडोनेशिया ने किया था। नेपाल में जेनजी क्रांति के दौरान कुछ अप्रिय घटनाएं तो हुईं लेकिन इतिहास के लिए इसका बड़ा महत्व है।

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कार्यालय ने २४ से २७ अप्रैल तक ‘इम्बार्किंग ऑन द डिजिटल पाथ: अंडरस्टैंडिंग द इमर्सिव एनवायरनमेंट’ विषयक चार दिवसीय प्रशिक्षण के लिए मेरा, गीता दीदी और अन्य तीन साथियों का नाम चयनित किया।

महाभारत और रामायण जैसे हिंदू आस्था से जुड़े पात्रों वाली मूर्तियों की भरमार ने काठमांडू और बाली के बीच प्रेमिल और आत्मीय संबंध का आभास कराया।

प्रौद्योगिकी सहज जीवन की आधारशिला है। नेपाल को भी सक्रियता से तकनीकी क्षेत्र में आगे बढ़ना होगा। इस प्रशिक्षण ने इस दिशा में सहायता प्रदान करने का भरोसा दिया।

परिवारिक कारणों से मुझे अपनी बेटी और पति के बिना जाना पड़ा तो मन कुछ भारी हो गया। फिर भी, बाली की सुंदरता का अनुभव सकारात्मक तरीके से लेने के लिए स्वयं को तैयार किया।

म अपने संवेदनशील होने के लिए पहचानी जाती हूं। अपनी कमजोर हृदयता स्वीकार करने में हचराती नहीं हूं। मुझे कुत्ते, सांप और चोर से डर लगता है। रात को अकेले घर में रहना डरावना होता है। हवाई यात्रा करते समय भी एन्ज़ायटी होती है यानी एरोफोबिया। इस बार मुझे आस्ट्रेलिया के पास जाना था।

मैं तो काठमांडू से पोखरा तक भी प्लेन लेने पर डरती हूं, अब तो बाहर देश जाना है, यह तो किसी परेशानी से कम नहीं! पर सोचती हूं कि समय गुजर जाएगा, संकट भी टल जाएगा।

रमा अधिकारी ‘कादम्बरी’

२२ अप्रैल की रात ९ बजे त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से एयर इंडिया की फ्लाइट में बैठी। पल-पल धड़कन इतनी तेज थी कि पास में बैठे अजनबी ने भी मेरी बेचैनी महसूस की। पीछे की सीट पर बैठी गीता दीदी की तरफ मुख्यमुखर होकर पूछा, ‘दीदी! आप तो हैं ना?’

अपने डर को पहले ही स्वीकार कर चुकी थी, इसलिए गीता दीदी ने मुझे भरोसा देने को तैयार थीं। मेरी बात पूरी होते नहीं थीं कि उन्होंने कहा, ‘चिंता मत करो, मैं हूं यहाँ, किसी को कुछ भी होने नहीं दूंगी।’

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नई दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर विमान अवतरण के बाद राहत महसूस हुई। उड़ान में मन भारी था, जमीन छूते ही हल्का महसूस हुआ।

तीन घंटे के ट्रांजिट में गुजरकर अगला विमान लिया। थाईलैंड के सुवर्णभूमि हवाई अड्डे पर मौसम खराब होने से विमान में तीव्र झटके आए और क्रू मेंबर की सूचना से यात्री डरे।

मैं गीता दीदी के पास जाकर उनसे चिपक गई। उस पल को याद कर आज भी डर लगता है।

भूमि से विमान के पहिये दूरी बनाने पर मन खुशी से भर गया। हमारे पास ट्रांजिट के लिए पर्याप्त समय था। एयरपोर्ट की भव्यता देखकर थाईलैंड की समृद्धि के चित्र नजर आए। हमारी देश की तरह यहां सार्वजनिक संस्थान बोझ नहीं बल्कि राष्ट्रीय शक्ति और सुंदर भविष्य के प्रतीक हैं।

हालांकि मुझे उड़ान का डर है, लेकिन थाई एयरवेज के जेट विमान में चढ़ते हुए लगा, ‘अगर एरोफोबिया न होता तो कितना अच्छा होता।’

चार घंटे बाद देनपसार अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे पर विमान ने गर्व से लैंड किया। अब आगे पांच दिन तक विमान का सफर नहीं था, मन खुशियों से भर गया और फिर इंडोनेशिया के सुंदर भूमि बाली में कदम रखा।

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इमिग्रेशन प्रक्रिया पूरी कर एयरपोर्ट के बाहर पहुंचा तो स्थानीय पूर्ण बहादुर दाई और उनकी टीम ने मालाएं पहनाकर स्वागत किया।

मुझे तब अमेरिकी कवि रॉबर्ट फ्रॉस्ट की कविता ‘स्टॉपिंग बाय द वुड्स ऑन ए स्नोई इवनिंग’ याद आई। कुटा बीच की समुद्री लहरों में दिखी सगरमाथा की परछाई को दिल में समेटकर हम आगे बढ़े।

नमस्ते! मैं पूर्ण यान। जब हमारे लिए माला पहनाते हुए लंबा, दुबला और नेपाली जैसा दिखने वाला दाई बोला, तो लगा जैसे हम कहीं दूर नहीं बल्कि अपने भूगोल में ही हैं। उन्होंने सबको गाड़ी में बैठने को कहा। एक बोतल पानी देते हुए प्यारी मुस्कान दी। एक साथी ने कहा, ‘लगता है पूर्ण बहादुर ने हमसे सच्चा प्यार किया।’

सभी ने हंसते हुए इसका जवाब दिया। पूर्ण दाई ने हर्षित चेहरे से हमें देखा। इंसान को बस देखकर नहीं, दिल पढ़ना होता है। ताजा मिले इस व्यक्ति को अपनत्व के साथ हमने पूर्ण बहादुर स्वीकार किया और वे हमारे परिवार के सदस्य बन गए। हम नेपाली कम रचनात्मक नहीं हैं और कम आत्मीय भी नहीं।

गाड़ी चली, मैंने बाली की सुंदरता को निहारना शुरू किया। मुख्य सड़क पर एक बड़ा आइगुस्ती का बजरंगबली का विशाल मूर्ति था। आइगुस्ती अंगुराह राइ ने १९४७ के पपुतान मार्गराना युद्ध में डचों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी और वे राष्ट्रीय नायक हैं। उनकी काली टोपी, मूंछें और चेहरे पर वीर गोर्खाली की झलक दिख रही थी।

सड़क व ट्रैफिक दोनों संक्रमित थे। हमें ऐसा लग रहा था जैसे हम काठमांडू की गलियों में हैं। हिंदू धर्म के पात्रों वाली मूर्तियों की संख्या देखकर काठमांडू और बाली के बीच आत्मीय संबंध का एहसास हुआ।

हर घर और मंदिर के दरवाजे कलात्मक खाँचों से सज्जित थे। पूर्ण दाई से पूछने पर पता चला कि बालिनी हिंदू शिक्षा के अनुसार ये दरवाजे दिन-रात, खुशी-दुख के संतुलन को बनाए रखने में भूमिका निभाते हैं। हमारे यहां भी ऐसी मौलिक आस्था है।

छोटे मकान और टाइल की छत वाले भूकंप-प्रतिरोधी बस्तियां बाली में नजर आईं। सौंदर्य में डूबते हुए हम कुटा के रामायणा रिसॉर्ट पहुंचे। पूर्ण दाई ने ‘होम स्वीट होम’ कहा, तब लगा यहीं अपना घर है। हम होटल रामायणा के कमरे ८०७ में दाखिल हुए।

बाहर निकलने की जरूरत थी, खाना भी तो खाना था। व्हाट्सएप ग्रुप पर आई संदेश देखकर गीता दीदी ने कहा, ‘हाँ, तुम्हें कुछ खाना चाहिए बुइनी।’ गीता दीदी मुझे ‘बुइनी’ कहती हैं, मुझे यह संबोधन बहुत पसंद है। बाली की रात का सौंदर्य भी देखना जरूरी था।

रामायणा होटल से पूर्वकालीन भवनों का संग्रह देखते ४-५ मिनट में कुटा बीच पहुंचा जा सकता है। वहां पहुंचकर दुनिया बहुत ही जीवंत बनी। पहली बार समुद्र देखने वाली मैं लहर की उठान देख रही थी। लहर बालू को छूती है मगर थोड़ा आगे जाकर वह टूट जाती है। बालू कठोर है और लहरों के प्रयास से भी गल नहीं पाती।

क्षितिज पर आकाश और समुद्र एक हो गए थे, ऐसा सुंदर आलिंगन जैसे। लहर बालू से प्रेम में पागल की तरह उछल रही थी। बालू की प्यास बुझाने वाली यही लहर थी।

मैं आकाश की ओर देख रही थी। लहर प्यास बुझाने की अभिलाषा रखती और स्वाभिमानी थी, कांच के सफेद चादर से ढकी और पवित्र समर्पण से भरी। मेरी सगरमाथा की छवि वहीं लहरों में परिलक्षित हो रही थी। मानो मैं कुटा समुद्र तट पर नहीं बल्कि घर के पास गुराँसे टाँकुरे पर बैठकर सगरमाथा की सुंदरता को देख रही हूं।

रात ने आकाश को आलिंगन दिया था। हम डिनर के लिए तैयार थे। अगले दिन सुबह ८ बजे नाश्ता और प्रशिक्षण भी था। थका हुआ शरीर आराम मांग रहा था। मैंने फिर से रॉबर्ट फ्रॉस्ट की कविता याद करते हुए कुटा बीच के लहरों में सगरमाथा की परछाई को मन में बसी कर वहां से विदा ली।

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स्कूल की तरह आज्ञाकारी होकर अगले दिन सुबह ८ बजे प्रशिक्षण कक्ष पहुंची। भारत से आए जेटी जयराज कृष्णन ने डिजिटल दुनिया की बारीकियां सिखानी शुरू कीं। मैंने “मेरे देश के नागरिक सरल और खुली सेवा पाएं” की सकारात्मक भावना लिए प्रशिक्षण में हिस्सा लिया।

हमारे प्रशिक्षण का टाइमटेबल पहले से निर्धारित था। प्रशिक्षण खत्म होने पर पूरा समय पूर्ण दाई हमारा परिचर्यक बने और घुमाने को तत्पर थे।

बाली की अर्थव्यवस्था ८० प्रतिशत पर्यटन पर निर्भर है। हर साल लगभग ७ करोड़ पर्यटक बाली आते हैं। हमारी तरह पर्यटन विविधीकरण नहीं होने वाले देशों की तुलना में यह आंकड़ा बहुत अधिक है।

इंडोनेशिया दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम बहुल देश है, लगभग ८७ प्रतिशत आबादी मुस्लिम है। लेकिन बाली में ८६ प्रतिशत हिंदू धार्मिक समुदाय निवास करता है। वहां की धार्मिक सहिष्णुता अत्यंत सराहनीय है।

हम नेपाली भी बहुधार्मिक, बहुजातीय और बहुसांस्कृतिक विविधता में खड़े होकर एक-दूसरे का सम्मान करते हैं, जो बहुमूल्य है।

बाली की संस्कृतियां भले अलग हों, लेकिन विदेशी वहां अपने वातावरण जैसा महसूस करते हैं। यह एक अद्भुत विरोधाभास है।

वारिपट्टिक गुफा और तनाह लट मंदिर के पास जाने से पहले समुद्री लहरों ने जैसे टोक कर बताया। सुंदरता को देखकर मन आनंदित हुआ। गुफा, मंदिर और समुद्र का अनुपम दृश्य मन को छू गया।

इंडोनेशियाई नर्तक-नर्तकों का क्रूज डिनर में सांस्कृतिक प्रदर्शन आग के समान पवन की तरह शरीर जला कर भी मेहमानों को प्रसन्न करने वाला दुर्लभ अनुभव था।

समुद्र में उड़ते पक्षी और जेनजी क्रांति की समुद्री लहरें नौका को पार कर कलात्मक क्षेत्रों को उजागर करतीं और फल-जंगलों में आनंदित करतीं।

उल्लुवाटु मंदिर में पशुपतिनाथ के बंदरों से भी बदमाश बंदर पर्यटकों को परेशान करते हैं। वे बैग, चश्मा, झोला आदि छीन लेते हैं। हमारे एक साथी का चश्मा भी गिराकर फेंक दिया।

मंदिर की दीवार पर पश्चिमी भाषा में एक पोस्टर लगा था, जिसमें लिखा था ‘माहवारी वाली महिलाओं का प्रवेश वर्जित’।

इंडोनेशिया में भी महिलाओं के अधिकारों पर कुछ हद तक प्रतिबंधात्मक राजनीति का असर है।

रामायणा होटल से दिखने वाले घोड़चड़ी बाजागाजे वाले परंपरागत झांकी ने भक्तपुर के गाईजात्रा पर्व की याद दिलाई।

बाली की एक अनोखी बात यह है कि मंदिरों में बाहरी लोगों को दर्शन नहीं कराया जाता, केवल बाहर से देखने की अनुमति होती है। पूजा मुख्यत: अभिवादन सभा सदस्यों द्वारा की जाती है और भगवान को चुपचाप स्वीकारा जाता है।

इंसानों की तरह नाराज हो जाता भगवान नहीं। भगवान के नाम पर बच्चों का नाम रखना शुभ नहीं समझा जाता, जैसे दुर्गा के नाम पर बच्चा चिड़चिड़ा हो जाए। शादी भी आसान नहीं होती।

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हमारे कुम्ला-कुटुरा पूर्ण दाई की टीम ने हमें बस से उतारकर एयरपोर्ट के प्रवेश द्वार तक पहुंचाया और शुभकामनाएं देते हुए विदा किया। हमने भी ‘तरिमा कासिह’ पूर्ण दाई की भाषा में धन्यवाद कहा। मायके जाने वाले की तरह दोनों तरफ से प्यार महसूस हुआ।

बाली में बिताया गया समय और घूमना-फिरना अत्यंत मूल्यवान और अविस्मरणीय रहा। अकेलापन और वीरानी ने कभी सताया नहीं।

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