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इतनी आसानी से खो जाती है प्रतिष्ठा वाला देश!

हम धैर्यपूर्वक बात नहीं कर पाते। जांच पूरी होने तक इंतजार नहीं कर पाते। अदालत का फैसला आना चाहिए, इस बात की कोई चिंता नहीं होती। हम तुरंत निष्कर्ष निकालना चाहते हैं। नेपाल में किसी पर आरोप लगते ही कानून के फैसले से पहले ही समाज और सोशल मीडिया में जल्दीबाजी में निर्णय लेने का रुझान बढ़ता जा रहा है। दोष सिद्ध न होने तक हर व्यक्ति को निर्दोष माना जाना चाहिए, परंतु यह सिद्धांत कमजोर पड़ने से आरोपित की सामाजिक प्रतिष्ठा और आत्मसम्मान को अपरिहार्य चोट लगती है। हर दिन समाज में किसी न किसी चर्चित व्यक्ति, कर्मचारी, राजनीतिज्ञ, व्यवसायी या सार्वजनिक हस्ती पर आरोप लगने की खबरें सामने आती हैं। कुछ घंटों पहले तक सम्मानित व्यक्ति अचानक आलोचना के केंद्र में पहुंच जाते हैं। उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर फैल जाती हैं, नाम बदनाम हो जाता है, और वर्षों की मेहनत से अर्जित प्रतिष्ठा एक बार में धूमिल हो जाती है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी पर सवाल उठना, जांच होना और ज़रूरत पड़ने पर कानूनी कार्रवाई होना स्वाभाविक और आवश्यक प्रक्रिया है। कानून से ऊपर कोई नहीं होना चाहिए। सार्वजनिक जिम्मेदारी में लगे व्यक्तियों को तो अधिक उत्तरदायी होना चाहिए। भ्रष्टाचार, अधिकार के दुरुपयोग या अन्य गैरकानूनी गतिविधियों पर राज्य को कड़ी कार्रवाई करनी ही चाहिए। यह न्याय की मूलभूत आवश्यकता है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब जांच पूरी भी न हुई हो, समाज फैसला सुना देता है। किसी व्यक्ति पर आरोप आने के साथ ही सोशल मीडिया पर हजारों प्रतिक्रियाएं आती हैं। तथ्य से अधिक अनुमान छा जाता है। प्रमाण से ज्यादा भावना हावी हो जाती है। कानून दोषी या निर्दोष तय करेगा, लेकिन जनता पहले ही फैसला सुना चुकी होती है।

दुर्भाग्यवश, हम ऐसी प्रवृत्ति देख रहे हैं। नेपाल में न्यायिक प्रक्रिया आम तौर पर लंबी होती है। जांच, अभियोजन और अंतिम फैसला आने में कई साल लग जाते हैं। इस बीच आरोपित का जीवन पूरी तरह बदल चुका होता है। कोई पद खो देता है, कोई नौकरी खो देता है, कोई व्यवसाय खो देता है। परिवार को सामाजिक दबाव सहना पड़ता है। बच्चों को स्कूल में सवालों का सामना करना पड़ता है, रिश्तेदार दूरी बनाते हैं, दोस्त चुप्पी साध लेते हैं। सबसे बड़ा नुकसान व्यक्ति के आत्मसम्मान का होता है। कल्पना करें, कोई व्यक्ति दशकों तक ईमानदारी से जीवन बिताता है, अपने क्षेत्र में सम्मान प्राप्त करता है, समाज में योगदान देता है, परिवार और सहकर्मियों के बीच विश्वसनीय होता है। फिर एक दिन उस पर आरोप लग जाता है।

समाज के स्तर को केवल सड़कों, भवनों, पुलों या आर्थिक विकास से नहीं मापा जाता। यह कितना न्यायपूर्ण, संवेदनशील, धैर्यशील और मानवीय है, यह उसकी असली ऊँचाई निर्धारित करता है। उन आरोपों का सत्य होना या न होना किसी को पता नहीं होता। जांच शुरू होती है। खबरें आती हैं। और समाज का दृष्टिकोण अचानक बदल जाता है। जिन्दा जीवन में जिन लोगों का सम्मान किया जाता था, वे शक करने लगते हैं। अदालत द्वारा वर्षों बाद निर्दोष साबित किए जाने के बाद भी क्या सब कुछ पहले जैसा हो जाता है? क्या खोई हुई प्रतिष्ठा पूरी लौटाई जा सकती है? क्या समाज अपना निर्णय सुधारता है? वास्तविकता में कई मामलों में जवाब ‘नहीं’ होता है। आरोप पहले पृष्ठ पर छपता है, लेकिन निर्दोष होने की जानकारी कहीं किनारे रह जाती है। आरोप वायरल हो जाते हैं, सफाई घुट जाती है। लोग आरोप याद रखते हैं, लेकिन सत्य भूल जाते हैं। इसी कारण से निर्दोष व्यक्ति कानूनी रूप से जीतने के बाद भी सामाजिक रूप से हार चुका होता है।

इज्जत और प्रतिष्ठा कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे खो देने पर बाजार से खरीद लाया जाए। यह वर्षों की मेहनत, त्याग, संघर्ष और ईमानदारी से निर्मित अमूल्य संपत्ति होती है। घर गिरने के बाद उसे फिर से बनाया जा सकता है, आर्थिक हानि भी पूरी की जा सकती है। लेकिन एक बार टूटे हुए विश्वास और कलंकित नाम को पुनः स्थापित करना बहुत कठिन होता है। हम हमेशा यह सुनते हैं: ‘विश्वास बनाने में साल लगते हैं, तोड़ने में एक पल।’ आज के डिजिटल युग ने इस सत्य को और कठोर बना दिया है। पहले अफवाह सीमित समूहों तक सीमित होती थी, अब कुछ सेकेंड में लाखों लोगों तक पहुंच जाती है। अपुष्ट जानकारी, संपादित वीडियो, भ्रामक शीर्षक या सोशल मीडिया पोस्ट किसी की पूरी जिंदगी बदल सकता है।

समस्या केवल जानकारी तेजी से फैलना नहीं है। समस्या है लोगों का सत्य की प्रतीक्षा छोडना। हम धैर्य खो रहे हैं। जांच पूरी होने तक इंतजार नहीं करना चाहते। अदालत के फैसले से कोई लगाव नहीं है। हम तुरंत निष्कर्ष निकालना चाहते हैं, किसी को नायक बनाने या खलनायक सिद्ध करने में जल्दी करते हैं। लेकिन न्याय जल्दबाजी नहीं करता। न्याय तथ्यों, प्रमाणों और निष्पक्ष प्रक्रिया पर आधारित होता है, न कि भावनाओं या भीड़ के नारे पर। इतिहास ने हमें यही सिखाया है। दुनिया भर में ऐसे कई उदाहरण हैं जहां समाज ने दोषी ठहराए लोगों को बाद में निर्दोष साबित किया गया है, और जहां प्रारंभ में निर्दोष दिखाई देने वालों को बाद में दोषी पाया गया। इसलिए न्याय प्रणाली जरूरी है।

भीड़ की धारणा अंतिम सच्चाई हो तो अदालत, कानून और संविधान का क्या महत्व रह जाता है? इस संदर्भ में मीडिया की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। पत्रकारिता का उद्देश्य सूचना देना होता है, फैसला सुनाना नहीं। सूचना तथ्य पर आधारित होनी चाहिए, पक्षपात पर नहीं। किसी पर आरोप लगे तो उसे बस आरोप के रूप में रखना चाहिए, दोष सिद्ध होने पर नहीं। जिम्मेदार पत्रकारिता समाज को जागरूक बनाती है, उत्तेजित नहीं करती। सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं की भी उतनी ही जिम्मेदारी है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की बड़ी उपलब्धि है। पर स्वतंत्रता और जिम्मेदारी एक-दूसरे के पूरक हैं। किसी का चरित्र नष्ट करने का अधिकार अभिव्यक्ति स्वतंत्रता नहीं है, अपुष्ट जानकारी फैलाने की स्वतंत्रता भी नहीं।

किसी व्यक्ति के पूरे जीवन को एक आरोप की वजह से परिभाषित करना न्याय नहीं है। हमें खुद से प्रश्न करना चाहिए – अगर वह आरोपित व्यक्ति हम खुद हों? या हमारे परिवार का सदस्य हो? और यदि जांच के बाद वह निर्दोष साबित होता है तो हम समाज से कैसे व्यवहार की उम्मीद करते? शायद उस स्थिति में हम और अधिक संवेदनशील होते। मानव सभ्यता की सच्ची परीक्षा तब होती है जब हम शक्तिशाली के साथ नहीं, बल्कि कमजोर और आरोपित के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। क्योंकि न्याय का सार केवल दोषी को दंड देने में नहीं, बल्कि निर्दोष को अन्याय से बचाने में भी है।

फिर भी निराश होने की जरूरत नहीं है। पिछले वर्षों में नेपाली समाज में जवाबदेही, पारदर्शिता और सुशासन के प्रति जागरूकता बढ़ी है। नागरिक सजग हुए हैं। सार्वजनिक संस्थानों में निगरानी बढ़ी है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने का माहौल बन रहा है। यह सकारात्मक परिवर्तन है। परन्तु इसी जागरूकता के साथ संयम भी आवश्यक है।

हमें सवाल पूछने चाहिए, लेकिन निर्णय जल्दबाजी में नहीं लेना चाहिए। जवाबदेही मांगनी चाहिए, पूर्वाग्रह नहीं पालना चाहिए। सत्य की खोज करनी चाहिए, पर मानवता के मूल्य नहीं भूलना चाहिए। आखिरकार सत्य की यात्रा कभी-कभी देर से होती है, पर सत्य का मूल्य कभी कम नहीं होता। झूठे आरोप कुछ समय ध्यान आकर्षित कर सकते हैं, लेकिन सत्य अंततः अपना मार्ग बनाता है। सभ्य समाज यही विश्वास रखता है।

समाज के स्तर को केवल सड़क, भवन या आर्थिक विकास से नहीं मापा जाता बल्कि यह कि वह कितना न्यायपूर्ण, संवेदनशील, धैर्यशील और मानवीय है, इसे उसकी वास्तविक ऊँचाई निर्धारित करती है। हमें न केवल अपने अधिकारों का बल्कि दूसरों के सम्मान का भी संरक्षण सीखना होगा। क्योंकि सम्मान पाने में दशकों लग सकते हैं, पर खोने में एक पल भी काफी है। अतः आज की आवश्यकता है आरोप से ऊपर सत्य को रखना, आवेग से ऊपर विवेक को रखना और घृणा से ऊपर मानवता को रखना। यदि हम ऐसी जागरूकता विकसित कर सकेंगे तो ही न्यायपूर्ण, सभ्य और सहिष्णु समाज का निर्माण संभव होगा। अंततः किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके भवन, कानून या संस्थान में नहीं, बल्कि नागरिकों की चेतना, धैर्य, नैतिकता और एक-दूसरे के प्रति सम्मान में निहित होती है। जब समाज सत्य की प्रतीक्षा करना सीखता है, तभी न्याय अपनी वास्तविक परिणति पाता है।

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