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विश्वकप देखने दौरान बोस्टन के प्यारापिट में जागा नेपाली फुटबॉल का सपना

समाचार सारांश

संपादकीय समीक्षा की गई।

  • अमेरिका के बोस्टन स्टेडियम में नॉर्वे और इराक के बीच फुटबॉल मैच देखने के बाद एक नेपाली चिकित्सक ने नेपाल के विश्वकप पहुंचने के सपने को व्यक्त किया।

कैंसर रोग विशेषज्ञ के रूप में दिन-रात स्टेथोस्कोप और गंभीर मेडिकल रिपोर्ट्स के बीच काम करने वाले ये हाथ बचपन से एक स्थिर चीज पकड़े हुए हैं— वह है फुटबॉल। मैं केवल फुटबॉल का साधारण दर्शक नहीं, बल्कि वास्तव में ‘‘नेपाली फुटबॉल का कट्टर प्रशंसक’’ हूं।

अमेरिका में चल रहे ASCO लीडरशिप डेवलपमेंट प्रोग्राम के प्रशिक्षण के दौरान जब मैं अमेरिका पहुंचा, तो वहां छिपा फुटबॉल के प्रति पुराना जुनून अचानक जाग उठा। और अवसर भी मिला– विश्वकप 2026 को जीवंत रंगशाला में बैठकर देखने का!

बोस्टन स्टेडियम के विशाल, अत्याधुनिक और उत्साही माहौल में मैं नॉर्वे और इराक के बीच मैच देखने गया था। मैदान में विश्व प्रसिद्ध स्ट्राइकर एर्लिंग हालैंड का जादू छाया हुआ था, जिन्होंने दो गोल किए और नॉर्वे को शानदार 4-1 की जीत दिलाई। दूसरी ओर, इराक के आयमेन हुसेन ने गोल वापस किया, जिसके बाद रंगशाला में अचानक उछाल और हुटिंग की गूंज उठी, उस ऊर्जा को बयान करना कठिन था।

लेकिन मैच के बीच मेरी नजर खेल के स्टार हालैंड और आकर्षक गोल की बजाय प्यारापिट की ओर टिकी हुई थी। मैं नॉर्वे-इराक का मैच देख रहा था, पर वहां मौजूद प्रशंसकों में अपना देश खोज रहा था।

विदेशी रंगशाला में नेपाली दिल की धड़कन

एक तरफ नॉर्वे के नीला-लाल जर्सी वाले समर्थक थे, वहीं दूसरी ओर लगभग 40 वर्ष बाद विश्वकप में लौटे इराक के जोशीले प्रशंसक! उनकी हुटिंग, चेहरे पर अंकित राष्ट्रीय प्रतीक और हर गोल पर मनाया जाने वाला उत्सव मेरे नेपाली दिल में गहरी छाप छोड़ गया। एक राष्ट्रभक्ति से भरे नेपाली की भावनाओं की लहर उठी।

वाह! विश्वकप की इस विशाल रंगशाला में हमारे चन्द्र-सूर्य चिन्हित लाल झंडे को लहराते देखना कितना गर्व का होगा! हमारे नेपाली भाई-बहन मादल बजाते हुए, दुनिया के सबसे बड़े मंच पर ‘‘नेपाल… नेपाल…’’ के नारे लगाते हुए अगर आ पाते, तो! केवल कल्पना ही सोचते ही मन भावुक हो जाता है।

स्टेडियम में हजारों की भीड़ थी, चारों ओर उत्सव चल रहा था, मगर मैं बहुत अकेलापन महसूस कर रहा था— मैं अपने देश नेपाल और हमारे प्रशंसकों को गहराई से मिस कर रहा था। दुनिया के किसी भी हिस्से में पहुंच जाऊं, चिकित्सा क्षेत्र में जो जीत हासिल करूं, अपनी मिट्टी की खुशबू और देश की जर्सी पहने रंगशाला में चिल्लाने जैसा गर्व और संतोष कहीं और नहीं मिलता।

टीकापुर की वह मिट्टी, सपने और गुरुओं का सम्मान

जब हालैंड गेंद दौड़ा रहे थे, मेरे दिमाग में सुदूरपश्चिम का मेरा प्यारा टीकापुर झलक रहा था। स्कूल के वो दिन, जहां न तो आधुनिक जूते थे, न चिकनी मैदान थे, न फ्लडलाइट। टीकापुर का वह मैदान, जहां मिट्टी-धूल की परवाह किए बिना हम कपड़े खराब करके फुटबॉल खेलते थे।

उस वक्त साथ दौड़ने वाले दोस्तों ने भविष्य में फुटबॉल खिलाड़ी बनने की कसमें खाईं, वे सपने आज भी कानों में गूंजते हैं। भूखे, फटे जूते और चोटों के बावजूद जो विशाल और साफ-सुथरे सपने हमने देखे, वे आज भी मेरे मन में ताजा और पवित्र हैं। मैं उन सभी दोस्तों को इस विदेशी भूमि से याद कर रहा हूं।

इसी संदर्भ में मैं देश के उन तमाम प्रशिक्षकों को सम्मान देना चाहता हूं, जिनोंने जमीनी स्तर से नेपाली फुटबॉल प्रतिभाओं को जन्म देने का काम किया है। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी, सुख-सुविधाओं और व्यक्तिगत स्वार्थ को त्यागकर सीमित संसाधनों और आर्थिक तंगी के बावजूद फुटबॉल खिलाड़ी तैयार करने में समर्पित रहे। ऐसे गुरुओं को मैं दिल से नमन करता हूं। उनके त्याग से ही आज बुनियादी सुविधाओं की कमी के बावजूद नेपाल में फुटबॉल की रोशनी जल रही है।

एक सपने की यात्रा: विश्वकप तक पहुंचने का लक्ष्य

हम नेपाली लोगों में फुटबॉल के प्रति जुनून और खिलाड़ियों की प्रतिभा कभी कम नहीं है, जो किसी फुटबॉल शक्तिशाली देश से कम नहीं। इराक जैसे राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक उतार-चढ़ाव झेल चुके देश ने विश्वकप से भी बड़े मंच पर अपनी जगह बनाई है, तो हम शांति के दूत नेपाली क्यों नहीं कर सकते? हम निश्चित ही कर सकते हैं। अब समय आ गया है कि हम वास्तव में ‘‘महान सपने’’ देखें।

सपना केवल कल्पना नहीं, यह योजनाबद्ध यात्रा का पहला कदम है। दशरथ रंगशाला की मिट्टी में दिखा उत्साह, और गांव, शहर, दूर-दराज की गलियों में दौड़ते प्रतिभाओं को यदि उचित मार्गदर्शन मिले, तो विश्वकप की यात्रा दूर नहीं है।

लेकिन केवल भावनाओं में बहकर और तालियां बजाकर विश्वकप की यात्रा संभव नहीं। हमें कड़ाई से सच्चाई स्वीकार करनी होगी। यदि हम सचमुच विश्वकप खेलने का वह भव्य सपना पूरा करना चाहते हैं, तो सरकार और संबंधित निकाय (एन्फा, खेलकूद मंत्रालय) को केवल चर्चा नहीं, बल्कि ठोस, व्यावसायिक और दीर्घकालीन योजना बनानी जरूरी है:

बजट का सही प्रबंधन

राष्ट्रीय खेलकूद, खासकर फुटबॉल के लिए आवंटित बजट केवल औपचारिकता या सेमिनार तक सीमित नहीं होना चाहिए। जब तक खिलाड़ियों की आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक वे पूरे मन से प्रदर्शन नहीं कर पाएंगे। राज्य को खिलाड़ियों के जीवन स्तर की गारंटी देनी होगी।

अंतरराष्ट्रीय स्तर का प्रशिक्षण

हमारे खिलाड़ियों में मिट्टी की खुशबू और प्राकृतिक प्रतिभा है, कमी है केवल आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक आहार, विश्वस्तरीय प्रशिक्षण और भौतिक पूर्वाधार में निवेश की। राज्य को खर्च करने में कंजूसी नहीं करनी चाहिए और तकनीक विकास पर ध्यान देना चाहिए।

प्रदर्शन का एक्सपोजर और खेल का अनुभव

जब हमारे खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर की मजबूत टीमों के साथ पर्याप्त मैत्रीपूर्ण मैच खेलेंगे और अंतरराष्ट्रीय अनुभव हासिल करेंगे, तभी उनका आत्मविश्वास बढ़ेगा। संबंधित निकायों को अंतरराष्ट्रीय मैच एक्सपोजर और विदेशी प्रशिक्षण संतुलित ढंग से देना आवश्यक है।

सपने देखना कभी न छोड़ें!

फुटबॉल केवल 90 मिनट का खेल नहीं, बल्कि देश को एकता के सूत्र में बांधने और विश्व में पहचान दिलाने का सबसे बड़ा माध्यम है। बोस्टन में नॉर्वे की जीत हुई होगी, लेकिन मेरा देशभक्ति और फुटबॉल के प्रति दिल कहता है— जीत एक दिन जरूर नेपाल की होगी।

जब तक हमारे खिलाड़ियों के पैरों में और हमारे प्रशंसकों के दिलों में निःस्वार्थ प्रेम धड़कता रहेगा, तब तक वह सपना सदैव जीवित रहेगा। एक दिन नेपाल भी विश्वकप फुटबॉल खेलेगा!

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