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लगानीकर्ताओं में भय, गिरफ्तारी की प्रक्रिया जारी

१९ असार, काठमाडौं । लगभग डेढ़ माह पहले नेपाल उद्योग वाणिज्य महासंघ के नवनिर्वाचित अध्यक्ष अंजन श्रेष्ठ ने कहा था, ‘दुनिया के सबसे धनी एलन मस्क अगर नेपाल में काम करते तो जेल जाते।’ सरकार द्वारा विभिन्न आरोपों के तहत अनगिनत उद्योगपतियों और व्यवसायियों की गिरफ्तारी शुरू होने के बाद देश के सबसे बड़े निजी क्षेत्र संगठन महासंघ के अध्यक्ष से यह अभिव्यक्ति सामने आई है। नेपाली राष्ट्रिय स्वतन्त्र पार्टी की लगभग दो तिहाई बहुमत वाली मजबूत सरकार बनने के बाद निवेशकों में काफी उत्साह था। लेकिन यह उत्साह बहुत जल्द मिट गया। सरकार के सौ दिन पूरे होने तक भी समग्र निजी क्षेत्र भयभीत है।

सरकार के गठन के बाद नेपाल के व्यक्तिगत उद्योगपति, व्यापारी, निर्माण व्यवसायी और ठेकेदारों पर नजरअंदाज करते हुए गिरफ्तारी शुरू होने के कारण निजी क्षेत्र का मनोबल काफी कमजोर हुआ है। २०८२ चैत १३ गते प्रधानमत्री बने बालेन शाह की सरकार ने चैत १९ गते व्यवसायी दीपक भट्ट को शेयर कारोबार और हिमालयन री-इंश्योरेंस कम्पनी में अनियमितता के आरोप में गिरफ्तार किया। इसके बाद उद्योगपति शंकर अग्रवाल को भी गिरफ्तार किया गया। उनके पुत्र सुलभ अग्रवाल उस समय देश में नहीं थे, इसलिए उन्हें हिरासत में नहीं लिया जा सका और पिता को हिरासत में लेकर जेल भेजा गया। हालांकि, सरकार द्वारा अदालत में मुकदमा दायर करने के बावजूद शंकर अग्रवाल के खिलाफ कोई अपराध सिद्ध नहीं हुआ है और न ही उनके विरुद्ध कोई मुकदमा चल रहा है।

सुलभ अग्रवाल के गिरफ्तारी के बाद सरकार ने शंकर को जमानत दे दी। इसके बाद उद्योग वाणिज्य महासंघ के पूर्व अध्यक्ष शेखर गोल्छा को भी गिरफ्तार किया गया, लेकिन अदालत ने उन्हें हाजिरी जमानत पर रिहा कर दिया। उद्योगपति, व्यापारी, निर्माण व्यवसायी तथा ठेकेदारों पर निरंतर गिरफ्तारी से निजी क्षेत्र में असामाजिक माहौल विकसित हो रहा है। सरकार पहले व्यवसायी को हिरासत में लेती है और फिर सुनती है, जिससे व्यापक विरोध पैदा हुआ। निजी क्षेत्र की सभी संस्थाओं ने मिलकर इस कार्रवाई का विरोध किया।

वैशाख १० गते पूर्व अध्यक्ष गोल्छा की गिरफ्तारी के बाद ११ वैशाख को महासंघ, उद्योग परिसंघ और नेपाल चैंबर ऑफ कॉमर्स ने संयुक्त विज्ञप्ति जारी कर कहा था कि सरकार को पहचान करनी चाहिए कि पहले गिरफ्तार करना और बाद में सुनना सही नहीं है, बल्कि सुनकर कार्रवाई करनी चाहिए। बावजूद इसके व्यापारी और व्यवसायी को गिरफ्तार करने की प्रक्रिया थम नहीं रही है। २९ वैशाख को नेपाल इन्भेस्टमेन्ट मेगा बैंक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ज्योतिप्रकाश पाण्डेलाई सीआईबी ने गिरफ्तार किया। स्मार्ट टेलिकॉम द्वारा गिरवी रखे गए संपत्ति को बैंक ने नीलाम करते समय सरकारी संपत्ति बेचने के आरोप में उन्हें हिरासत में लिया गया था। बाद में अदालत ने पाण्डेलाई हाजिरी जमानत दे दी।

गोल्छा, अग्रवाल और पाण्डे की गिरफ्तारी और रिहाई से कानूनी प्रक्रिया को स्पष्टता की आवश्यकता दिखती है। सरकार के उद्योगपतियों पर निरंतर कार्रवाई से निजी क्षेत्र में डर का माहौल बन गया है। महासंघ के एक पदाधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, ‘कृपया मेरा नाम न छापें, सरकार मुझे भी गिरफ्तार कर सकती है।’ उन्होंने बताया, ‘सरकार के रवैये से पुराने निवेशकों ने नया या अतिरिक्त निवेश करने का मन खो दिया है। उद्योगपतियों को अपराधी बनाने की प्रवृत्ति से निजी क्षेत्र का आत्मविश्वास कमजोर हो गया है।’

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