‘सरकार के पास अभी भी ऐतिहासिक अवसर है, लेकिन चिंताजनक संकेत भी मौजूद हैं’
सरकार बनने के सौ दिन पूरे हो गए हैं। समर्थक अपनी उपलब्धियों की सूची पेश कर रहे हैं जबकि आलोचक असफलताओं का जिक्र कर रहे हैं। लेकिन डॉ. अनुप सुवेदी का मानना है कि सरकार का मूल्यांकन इतनी सतही दृष्टि से नहीं किया जाना चाहिए। वर्तमान सरकार को अभूतपूर्व जनसमर्थन और दुर्लभ राजनीतिक अवसर प्राप्त हुए हैं, इसलिए केवल सौ दिन में सफल या असफल बताना जल्दबाजी होगी। हालांकि, इस अवधि में सरकार ने भविष्य की दिशा के संकेत भी दे दिए हैं। भ्रष्टाचार नियंत्रण और सेवा पीढ़ी में कुछ सकारात्मक संकेत तो दिखे हैं, लेकिन विधि के शासन, संस्थागत लोकतंत्र, कमजोर नागरिकों के प्रति संवेदनशीलता और राज्य की दीर्घकालीन दृष्टि पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
निर्वाचन के बाद ऑनलाइनखबर से बातचीत में आपने कहा था कि देश दिशाहीन स्थिति से संवैधानिक लय में लौट आया है। सौ दिनों की यात्रा के बाद आपका प्रारंभिक मूल्यांकन क्या है? उस समय भदौ 23 और 24 के विद्रोह के बाद देश में गहरा संशय था। संवैधानिक संस्थाएं कमजोर हो रही थीं और डर था कि कहीं कोई लोकप्रिय तानाशाही, सैनिक शासन, निरंकुश राजतंत्र या नियंत्रित प्रजातंत्र की ओर तो नहीं बढ़ रहे हैं। ऐसे में प्रतिनिधि सभा का चुनाव हुआ और एक नई सरकार बनने की संभावना बढ़ी। इसलिए मैंने कहा था कि देश संवैधानिक लय में लौट आया है।
लेकिन केवल संविधान के रास्ते पर लौटना पर्याप्त नहीं है। वह आंदोलन भी संविधान के भीतर ही हुआ। नागरिक आक्रोश फूटने, विस्फोट या विद्रोह जैसी स्थितियां भी संविधान के अभ्यास के भीतर ही बन रही थीं। इसलिए अब मुख्य सवाल यह है कि उस आंदोलन ने जिन विकराल समस्याओं को उजागर किया, उसे संबोधित करने में हम कितना आगे बढ़ पाए हैं? एक वाक्य में कहें तो हम अभी पूरी तरह सही रास्ते पर नहीं खड़े हैं। एक पहिया लय में है, दूसरा कहीं-कहीं बाहर सा महसूस होता है।
सरकार के प्रारंभिक कार्यों को देखकर क्या आपको दलतंत्र के अंत की ओर बढ़ना नजर आता है या एक दल के स्थान पर दूसरे दल का वर्चस्व स्थापित करने का प्रयास? थोड़ा सौम्य भाषा में कहें तो यहाँ गृहकार्य की कमी दिखती है। किसी संरचना को सिर्फ तोड़ देना पर्याप्त नहीं, उसके स्थान पर क्या बनाएंगे इसका स्पष्ट योजना होना आवश्यक है। केवल तोड़ने से नया सिस्टम नहीं बन सकता।
सरकार के तीन सकारात्मक और तीन नकारात्मक काम कौन-कौन से हैं? सकारात्मकता की बात करें तो पहला, सार्वजनिक सेवा वितरण में कुछ हद तक तेजी आई है। दूसरा, अब तक खुलेआम रिश्वतखोरी या सरकार के लोग सक्रिय रूप से इसमें शामिल होने को लेकर कोई सूचना सामने नहीं आई है। तीसरा, सरकार का काम सिंहदरबार से ही संचालित हो रहा है। नकारात्मक पक्ष यह है कि राज्य को सबसे कमजोर नागरिकों के पक्ष में खड़ा होना चाहिए, लेकिन मेरा अनुभव है कि सबसे गरीब समुदायों के प्रति सरकार का व्यवहार उल्टा कठोर नजर आता है।
अंत में, क्या यह सरकार रूपांतरकारी सरकार बनने की दिशा में है या सामान्य व्यवस्थापक सरकार ही बनी रहेगी? इसका फिलहाल कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। इनके पास अवसर है, लेकिन कई सुधार अभी और करने बाकी हैं।