गैलियम धातु के 150 वर्ष पुराने रहस्य का समाधान
२५ असार, काठमाडौं । वैज्ञानिकों ने गैलियम धातु के 150 वर्ष पुराने रहस्य को सुलझा लिया है। यूनिवर्सिटी ऑफ ऑकलैंड के वैज्ञानिकों ने गैलियम के आणविक संरचना और व्यवहार से जुड़ी नई जानकारी प्राप्त की है।
इस धातु की खोज सन् १८७५ में फ्रांसीसी रसायनज्ञ पॉल एमिल लेकोक डी बोइसबाउद्रान ने की थी। यह धातु अपने मेल्टिंग पॉइंट के लिए जानी जाती है। गैलियम को सेमीकंडक्टर और कई आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक तकनीकों में महत्वपूर्ण माना जाता है।
गैलियम के परमाणु प्राकृतिक रूप से जुड़कर डाइमर के रूप में रहते हैं, जो कोवैलेंट बंध बनाते हैं। पहले वैज्ञानिक इस बात पर विश्वास करते थे कि गैलियम के पिघलने पर यह बंध टूट जाते हैं। लेकिन नए अध्ययन से पता चला है कि ये बंध पिघलने की बिंदु पर टूट तो जाते हैं, लेकिन उच्च तापमान पर दोबारा प्रकट होते हैं।
इस खोज ने गैलियम के कम तापमान पर पिघलने के नए कारण को स्पष्ट किया है। यूनिवर्सिटी ऑफ ऑकलैंड के प्रोफेसर निकोला गैस्टन ने बताया कि लिक्विड गैलियम की संरचना के बारे में पिछले 30 वर्षों की मान्यता गलत साबित हुई है।
यह अध्ययन डॉ. स्टीफ लैंबी, प्रोफेसर निकोला गैस्टन और डॉ. क्रिस्टा स्टिनबर्गेन द्वारा किया गया है। लैंबी ने दशकों पुराने अनुसंधान और विभिन्न तापमानों पर माप का पुनरावलोकन करके यह तथ्य खोजा। शोध का विवरण ‘मैटेरियल्स होराइजन’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। गैलियम के इस नए व्यवहार से नैनो टेक्नोलॉजी और लिक्विड मेटल कैटालिस्ट क्षेत्र में लाभ मिलेगा।
रूस के रसायनज्ञ डिमित्रि मेंडेलेव ने सन् १८७१ में आवर्त सारणी बनाते समय इस धातु की भविष्यवाणी की थी। गैलियम बॉक्साइट जैसे खनिजों से निकाला जाता है। आज यह सेमीकंडक्टर, दूरसंचार उपकरण, एलईडी, लेजर डायोड, सौर पैनल और थर्मामीटर में प्रयोग होता है।
वैज्ञानिक गैलियम की मदद से मंगल ग्रह पर प्राचीन जीवन के संकेत खोजने के विषय पर भी अनुसंधान कर रहे हैं।