
मिथिलांचल में आज से विधिवत् चैती छठ पर्व की शुरुआत
८ चैत्र, जलेश्वर । महोत्तरी सहित नेपाल और भारत के संपूर्ण मिथिलांचल क्षेत्र में आज से विधिवत् रूप से चैती छठ पर्व का आरंभ हो गया है।
चार दिन तक विभिन्न धार्मिक विधियों के साथ मनाया जाने वाला चैती छठ पर्व आज से तराई क्षेत्र के महोत्तरी, धनुषा, सिरहा, सप्तरी, सुनसरी, मोरंग, सर्लाही, रौतहत, बारा, पर्सा सहित पूरे मिथिलांचल में विधिपूर्वक शुरू हुआ है।
चैती छठ महोत्तरी जिले के जलेश्वर, मटिहानी, सुगा, गौशाला, पिपरा, सम्सी, बर्दिबास सहित शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों के विभिन्न पोखर, तालाब और प्रसिद्ध नदियाँ जैसे बिघी, रातो मरहा, जंगाहा, अंकुसी नदी तथा नहर किनारों पर भव्यता से मनाई जाती है।
सत्य अहिंसा के प्रति मानव की रुचि बढ़ाने और सभी जीवों के प्रति सहानुभूति जागृत करने वाला यह पर्व है, इसकी विशेषता बताई जाती है, जलेश्वर नगरपालिका-1 के बाबा जलेश्वरनाथ महादेव के पुजारी कामेश्वर पाठक ने बताया। उनके अनुसार सूर्य उपासना की यह शैली अनूठी है और यह एकमात्र पर्व है जिसमें अस्त और उदय दोनों सूर्य की पूजा की जाती है।
पारिवारिक सुख, शांति, समृद्धि, शारीरिक स्वास्थ्य, रोगों से मुक्ति तथा विभिन्न मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए श्रद्धापूर्वक मनाये जाने वाले चैती छठ पर्व के अवसर पर पोखरों, नदियों, तालाबों और जलाशयों में भक्तों की भीड़ देखने को मिलती है।
चार दिन तक मनाया जाने वाला यह चैती छठ पर्व का पहला दिन (आज) रविवार को व्रती स्नान करके स्वस्थ शरीर बनाने का कार्य करेंगे। पर्व के दूसरे दिन (कल) सोमवार को खर्णा मनाई जाएगी। इस दिन व्रती उपवास रखेंगे और रात को छठ देवता को आगमन का निमंत्रण देते हुए कुलदेव की पूजा करेंगे और बिना नमक के अरवा अरबाइन खाएंगे।
अगले दिन अर्थात मंगलवार (षष्ठी) शाम को व्रती गेहूं और चावल को ओखल, जाँतो या ढिकी में पीसकर बने विभिन्न गुड़युक्त व्यंजन जैसे ठकुवा, भुसवा, खजुरिया, पेरुकिया तथा फल, मौसमी तरकारी लेकर लोकगीत और भक्ति गीत गाते हुए निर्धारित जलाशय के छठ घाट तक पहुंचेंगे।
षष्ठी की शाम व्रती संध्याकालीन अर्घ्य देने पानी में प्रवेश करेंगे, अस्त होते सूर्य की पूजा करेंगे, दोनों हाथों में पीठार और सिंदूर लगाकर अक्षत के फूल चढ़ाएंगे और अन्य अर्घ्य सामग्री पालोपालो अर्पित करेंगे। अगले दिन बुधवार सुबह पुनः छठ घाट जाकर उदित सूर्य को अर्घ्य देकर चैती छठ पर्व का समापन करेंगे।
महाभारत के अनुसार द्रौपदी और पांडवों ने अज्ञातवास के समय सूर्य देव की आराधना की थी और उसी दौरान मिथिला के किरात राजा के क्षेत्र में निवास किया था। लोककथाओं के अनुसार तभी से छठ पर्व मनाया जाने लगा। सूर्य पुराण के अनुसार सर्वप्रथम पत्नी अनुसुइया ने छठ व्रत किया था, जिससे उन्हें अटल सौभाग्य और परिप्रेम मिला, और इसी समय से छठ व्रत की परंपरा शुरू हुई।
धार्मिक ही नहीं, सामाजिक सद्भाव की प्रतीक भी माना जाने वाला छठ पर्व हिंदू धर्मावलंबी के साथ-साथ मुस्लिम समुदाय भी मनाते हैं। इस पर्व में चढ़ाए जाने वाले सामग्री की संख्या ७० तक पहुंचाना प्रचलित है, हालांकि क्षमता न रखने वाले व्यक्ति कम चावल चढ़ाएं तो भी देवता प्रसन्न होते हैं, ऐसा माना जाता है।