
संविधानविद् अधिकारी ने सरकार में तानाशाही के खतरे की चेतावनी दी
संविधानविद् विपिन अधिकारी ने कहा है कि वर्तमान सरकार के पास दो-तिहाई से लगभग बहुमत होने के बावजूद तानाशाही का खतरा बना हुआ है। अधिकारी ने कानूनी प्रक्रियाओं का उल्लंघन और शक्ति पृथक्करण कमजोर करने वाली प्रवृत्तियों को लोकतंत्र के लिए संकट बताया है। उन्होंने संविधान संशोधन से ज्यादा इसके प्रभावी कार्यान्वयन और राजनीतिक संस्कृति में सुधार की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। २३ चैत, काठमांडू।
संविधानविद् विपिन अधिकारी ने कहा कि वर्तमान सरकार के पास दो-तिहाई के करीब बहुमत और जनता के दबाव के बावजूद कार्यशैली में तानाशाही की प्रवृत्ति बढ़ने का खतरा है। अधिकारी ने कहा कि कानूनी प्रक्रियाओं के उल्लंघन और शक्ति पृथक्करण के सिद्धांतों की कमजोरी लोकतंत्र की नींव को कमजोर कर सकती है। उन्होंने ‘जन दबाव’ के आधार पर जांच करने की प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए हानिकारक बताई।
न्यूज एजेंसी नेपाल से बातचीत में अधिकारी ने कहा कि केवल बहुमत का अंकगणितीय समर्थन ही सरकारी वैधता का आधार नहीं बन सकता। संवैधानिक मर्यादा और नियामक तंत्र के बिना शक्ति के असीम प्रयोग से वर्तमान सरकार पुराने गलतियों को दोहरा सकती है। उन्होंने प्रक्रियात्मक न्याय की अनदेखी को ‘हिटलर की शैली’ की ओर बढ़ने वाला कदम बताते हुए नेताओं से जल्दबाजी न करने का अनुरोध किया।
अधिकारी ने वर्तमान सांसदों और सरकार के प्रति आशावाद व्यक्त करते हुए कहा, ‘वे भ्रष्टाचार से धन लेकर चुनाव जीतकर नहीं आए हैं, इसीलिए उनके पास नैतिक पूंजी है।’ उन्होंने आगे कहा, ‘अगर इस पूंजी का विधिसम्मत तरीके से उपयोग किया जाए तो सरकार प्रभावशाली हो सकती है।’ लेकिन, जल्दबाजी में लिए गए फैसले दीर्घकालिक रूप से नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं, इसलिए उन्होंने निर्णय प्रक्रिया में ‘धीमा पड़ाव’ अपनाने की सलाह दी।
भी.आई. लेनिन जैसे उदाहरण देते हुए अधिकारी ने कहा कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया से सत्ता में आने के बावजूद बाद में तानाशाही बन जाने का खतरा रहता है। उन्होंने कहा, ‘लोकतंत्र में परिणाम भले ही अच्छे हों लेकिन प्रक्रिया गलत हो तो स्थिरता नहीं रहती,’ और जोड़ी, ‘कानून के शासन और संवैधानिक सीमाओं के अंदर रहना ही दीर्घकालिक समाधान है।’
अधिकारी ने भ्रष्टाचार के उच्च-प्रोफाइल मामलों में सरकार के आक्रामक होने के बावजूद जांच प्रक्रिया में कमजोरियां पाए जाने की बात कही। उन्होंने कहा, ‘हमारे सिस्टम में पहले हिरासत में लेना और बाद में सबूत ढूंढना जैसी प्रवृत्ति खतरनाक है।’ उन्होंने बिना प्रमाण गिरफ्तारी को न्यायिक सिद्धांतों के खिलाफ करार दिया। अधिकारी ने जांच के दौरान पर्याप्त सबूत जुटाने और विधिसम्मत प्रक्रिया सुनिश्चित करने पर बल दिया।
प्रत्यक्ष निर्वाचित कार्यकारी या राष्ट्रपति प्रणाली की पुरानी बहस पर अधिकारी ने इसे जोखिमपूर्ण बताया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के उदाहरण के साथ उन्होंने कहा, ‘शक्तिशाली कार्यकारी जब गलत हाथ में हो तो नियंत्रण करना मुश्किल हो जाता है।’ फ्रांसीसी मॉडल में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच अधिकारों के विभाजन के बावजूद वहां परिपक्व राजनीतिक संस्कृति की आवश्यकता होती है। नेपाल जैसे विविधताओं वाले देश में समावेशी प्रतिनिधित्व से ही शासन की वैधता मिलती है, इसलिए संसदीय प्रणाली उपयुक्त है।
अधिकारी ने कहा कि संविधान संशोधन से ज्यादा उसके क्रियान्वयन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि अभी संविधान में तत्काल कोई बदलाव आवश्यक नहीं है, लेकिन इसका प्रभावी कार्यान्वयन आवश्यक है। उन्होंने जोड़ा कि संशोधन से पहले यह देखना जरूरी है कि संविधान को व्यवहार में किस प्रकार लागू किया जा रहा है। राजनीतिक आचरण और संस्कृति में सुधार के बिना कानून को बदलना समाधान नहीं ला सकता।
अधिकारी ने सांसदों को सीधे मंत्रालयों में लगाकर काम में शामिल करने की प्रवृत्ति को संसदीय व्यवस्था की ‘गहरी अज्ञानता’ बताया। उन्होंने कहा कि संसद का मुख्य काम सरकार का निरीक्षण कर जवाबदेही सुनिश्चित करना है, न कि सीधे कार्यान्वयन में शामिल होना। इस तरह के अभ्यास से शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत कमजोर होता है।
सरकारी विज्ञापनों को केवल सरकारी मीडिया तक सीमित करने के फैसले पर अधिकारी ने चेतावनी दी कि इससे निजी मीडिया कमजोर हो सकता है। मीडिया लोकतंत्र की आधारशिला है, इसलिए विज्ञापन वितरण में पारदर्शिता ज़रूरी है, पर नियंत्रण नहीं किया जाना चाहिए। सरकार ने हाल ही में सरकारी विज्ञापन केवल सरकारी मीडिया को देने का निर्णय लिया है।