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प्रधानमन्त्रीको सम्बोधन विनै सकियो संसद्को पहिलो अधिवेशन

प्रधानमंत्री के बिना संसद का पहला अधिवेशन संपन्न

समाचार सारांश समीक्षा की जा चुकी है। प्रतिनिधि सभा २०७९ का पहला अधिवेशन ९ दिन चला, जिसमें सभापति डोलप्रसाद अर्याल और उपसभापति रुबीकुमारी ठाकुर का निर्वाचन हुआ। अधिवेशन में १६ संसदीय विषयगत समितियां गठित की गईं और आगामी वैशाख ४ को सभापति के निर्वाचन का निर्णय लिया गया। प्रधानमंत्री बालेन शाह ने अधिवेशन में कोई सम्बोधन नहीं दिया। २७ चैत, काठमांडू। प्रतिनिधि सभा २०७९ का पहला अधिवेशन मात्र ९ दिन चला। ९ दिनों में ६ बैठकें हुईं। १९ चैत को शुरू होकर २७ चैत को समाप्त हुए इस अधिवेशन ने प्रतिनिधि सभा के सभापति और उपसभापति का चयन किया। सभापति का निर्वाचन चैत २२ को हुआ था। डोलप्रसाद अर्याल निर्विरोध सभापति निर्वाचित हुए। २७ चैत को उपसभापति का निर्वाचन हुआ। उपसभापति पद के लिए राप्रपा की सरस्वती लामा और श्रम संस्कृति पार्टी की रुबीकुमारी ठाकुर उम्मीदवार थीं। राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी (रास्वपा) के समर्थन से ठाकुर उपसभापति चुनी गईं। इसके अलावा अधिवेशन ने २१ सदस्यीय कार्यव्यवस्था परामर्श समिति गठित की। इस दौरान प्रतिनिधि सभा ने सभी संसदीय समितियां भी गठित कीं। शुक्रवार को हुई बैठक में सभापति अर्याल ने संसदीय समितियों के सदस्यों के नाम प्रस्तावित किए, जिन्हें सभा ने स्वीकृत किया। संघीय संसद के तहत १६ संसदीय विषयगत समितियां हैं। राष्ट्रिय सभा में ४ संसदीय विषयगत समितियां हैं, जिन्हें पहले ही गठित किया जा चुका है। प्रतिनिधि सभा के तहत १० विषयगत समितियां व २ संयुक्त समितियां हैं। शुक्रवार को हुई प्रतिनिधि सभा की बैठक में सभी समितियों के गठन का प्रस्ताव रखा गया, जिसे स्वीकृत किया गया। संसदीय समिति सभापति का निर्वाचन इस अधिवेशन में नहीं हो पाया। सभापति अर्याल ने आगामी वैशाख ४ को संसदीय समितियों के सभापति के निर्वाचन की घोषणा की। साथ ही प्रतिनिधि सभा नियमावली के लिए १५ सदस्यीय मसौदा समिति बनाई गई है, जिसका नेतृत्व रास्वपा के सांसद गणेश पराजुली ने किया। मसौदा समितिद्वारा बनाई गई नियमावली प्रतिनिधि सभा द्वारा पारित होने के बाद लागू होगी। यह कार्य अगले अधिवेशन के लिए टल गया। अधिवेशन में आकस्मिक समय, शून्य समय और विशेष समय भी बिताया गया, जिसमें सांसदों ने समसामयिक विषयों पर सरकार का ध्यान आकर्षित किया। कई विषयों पर सांसदों ने प्रधानमंत्री बालेन शाह से जवाब मांगा, परंतु किसी भी अवसर पर उन्होंने जवाब नहीं दिया। परंपरा टूटी अद्यतनीकरण के अनुसार, पहले के निर्वाचन बाद के पहले दिन प्रधानमंत्री रोस्ट्रम से संक्षिप्त सम्बोधन करते थे, जिसमें सरकार की प्राथमिकताओं, नीतियों और राजनीतिक संदेशों को साझा किया जाता था। लेकिन इस बार यह परंपरा जारी नहीं रही। १९ चैत को हुई पहली बैठक में शीर्ष नेताओं ने शुभकामना सम्बोधन किया, उस दिन सत्तारुढ़ दल के प्रतिनिधि पार्टी सभापति रवि लामिछाने ने अपनी धारणा रखी, लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में बालेन शाह का कोई संबोधन नहीं हुआ। उसी दिन संविधानविद् डॉ. विपिन अधिकारी ने संसद में प्रधानमंत्री के संबोधन न होने पर मतभेद होने की टिप्पणी की। उन्होंने कहा, ‘आज की पहली बैठक में संसदीय नेताओं को प्रधानमंत्री को संक्षिप्त सम्बोधन का अधिकार था। इस बार सत्तारुढ़ पार्टी अध्यक्ष और प्रधानमंत्री अलग हैं, इसलिए इसकी आवश्यकता महसूस हुई। कई लोगों ने ऐसा महसूस किया कि प्रधानमंत्री अनुपस्थित हैं। उम्मीद है कि सभापति के चयन के बाद प्रधानमंत्री इससे सम्बंधित अधिकार मांगेंगे।’ लेकिन अधिवेशन के पूरे दौरान प्रधानमंत्री ने कोई सम्बोधन नहीं दिया। विशेषज्ञ जगत नेपाल के अनुसार यह पहला मौका है जब निर्वाचित प्रधानमंत्री ने जनताओं के सामने या संसद में कोई बात नहीं कही। वे कहते हैं, ‘नई चुनाव के बाद निर्वाचित प्रधानमंत्री ने न तो जनतावादी संबोधन दिया और न ही संसद में बोले। यह नया है। मैंने ऐसा पहले कभी नहीं देखा।’ नेपाल के अनुसार २०१५ साल में तत्कालीन प्रधानमंत्री बीपी कोइराला ने शपथ ग्रहण के बाद रेडियो से नागरिकों को सम्बोधित किया था, जिसे अलग से प्रकाशित भी किया गया था। २०४६ के बाद भी प्रधानमंत्री का संबोधन आम होता रहा। प्रधानमंत्री के सभापति निर्वाचन में प्रस्तावक बनने की परंपरा भी टूटी। इस बार सभापति अर्याल का प्रस्तावक रास्वपा सभापति लामिछाने थे। विशेषज्ञ नेपाल कहते हैं, ‘सभापति नाम प्रस्तावित करने में प्रधानमंत्री प्रस्तावक होते थे या बधाई देते थे। इस बार वह भी नहीं हुआ।’ प्रधानमंत्री के संबोधन का महत्व सत्तारुढ़ दल रास्वपा के सभापति और प्रधानमंत्री अलग-अलग हैं। पहले आमतौर पर पार्टी प्रमुख ही संसदीय दल के नेता और प्रधानमंत्री दोनों होते थे। ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री के संबोधन को सरकार की आधिकारिक धारणा माना जाता था। क्योंकि सभापति और प्रधानमंत्री अलग हैं, इसलिए ज्यादा लोग सीधे प्रधानमंत्री के संबोधन चाहते थे। नेपाल के अनुसार संसद में प्रधानमंत्री के संबोधित करने के कई कारण हैं। पहला: प्रधानमंत्री संसद के भी नेता होते हैं। संसद कैसे चलेगा और सरकार की प्राथमिकता क्या है, यह प्रधानमंत्री को जानकारी देनी और विश्वास अर्जित करना होता है। दूसरा: सांसदों ने भी विभिन्न विषयों पर प्रधानमंत्री से जवाब मांगा है। तीसरा: नागरिक प्रधानमंत्री की बात सुनना चाहते हैं, जो इस बार पूरा नहीं हुआ। संसद सचिवालय के पूर्व महासचिव सूर्यकिरण गुरुङ का कहना है कि प्रधानमंत्री की संसदीय संबोधन केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि राजनीतिक दिशा निर्देश के लिए जरूरी होती है। यह अवसर होता है जहां सरकार की प्राथमिकता और रणनीति स्पष्ट होती है। इसमें जनउत्तरदायित्व भी जुड़ा होता है क्योंकि प्रधानमंत्री संसद में जनता के प्रति जवाबदेही दिखाते हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी प्रधानमंत्री के संबोधन की प्रतीक्षा करता है। वह बताते हैं, ‘अब नेपाल की विदेश नीति क्या होगी? नेपाल किस आर्थिक नीति पर चलेगा? विश्व समुदाय नेपाल सरकार के दृष्टिकोण का इंतजार कर रहा है।’ लगभग दो तिहाई समर्थन वाली सरकार से उच्च अपेक्षाएं स्वाभाविक होती हैं। ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री से यह अपेक्षा रहती है कि वे देश को कौन से रास्ते पर ले जाना चाहते हैं, आर्थिक-सामाजिक रूपांतरण की योजना क्या है और विदेश संबंधों में नेपाल की स्थिति क्या होगी। पूर्व महासचिव गुरुङ के अनुसार संबोधन में ये सवाल उठते हैं, ‘प्रधानमंत्री का समग्र विजन क्या है? राष्ट्र को कैसे आगे बढ़ाना चाहते हैं? दो तिहाई बहुमत वाली सरकार देश को कैसे चला रही है? जनता को क्या राहत दे रही है?’ लेकिन इस बार ये सवाल और आशंकाएं यथावत रह गईं।

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