
आन्दोलन का नया मोर्चा: डिजिटल युग में नेपाली युवाओं की स्वतंत्र आवाज़
समाचार सारांश संपादकीय समीक्षा के बाद तैयार किया गया है। चार्ली टेलर ने कहा है– नेपाली युवा विश्व के नेता हैं और नेपाल में जेनजी आन्दोलन के बाद संवैधानिक प्रक्रिया से नई सरकार सत्ता में आई है। जेनजी आन्दोलन रेडिट और डिस्कॉर्ड जैसे सामाजिक नेटवर्क से बुलाया गया था और युवाओं ने डिजिटल स्पेस को आन्दोलन का मुख्य हथियार बनाया था। जेनजी आन्दोलन के बाद बनी सरकार ने संविधान के दायरे में ही चुनाव करवाया और डिजिटल प्रचार ने चुनावी मुकाबले में बड़ी भूमिका निभाई।
29 चैत्र, काठमांडू। कुछ दिन पहले चार्ली टेलर ने हमसे बातचीत में कहा– नेपाली युवा विश्व के नेता हैं। नेपाल में पिछले भदौ में हुए जेनजी आन्दोलन को करीब से देखने का अवसर चार्ली को मिला। उन्होंने हाल के कुछ वर्षों में बांग्लादेश, केन्या, मोरक्को, माडागास्कर, फ्रांस जैसे देशों में हुए युवा आन्दोलन अध्ययन किए हैं। आन्दोलन के विभिन्न प्रकार और तरीकों को उन्होंने समझा है। चार्ली के अनुभव से पता चलता है– नेपाल एक ऐसा देश है जहां आन्दोलन के बाद संवैधानिक प्रक्रिया से चुनाव हुए और युवाओं की भावनाओं के अनुसार नई सरकार सत्ता में आई। इसलिए नेपाल दुनिया भर के लोगों के लिए, विशेषकर उन देशों के लिए जहाँ ऐसे आन्दोलन हो रहे हैं, एक उदाहरण और उत्सुकता का केंद्र बन गया है। “नेपाल के युवा आज विश्व के नेता हैं। दुनिया नेपाल को देख रही है,” उन्होंने कहा।
चार्ली और कई देशी-विदेशी शोधकर्ताओं के चर्चा में यह युवा आन्दोलन शुरूआत में अनोखा था। संभवतः पहली बार किसी आन्दोलन को ‘रेडिट’ के माध्यम से बुलावा दिया गया था। तत्कालीन सरकार ने सोशल मीडिया नियंत्रण के नाम पर प्रतिबंध लगाया, जो ‘ट्रिगर पॉइंट’ बना और युवा वर्ग ने डिजिटल स्पेस को अपना अधिकारिक हथियार बना लिया। प्रतिबंधित रेडिट के जरिए युवाओं ने ‘नेतातंत्र’ के विरुद्ध आन्दोलन की शुरुआत की। रेडिट की ‘नेपाल सोशल’, ‘नेपाल’ जैसी कम्युनिटी में जुड़े युवाओं ने 8 सितंबर को भ्रष्टाचार के खिलाफ देशव्यापी प्रदर्शन करने की घोषणा की और आन्दोलन को बढ़ावा दिया। ‘दी फाइनल रिवोल्यूशन–वी आर पंचिंग अप’ नारा लेकर जेनजी ने आन्दोलन का आह्वान किया। माइतीघर मंडला और संसद भवन के सामने आन्दोलन शुरू करने की घोषणा करने वाले युवाओं ने अन्य युवाओं को सडक पर लाने के लिए सोशल मीडिया का भरपूर उपयोग किया।
आन्दोलन का नेतृत्व कौन करेगा निश्चित नहीं था, पर उद्देश्य स्पष्ट था– सत्ता की मनमानी के खिलाफ ‘जेनजी विद्रोह’। नेताओं के बच्चो के विलासीपन को सार्वजनिक करने वाला ‘नेपो बेबी ट्रेंड’ हो या सडक प्रदर्शन, जेनजी ने स्पष्ट किया था: भ्रष्टाचार, बेतहाशा, और अनियमितताओं के खिलाफ नया संघर्ष शुरू होगा। सोशल मीडिया सक्रिय होते हुए पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी की राजनीतिक चेतना का आंकलन कर रही थी। सडक पर कितने युवा उतरेंगे यह तय नहीं था, लेकिन जब बड़ी संख्या उतरी तो यह न केवल सरकार बल्कि पूरी राजनीतिक संस्कृति को चुनौती दे सकता था। और ठीक ऐसा ही हुआ।
सोशल मीडिया की मदद से चलने वाले युवाओं ने भदौ 23 को माइतीघर–बानेश्वर की गलियों में विरोध की आवाज़ें उठाईं। नेतृत्व-विहीन इस आन्दोलन को कुछ लोग ‘एल्गोरिदम मूवमेंट’ कहने लगे। सोशल मीडिया पर फ्लायरों का व्यापक प्रसार हुआ जिसने एकजुटता बढ़ाई। युवा विश्लेषक नवीन तिवारी कहते हैं, ‘भदौ 23-24 के आन्दोलन में किसी ने घर-घर जाकर नहीं बुलाया था, युवा स्वेच्छा से सडक पर आए थे। इसमें सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका थी। सभी ने जो फ्लायर पसंद आए, उन्हें शेयर किया, जिसका नतीजा बड़ी उपस्थिति और आक्रोश के रूप में सामने आया।’
नेताओं के बच्चों के विलासिता जीवनशैली की तुलना की गई, जिसमें महंगे ब्रांड के कपड़े, विदेशी यात्रा, भव्य वस्तुएं शामिल थीं, जो सामान्य नेपाली युवाओं की आर्थिक कठिनाइयों के विपरीत थे। भदौ 23 का आन्दोलन रेडिट पर शुरू हुआ, लेकिन सबसे प्रभावशाली मंच ‘डिस्कॉर्ड’ रहा। आम समाज के लिए रेडिट और डिस्कॉर्ड दोनों नए थे। रेडिट पर छद्म नाम से विचार व्यक्त किए जाते थे जबकि डिस्कॉर्ड वीडियो गेम खेलने वाले युवाओं का प्लेटफॉर्म था। इससे युवा एकजुट हुए।
फेसबुक के सक्रिय समूह ‘एमआरआर’ जैसे समूहों में इनरुवा, धरान जैसे शहरों में भी जेनजी ने आन्दोलन का ऐलान कर रखा था। न कोई राजनीतिक दल का झंडा था, न कोई विद्यार्थी संगठन का। स्वतः उभरा यह आन्दोलन ‘वेक अप यूथ, वेक अप जेनजी’ जैसे नारे लेकर आगे बढ़ा। फेसबुक, इंस्टाग्राम जैसे ‘स्टोरी’ में भी अभियान तेज हुआ। आन्दोलन से पहले स्टोरी में पोस्ट डालकर उसे रिपोस्ट करने का आग्रह था जिससे युवाओं की भागीदारी बढ़ी।
‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात जितनी भी हो, नेता हमारी आवाज दबाना चाहते हैं। अगर सोशल मीडिया बंद कर दिया तो शर्मनाक बात है। अब चुप नहीं बैठेंगे– इन्फ इज इन्फ।’ इस तरह के अभिव्यक्तियों ने आन्दोलन को नई ऊर्जा दी। यह शक्ति टिकटक जैसे मंचों पर फैले ‘नेपो बेबी’ ट्रेंड से और बढ़ी। यह ट्रेंड फिलीपींस और इंडोनेशिया से नेपाल में भी आया, जिसने नेताओं के बच्चों की विलासिता को आम लोगों की दिक्कतों के साथ तुलना की।
‘नो मोर करप्शन, वेक अप चैलेंज’ जैसे अभियानों का आयोजन हुआ। नेताओं के बच्चों की विदेशी यात्रा, विलासिता की बातें सोशल मीडिया पर फिर से उजागर हुईं। संसद भवन के भीतर सांसदों की गतिविधियों को ‘द स्टैंडअप कमेडी सर्कस’ कहा गया। पहली बार युवाओं ने डिजिटल मोर्चा कब्जा किया, जो विदेशों में अभियानों से मेल खाता था।
नेपाल के पहले फिलीपींस और इंडोनेशिया में ‘नेपो बेबी’ ट्रेंड सक्रिय था, जिसमें वायरल सोशल मीडिया पर राजनीतिक नेताओं के बच्चों की विलासिता को सार्वजनिक किया गया। यह लहर नेपाल के युवाओं में भी गुस्सा पैदा कर गई, खासतौर पर जब सरकार ने सोशल मीडिया बंद कर दिया। इसलिए डिस्कॉर्ड आन्दोलन को फिर से सक्रिय करने का माध्यम बना।
भदौ 23 को 19 युवाओं की मृत्यु की खबर के बाद सोशल मीडिया और सक्रिय हो गया। भदौ 24 के आन्दोलन में तोड़-फोड़ और आगजनी की योजना भी डिस्कॉर्ड से ही फैलने लगी। नई पीढ़ी ने पारंपरिक शैली में ब्रेक लगाया, नविन तिवारी कहते हैं। डिस्कॉर्ड के ‘युथ अगेंस्ट करप्शन’, ‘युवा हब’ बहुत सक्रिय थे और भदौ 24 के विद्रोह की योजनाएं वहीं साझा की गईं।
जेनजी आन्दोलन के बाद बने गौरीबहादुर कार्की नेतृत्व वाली जांच आयोग ने भी इसे स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है। आयोग की रिपोर्ट के अनुसार डिस्कॉर्ड ने आन्दोलन की तैयारी और संचालन में निर्णायक भूमिका निभाई। इसे चुनौतीपूर्ण सूचना और जोखिम के रूप में भी देखा गया। आन्दोलन के दौरान गलत सूचनाएं फैलीं, जिसमें होस्टल में बलात्कार और मृत्युदर की झूठी बातें थीं।
आन्दोलन के बाद तत्कालीन सरकार गिरते ही राजनीतिक संक्रमण शुरू हुआ। अंतरिम सरकार गठन के लिए भी डिस्कॉर्ड का इस्तेमाल किया गया। जंगी अड्डे पर चर्चा हो रही थी और वहीं डिस्कॉर्ड पर भविष्य के प्रधानमंत्री पर बात हो रही थी, और वहां मतदान भी हुआ। जेनजी ने इतिहास में पहली बार डिस्कॉर्ड से मतदान कर पूर्व प्रधानन्यायाधीश सुशीला कार्की को प्रधानमंत्री के लिए सुझाया, और वे देश की प्रधानमंत्री बनीं।
कार्की नेतृत्व वाली सरकार ने संविधान के अनुसार निर्धारित समय पर चुनाव सम्पन्न कराया, जो सफल भी रहा। चुनावी मुकाबला डिजिटल दुनिया में सबसे ज्यादा सक्रिय था। ‘वार–रूम’ बनाकर नवाचार के साथ प्रचार किया गया। खासतौर पर बालेन शाह और उनकी पार्टी रास्वपा सबसे आगे थे। अन्य पार्टी नेता भी डिजिटल माध्यम में सक्रिय दिखे। रास्वपा समर्थकों ने ‘घंटी डॉट वेबसाइट’ शुरू किया, जिसने चुनाव प्रचार को और रोचक बनाया।
नेपाली कांग्रेस भी कम सक्रिय नहीं था। अध्यक्ष गगन थापा पर लगे आरोप का राजनीतिक फायदा लेने ‘मटन डॉट वर्ल्ड’ नामक साइट बनाई गई। इस साइट पर थापा से जुड़ी कई जानकारियां थीं। इसी तरह अंग्रेजी में G.O.A.T (Greatest of All Time) मांगने का अभियान भी चला। ऐसे में नेता और कार्यकर्ता भौतिक स्थानों के बजाय ऑनलाइन सक्रिय थे।
चुनाव के दौरान सोशल मीडिया पर राजनीतिक गतिविधियां तेज रही। टिकटक, रील जैसे मंच राजनीतिक हथियार बने। सभी प्लेटफॉर्म पर युवा सबसे अधिक सक्रिय थे। डिजिटल स्पेस को विद्रोह और चुनाव का नया मोर्चा बनाने वाली यह युवा पीढ़ी अब चुनाव की मुख्य लड़ाई डिजिटल क्षेत्र में होगी का संकेत दे रही है।
क्लिक फार्मिंग और बोट फार्मिंग पर बहस व्यापक हो गई है। कुछ लोग कहते हैं एल्गोरिदम ने चुनाव परिणाम पर प्रभाव डाला। डिजिटल विशेषज्ञ आनंदराज खनाल कहते हैं, ‘एल्गोरिदम हमारे व्यवहार को सीखता है, लेकिन यह हमारी आदतों का प्रतिबिंब है। अब यह राजनीतिक प्रक्रिया में भी प्रभावी है। हर हाथ में स्मार्टफोन है और हम सोशल मीडिया पर बहुत समय बिताते हैं, इसलिए इसकी भूमिका कम आंकना नहीं चाहिए।’
नवीन तिवारी कहते हैं, ‘डिजिटल स्पेस में पली इस पीढ़ी ने पारंपरिक राजनीतिक ढांचे में क्रांति ला दी है। पुरानी पीढ़ी गांव-गांव संगठन बढ़ाती थी, अब फेसबुक, ट्विटर जैसे मंच से राजनीतिक शक्ति बनती है। पहले पार्टी में शामिल होने के लिए विचारों का मिलना जरूरी था, अब लाइक, कमेंट, शेयर और सोशल मीडिया प्रोफाइल महत्वपूर्ण हैं। पहले नेता स्थापित थे, आज बालेन शाह जैसे कलाकार मेयर और प्रधानमंत्री बन रहे हैं।’
जेनजी नेता तनुजा पांडे कहती हैं कि डिजिटल स्पेस प्रचार प्रसार को आसान और कम खर्चीला बनाता है, जिससे युवाओं में लोकप्रियता बढ़ी है। भौतिक रूप से नागरिकों को सार्वभौमिक नागरिक बनने में कठिनाई होती है, पर डिजिटल पहुंच सरल होने के कारण युवाओं ने सोशल मीडिया को नए प्रतिरोध का हथियार बनाया है, पांडे का तर्क है।
आन्दोलन से चुनाव तक सोशल मीडिया नया मोर्चा बन गया है। विद्रोह हो या चुनाव, सभी ने डिजिटल स्पेस को प्रमुख भूमिका दी है। ‘क्योंकि यह रियल-टाइम बहस देता है, तत्काल संचार करता है और भौगोलिक दूरी खत्म करता है,’ पांडे कहती हैं। ‘पहले योजना बना कर लागू करने में समय लगता था, अब नेटवर्किंग कम खर्च वाला और तेज है। फ्लायर बांटने की बजाय वाटरकलर से रंगने का काम आसान है और युवा आकर्षित होते हैं।’