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नीतीश कुमार के 21 वर्ष के मुख्यमंत्री काल में बिहार का रूपांतरण कैसा रहा?


पटना के फूलबारी शरीफ स्थित एक गैरसरकारी संस्था में काम करने वाली फरिदा खातून अपने परिवार में सबसे अधिक शिक्षित सदस्य हैं। उन्होंने स्नातकोत्तर स्तर तक पढ़ाई पूरी की है।

मजदूरी करने वाले फरिदा के परिवार ने 2007 में उन्हें अररिया के कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय में दाखिला दिलवाया था।

फरिदा मूल रूप से मुस्लिम बहुल जिले अररिया की रहने वाली हैं, जहां मुस्लिम जनसंख्या 40 प्रतिशत से अधिक है।

फरिदा कहती हैं, ‘हम उस क्षेत्र में रहते थे जहां लड़कियों को केवल इस्लामी शिक्षा दी जाती थी। लेकिन मैं स्कूल में दाखिल हो गई। फिर स्कूल यूनिफॉर्म, सैनिटरी पैड, साइकिल, कन्या उत्थान योजना सहित कई योजनाओं का लाभ मिला और मैंने पटना विश्वविद्यालय से पोस्टग्रेजुएशन किया।’

‘तब लगता था कि नीतीश कुमार लड़कियों के नेता हैं, लेकिन हाल के कुछ वर्षों में ऐसा लगने लगा है कि वे केवल एक राजनीतिक व्यक्तित्व हैं। वे धर्म आधारित राजनीति में भी शामिल हुए हैं।’

फरिदा की ये टिप्पणी वाकई में नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा को दर्शाती है।

हाल ही में नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने लोक भवन जाकर राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सय्यद अता हसनैन को अपना इस्तीफा सौंपा।

साल 2000 में नीतीश कुमार सात दिन के लिए मुख्यमंत्री बने थे, लेकिन स्थायी रूप से उनका कार्यकाल नवंबर 2005 से शुरू हुआ।

उन्हें ‘सुशासन बाबू’ के नाम से जाना गया। लेकिन पिछले वर्षों में उन्हें ‘पार्टी बदलने वाला व्यक्ति’ के रूप में देखा जाने लगा। उनके ऊपर कई ‘मेम’ बने और विश्लेषकों ने उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता पर सवाल उठाए।

‘नीतीश जैसा कोई और नहीं’

नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के फैसले के बाद उनके बेटे निशांत कुमार जब पटना के वीरचंद पटेल स्थित जेडीयू कार्यालय आए, तब काफी हलचल हुई।

फिर भी जेडीयू कार्यकर्ता उन्हें ‘दूसरा नीतीश’ नहीं मानते।

1977 के नीतीश के पहले चुनाव से साथ रहे अशोक कुमार कहते हैं, ‘नीतीश जैसा कोई और नहीं।’

बिहार के सरकारी कार्यालयों को टाइपराइटर से कंप्यूटर युग में लाना उनकी पहली बड़ी चुनौती थी। जिसमें भारतीय जनता पार्टी के नेता सुशील कुमार मोदी ने समर्थन दिया, जो हमेशा टैब लेकर चलते थे।

सुशील मोदी उप मुख्यमंत्री थे और अर्थ मंत्रालय की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभालते थे।

1982 बैच के सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी व्यासजी कहते हैं, ‘नीतीश और सुशील मोदी दोनों तेज़ स्वभाव के थे। मैंने लालूजी के कार्यकाल भी देखे हैं। उनकी मुख्य भिन्नता यह है – लालू नेता थे, नीतीश एक उत्कृष्ट प्रशासक।’

‘वे बैठकों में नए विचारों का स्वागत करते थे और हर विभागीय बैठक में पिछली हिदायतों को याद रखते थे। बिहार को आगे बढ़ाने की उनकी तेज इच्छा थी।’

समाजवादी नीतीश का ‘वोट इंजीनियरिंग’

सत्ता संभालने के बाद नीतीश कुमार ने राज्य की स्थिति पर ‘श्वेत पत्र’ जारी किया, जिसमें कहा गया कि ‘सभी विकास सूचकांकों में बिहार सबसे खराब स्थिति में है।’

नीतीश सरकार को कानून-व्यवस्था, सड़क, बिजली सहित बुनियादी ढांचे में सुधार के बड़े चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

कुर्मी जाति से आने वाले नीतीश कुमार को लंबे समय तक सत्ता में बने रहने के लिए वोट इंजीनियरिंग करनी पड़ी।

अपनी रणनीति के लिए उन्होंने महिलाओं और अति पिछड़े वर्गों को चुना।

वरिष्ठ पत्रकार संतोष सिंह ने अपनी पुस्तक ‘कितना राज, कितना काज’ में लिखा है, ‘नीतीश ने महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण दिया और पंचायत तथा स्थानीय निकायों में ईबीसी (अति पिछड़ा वर्ग) हिंदू और मुसलमानों को 20 प्रतिशत आरक्षण दिया।’

‘इससे उन्हें अपनी जाति के लोगों का विरोध सहना पड़ा, जो कहते थे कि वे दूसरों को फायदा पहुँचाने के लिए अपनी बलि दे रहे हैं। लेकिन नीतीश ने महिलाओं को भी पिछड़ा माना और यह स्वीकार किया।’

बाद में 2007 में महादलित आयोग का गठन किया गया।

नीतीश के लव-कुश (कुर्मी-कोइरी) समीकरण से उन्हें लगभग 20 प्रतिशत वोट मिलने की बात कही जाती है, हालांकि उनकी जनसंख्या लगभग सात प्रतिशत है।

‘खुद में मग्न’

नीतीश सरकार आने के बाद उनकी दो योजनाएं स्कूल यूनिफॉर्म और साइकिल को बदलाव की शुरुआत माना गया।

ग्रामीण इलाकों में साइकिल से स्कूल जाने वाली लड़कियों को यह बदलाव का प्रतीक माना गया।

यह दृश्य शुरुआती समाजवादी नीतीश के कल्याणकारी राज्य और कानून-व्यवस्था सुधार का संकेत था।

लेकिन बाद में सरकार पर योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के बजाय केवल प्रचार करने का आरोप लगा।

नीतीश कुमार और सुशील कुमार मोदी

सामाजिक कार्यकर्ता शाहिना परवीन कहती हैं, ‘नीतीश के शुरुआती कार्यकाल में कर्मठ कर्मचारी थे और महिलाओं के लिए अच्छा कदम उठाया गया, लेकिन बाद में स्थिरता खोई।’

‘नीतीश खुद अपने कामों में रमाने लगे। अंतिम दिनों में दिखावटी काम पर ज्यादा ध्यान दिया गया, जो प्रचार तो खूब होता है लेकिन टिकाऊ नहीं होता।’

‘पंचायत में महिलाओं को आरक्षण दिया गया लेकिन कोई महिला मंत्री या विधायक नहीं बनीं। किए गए कार्यों ने महिलाओं की पारंपरिक भूमिका को सशक्त किया जैसे सिलाई यंत्र बांटना, पापड़-बड़ी बनाने के प्रशिक्षण।’

2025 के विधानसभा चुनाव से पहले ‘जीविका दीदी’ को रोजगार शुरू करने के लिए 10,000 रुपये दिए गए, उस वक्त भी नीतीश की राजनीति में बदलाव की बात उठी।

जेडीयू के नेता कहते थे, ‘हमारे नेता पहले नीतियों से बदलाव लाते थे, अब चुनावी लालच के हथियार इस्तेमाल करते हैं।’

अपराध, भ्रष्टाचार और सांप्रदायिकता – नीतीश के ‘थ्री सी’

नीतीश ने बार-बार कहा है कि वे ‘थ्री सी’ यानी अपराध, भ्रष्टाचार और साम्प्रदायिकता से समझौता नहीं करेंगे।

2005 में बिहार पुलिस के एडिजी अभय नंद कहते हैं, ‘नीतीश जब मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने मुझे बुलाकर कहा कि हमें कानून का शासन चाहिए।’

‘आर्म्स एक्ट, स्पीडी ट्रायल समेत गवाही प्रक्रिया में काम किया गया। ‘सैप’ (एसएपी) का गठन हुआ और पुलिस आधुनिकीकरण हुआ।’

लेकिन हाल के दिनों में कई घटनाएं हुईं जो नीतिश सरकार के विरुद्ध थीं, जैसे 2015 में मोकामा विधायक अनंत सिंह के घर में एक पत्रकार को बंधक बनाना।

रणवीर सेनाका प्रमुख ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या के बाद उनके समर्थकों ने पटना में हिंसा फैलाई।

पटना के डाक बंगला चौराहे पर आगजनी और हिंसा हुई।

अधिवक्ता मणिलाल कहते हैं, ‘तब राज्य में 90 के दशक की जातीय हिंसा जैसी स्थिति आने का डर था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।’

‘लेकिन औरंगाबाद, छपरा और बिहारशरीफ में दंगे हुए। भ्रष्टाचार इतना बढ़ गया कि बिना रिश्वत कोई काम नहीं होता। नीतीश की पकड़ पहले जैसी नहीं रही।’

कई नई योजनाएं लेकिन जमीन पर कम सफलता

नीतीश ने सरकार को जवाबदेह बनाने के लिए ‘जनता दरबार में मुख्यमंत्री’ कार्यक्रम शुरू किया।

‘इन्फॉर्मेशन कॉल सेंटर’, ‘आपकी सरकार आपके द्वार’, बिहार लोक सेवा अधिकार जैसी योजनाएं उत्साह से शुरू हुईं लेकिन बाद में कमजोर पड़ गईं।

इन्फॉर्मेशन कॉल सेंटर की स्थापना 2007 में हुई थी।

आरटीआई कार्यकर्ता शिवप्रकाश राय कहते हैं, ‘शानदार शुरुआत के बाद अब यह बंद हो चुका है। जवाबदेही खत्म हो गई। कार्यकर्ता हत्या, धमकी और झूठे मामलों में फंसे हैं।’

शाहिना परवीन कहती हैं, ‘शिक्षा और स्वास्थ्य में काम हुआ, लेकिन शिक्षक और डॉक्टरों की गुणवत्ता न होने से प्रभाव कम हुआ। पीपीपी मॉडल ने निजीकरण बढ़ाया, जो प्रारंभिक शैली से अलग था।’

बिजली और सड़कों में सुधार

2006 के श्वेत पत्र के अनुसार, बिहार में औसत बिजली खपत 60 किलोवाट थी, लेकिन 2011-12 में यह बढ़कर 134 किलोवाट और 2025-26 में 374 किलोवाट हो गई है।

सड़क निर्माण 2005-06 में 835 किमी था, जो अब बढ़कर 1,19,067 किलोमीटर हो गया है। पुलों और फ्लाईओवर की वजह से दुनिया तेज हो गई है।

हालांकि नीतीश के दावे के अनुसार सभी कूंड़ों से पटना छह घंटे में पहुंचने की स्थिति अभी नहीं बनी है।

भूमि सुधार, शिक्षा, स्वास्थ्य और उद्योग क्षेत्रों में नीतीश सरकार अच्छी प्रगति नहीं कर सकी।

भूमि सुधार के लिए डी. बंद्योपाध्याय के नेतृत्व में समिति और ‘कॉमन स्कूल सिस्टम’ के लिए मुचकुंद दुबे की अध्यक्षता में आयोग बनाया गया था।

पूर्व निदेशक डी.एम दिवाकर कहते हैं, ‘नीतीश का इरादा अच्छा था लेकिन संयुक्त रिपोर्ट लागू नहीं होती थीं। निजी संस्थाएं खुलीं लेकिन सार्वजनिक संस्थाएं कमजोर हुईं।’

‘पंचायत स्तर पर अनुशासनहीन शिक्षक नियुक्ति ने शिक्षा की गुणवत्ता को और कमजोर किया।’

वरिष्ठ पत्रकार अरुण श्रीवास्तव कहते हैं, ‘बिहार सरकार ठेकेदारों की सरकार बन गई है। फ्लाईओवर केवल मध्यवर्ग की जरूरतें पूरी करते हैं। सीमांतित बिहारी समाज की क्या स्थिति है?’

‘दस्तावेज में विकास की बातें उद्योग, रोजगार और पलायन में विफलता को दर्शाती हैं। इसमें बिहार सबसे पीछे है।’

नीतीश का बदलता क़िद्दन

2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए गठबंधन ने 243 में से 206 सीटें जीतीं, जिसमें जेडीयू को केवल 115 सीटें मिलीं और आरजेडी को 22।

लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में मोदी के उदय से असहमत नीतीश ने भाजपा छोड़ कर 2015 के चुनाव में आरजेडी-कांग्रेस के गठबंधन के साथ जंग लड़ी।

2015 में नीतीश ने बिहारी DNA नमूना दिल्ली भेज कर विरोध जताया।

बाद में 2017 में वे फिर से भाजपा गठबंधन में लौटे। 2022 में फिर आरजेडी-कांग्रेस के साथ गठबंधन किया, लेकिन 2024 में उसे भी तोड़ दिया।

फिर उनकी पार्टी जेडीयू और भाजपा एक हो गई हैं। हाल के चुनाव में नीतीश ने बार-बार कहा कि उन्होंने आरजेडी के साथ गलती की, लेकिन अब वे कहीं नहीं जाएंगे।

पहले बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने के लिए संघर्ष करने वाले नीतीश अब विशेष पैकेज में संतुष्ट नजर आते हैं।

पहले ‘बिहार दिवस’ का भव्य आयोजन करके बिहारीत्व पर गर्व करने वाले नीतीश अब कमजोर होते दिख रहे हैं। जब वे सत्ता संभाले थे तो उनकी उम्र 54 वर्ष थी, आज वे 75 वर्ष के हो गए हैं।

(हिंदी सामग्री का अनुवाद)

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