
कैलिफोर्निया के हाइब्रिड मधुमक्खियों में ‘वरोआ माइट्स’ के खिलाफ प्राकृतिक प्रतिरोध क्षमता का विकास
दक्षिण कैलिफोर्निया में एक हाइब्रिड मधुमक्खी ने ‘वरोआ माइट्स’ के खिलाफ प्राकृतिक रूप से लड़ने की क्षमता विकसित की है। 2019 से 2022 तक के अध्ययन के अनुसार, इन हाइब्रिड मधुमक्खियों में व्यावसायिक मधुमक्खियों की तुलना में 68 प्रतिशत कम परजीवी पाए गए हैं। इनके लार्वा चरण में ‘वरोआ’ परजीवी का आक्रमण कम होता है और रासायनिक उपचार की आवश्यकता पाँच गुना कम देखी गई है। 8 वैशाख, काठमांडू।
विश्व के मधुमक्खी पालक घातक परजीवी के कारण बड़ी संख्या में मधुमक्खी के छत्ते खो रहे थे, ऐसे समय में दक्षिण कैलिफोर्निया की एक विशेष हाइब्रिड मधुमक्खी ने नई उम्मीद जगाई है। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, रिवरसाइड के वैज्ञानिकों के अनुसार, इस मधुमक्खी ने मधुमक्खी जगत के सबसे खतरनाक दुश्मन माने जाने वाले ‘वरोआ माइट्स’ के खिलाफ प्राकृतिक रूप से लड़ने की क्षमता विकसित की है। 2025 में ही अमेरिका भर में लगभग 62 प्रतिशत व्यावसायिक मधुमक्खी के छत्ते नष्ट हो चुके थे।
अनुसंधान का निष्कर्ष: 68 प्रतिशत कम परजीवी — ‘साइन्टिफिक रिपोर्ट्स’ पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने 2019 से 2022 तक 236 मधुमक्खी छत्तों का सूक्ष्म अध्ययन किया। अध्ययन में पाया गया कि कैलिफोर्निया की ये हाइब्रिड मधुमक्खियाँ व्यावसायिक मधुमक्खियों की तुलना में औसतन 68 प्रतिशत कम परजीवी पाती हैं। साथ ही, इन मधुमक्खियों में रासायनिक उपचार की आवश्यकता भी पांच गुना कम देखी गई है।
मुख्य शोधकर्ता जेनेसिस चोंग-इचावेज़ के अनुसार, ये मधुमक्खियाँ व्यावसायिक प्रजनन कार्यक्रम के जरिए नहीं, बल्कि जंगली और विभिन्न वंशों की मधुमक्खियों के प्राकृतिक संमिश्रण से विकसित हुई हैं। इनमें अफ्रीकी, पूर्वी यूरोपीय, मध्यपूर्वी और पश्चिमी यूरोपीय मधुमक्खियों के गुण सम्मिलित हैं। बचपन से ही दिखने वाली प्रतिरोध क्षमता इस शोध का सबसे आश्चर्यजनक पक्ष है। प्रयोगशाला में किए गए परीक्षण में पाया गया कि ‘वरोआ’ परजीवी इन हाइब्रिड मधुमक्खियों के लार्वाओं की ओर कम आकर्षित होते हैं।
भविष्य की संभावनाएँ: परागण में मधुमक्खियों की भूमिका विश्वभर के कृषि उत्पादन के लिए अत्यंत आवश्यक है और इसका आर्थिक मूल्य अरबों डॉलर में है। इस परिस्थिति में, इस प्राकृतिक प्रतिरोध क्षमता की पहचान विश्वभर के मधुमक्खी पालन व्यवसाय और खाद्य सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है। इन्टोमोलॉजी के प्रोफेसर बोरिस बेर के अनुसार, आने वाला चुनौती इन मधुमक्खियों के विशिष्ट आनुवंशिक गुणों की पहचान कर उन्हें अन्य प्रजातियों तक फैलाना और रासायनिक विषादी के उपयोग पर निर्भरता घटाना होगा।