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जिरी ने साहित्य में प्रस्तुत किया नई दिशा

साहित्य में प्रकृति के प्रसंगों को हमने बहुत पढ़ा है, और लिखा भी है। लेकिन प्रकृति को स्वयं के केंद्र में रखते हुए, पर्यावरणीय संकट को मुख्य चिंता बनाकर की जाने वाली साहित्यिक विमर्श अक्सर पृष्ठभूमि तक सीमित रही है। इस बार साहित्य में प्रकृति के उपलब्धि और संकट को मुख्य धारा में लाने का प्रयास किया गया है।

प्रकृति, साहित्य और सतत भविष्य के मूल नारे के साथ आयोजित प्रथम बागमती पर्यासाहित्य महोत्सव २०८२ ने नेपाली साहित्य की पारंपरिक संदर्भ को व्यापक बनाने का संकेत दिया है। यह महोत्सव बागमती प्रदेश वन तथा पर्यावरण मंत्रालय और जिरी नगरपालिका ने विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं एवं वन-वातावरण क्षेत्र की सक्रिय संघ-संस्थाओं के सहयोग से आयोजित किया है।

चैत्र २७ से २९ तक चलने वाले इस महोत्सव में बागमती प्रदेश के १३ जिलों के पर्यावरण क्षेत्र के रचनाकार लेखक एकत्रित हुए थे। ३० तारीख की सुबह मेहमानों को जिरी से विदाई दी गई, जो २०८२ साल का अंतिम दिन भी था।

संघीय राजधानी से लगभग १९० किलोमीटर दूर हिमालयी घाटी जिरी पहुंचने पर केवल एक महोत्सव में भाग लेने का अनुभव नहीं हुआ, बल्कि एक नए संवाद के जन्म स्थल पर खड़े होने का एहसास हुआ। जिरी की प्रकृति साहित्य की पृष्ठभूमि से आगे आई, मुख्य प्रवाह में आई। इससे यह दिखा कि अब साहित्य केवल सौंदर्य की अभिव्यक्ति नहीं, समय की गंभीर समस्याओं से लड़ने का माध्यम भी होना जरूरी है।

यहाँ केवल संकट ही नहीं दिखा, पर्यावरण संतुलन के लिए किए गए विभिन्न प्रयास और उपलब्धियों की खुलेआम प्रशंसा हुई। सामुदायिक वन और जलाधार प्रबंधन में मिली उपलब्धियों को साहित्य में समेटने का प्रयास भी किया गया।

उत्सवपूर्ण महोत्सव

चैत्र २८ को महोत्सव के उद्घाटन से पहले, १३ जिलों के सर्जक जिरी बाजार के पास गुराँस पार्क में एकत्रित हुए। सफेद गुराँस के बगीचों के बीच स्थित तालाब और मैदान में सर्जकों ने आनंद लिया; कुछ ने गीत गाएं, कुछ नाचे, कुछ संवाद में व्यस्त रहे। उसके बाद वे हाटडाँडा तक गए, जहां स्थानीय समुदाय की बड़ी भागीदारी थी, और जातीय तथा स्थानीय परिवेश को दर्शाने वाली झाँकी से मेहमानों का स्वागत किया गया।

झाँकी सहित मेहमानों ने, स्थानीय समुदाय के साथ हाटडाँड़ा से लिंकन बाजार तक पैदल रैली की और बसपार्क में बनाए गए मंच पर उद्घाटन कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। झाँकी नृत्य ने सभी का मन आकर्षित किया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता जिरी नगरपालिका के प्रमुख मित्र जिरेले ने की, जबकि उद्घाटन बागमती प्रदेश के वन और पर्यावरण मंत्री भरत केसी ने किया। कार्यक्रम में प्रदेश सांसद उर्मिला सुनुवार, मंत्रालय के सचिव डॉ. केदार बराल, विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि, स्थानीय प्रतिनिधि, पत्रकार, नागरिक समाज के नेता और आम जनता की उल्लेखनीय भागीदारी थी।

इसने महोत्सव को न केवल साहित्यिक कार्यक्रम के रूप में बल्कि सामाजिक और नीतिगत संवाद के साझा मंच के रूप में स्थापित किया।

कि-नोट: विचारों की गहरी आधारशिला

महोत्सव का सबसे प्रभावशाली पक्ष ‘कि-नोट’ प्रस्तुति रही। प्रो. डॉ. संजीव उप्रेती ने पर्यासाहित्य को केवल एक नया शब्द या चलन नहीं, बल्कि, समय की मांग वाली बौद्धिक हस्तक्षेप के रूप में व्याख्यायित किया। उनका विचार स्पष्ट था – जलवायु संकट के युग में साहित्य तटस्थ नहीं रह सकता; इसे सवाल उठाना, चेतना फैलाना और समाज को जिम्मेदार बनाना होगा।

उसी तरह छालबाटो के लेखक एवं पर्यावरणविद् रमेश भुसाल ने ‘लाल पृथ्वी, गरम पृथ्वीशीर्षक से अपनी प्रस्तुति दी। उन्होंने मानव को ‘सुईखुटी भस्मासुर’ की उपमा देते हुए पर्यावरण विनाशकारी मानव कुकृतियों की कड़ी आलोचना की। उनके संदेशों ने स्पष्ट किया कि साहित्य जीवन से जुड़ा नहीं तो उसका प्रभाव सीमित रहेगा। इससे पर्यासाहित्य को व्यावहारिक धरातल पर स्थापित करने की दिशा मिली।

महोत्सव के कार्यक्रम नए निर्मित रिक्रिएशन भवन में सम्पन्न हुए। सौभाग्य से इसी भवन को महोत्सव के अंतिम दिन प्रदेश सरकार ने जिरी नगरपालिका को हस्तांतरित किया था। महोत्सव में करीब चालीस कविता वाचन, आठ गजलों सहित गजल संध्या, स्थानीय संस्कृति सहित सांस्कृतिक संध्या भी रोचक रही। प्रसिद्ध कवि कुमार नगरकोटी का काव्य प्रस्तुति दर्शकों के लिए विशेष आकर्षण रहा।

गजलकार, कवि, संवादकर्ता, साहित्यकार, पत्रकार, अभियानकर्ता की भी प्रस्तुतियाँ हुईं। दोलखा के जित कार्की की गजल अत्यंत लयात्मक रही। प्रतीक ढकाल, भवानी खतिवड़ा, भूपिन खड़का, दधि सापकोटा, अर्चना थापा, अर्चना राई, डॉ. अशोक थापा, डॉ. नवीनबन्धु पहाड़ी, दीपक सापकोटा सहित अन्य की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही।

दो दिनों में छह संवाद कार्यक्रम आयोजित किए गए। इनमें ‘भूमि-मानव की आवाज़और ‘कल, आज और भविष्य के जिरी’ संवाद विशेष प्रभावशाली रहे। इन संवादों ने स्थानीय अनुभवों, संघर्षों और संभावनाओं को साहित्य के साथ जोड़ने का प्रयास किया।

इसके अलावा, जिरी बाजार के पास खुले मैदान में ‘I Love Jiri’ लिखा तालाब की पृष्ठभूमि में कविता वाचन और संवाद कार्यक्रमों ने आयोजन को और भी जीवंत और यादगार बनाया। प्राकृतिक सौंदर्य के साथ साहित्यिक अभिव्यक्ति का यह संयोजन महोत्सव की भावना को और गहरा कर गया।

जिरी का संदर्भ स्वयं में अत्यंत प्रासंगिक रहा। प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर इस क्षेत्र में प्रकृति और साहित्य के विषय पर संवादात्मक बहस होना संयोग नहीं बल्कि अत्यावश्यकता प्रतीत हुई। इस महोत्सव ने जिरी को केवल एक पर्यटन स्थल न बनाकर, विचार, बहस, संवाद और सृजन का केंद्र भी स्थापित करने का संकेत दिया।

प्रश्न के साथ नई यात्रा का संकेत

हालांकि, कुछ प्रश्न भी उठे हैं और उठते रहेंगेक्या यह महत्वपूर्ण संवाद देशव्यापी क्यों नहीं बन पाया? क्यों ज्यादा रचनाकारों की भागीदारी सुनिश्चित नहीं हो पाई? एक यादगार बात यह है कि यह बागमती प्रदेश स्तर का प्रयास है और पहली बार किया गया प्रयास है। त्रुटियां हो सकती हैं लेकिन भविष्य में सुधार के लिए तेजी से कदम बढ़ाए जा सकते हैं।

बागमती प्रदेश के मुख्यमंत्री इंद्र बनियाँ ने लिखित शुभकामना संदेश भेजकर ऐसे पर्यासाहित्य महोत्सव को नियमित करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की। महोत्सव के प्रतिभागियों ने न केवल निरंतरता की इस घोषणा से खुशी जताई, बल्कि उन्होंने राज्य की विभिन्न स्तरों की सरकारों से पर्यासाहित्य की गतिविधियों में समावेशीकरण भी करने का आग्रह किया। पर्यासाहित्य के प्रति झुकाव रखने वाले संस्थाओं, व्यक्तियों के साथ नियमित समन्वय के रास्ते ढूँढ़ने की घोषणा भी हुई। पर्यासाहित्य के विषयों को स्कूल पाठ्यक्रम में शामिल करने के उपाय सुझाए गए।

पर्यासाहित्य जैसे विषय को और व्यापक बनाने के लिए राज्य, शैक्षणिक संस्थाओं और साहित्यिक समुदाय के बीच अधिक समन्वय आवश्यक लगता है। भविष्य में इस तरह के कार्यक्रमों को और अधिक समावेशी, बहुआयामी और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक ले जाने में सफलता मिल सके तो इसका प्रभाव और भी गहरा हो सकता है।

लेकिन इन प्रश्नों के मध्य भी एक बात स्पष्ट है — जिरी में शुरू हुआ यह प्रयास छोटा काम नहीं है। यह एक संकेत है, संभावना है और संभवतः एक नया साहित्यिक आंदोलन भी हो सकता है। इसने साहित्य को नए दृष्टिकोण से देखने का मार्ग प्रशस्त किया है।

अंत में, जिरी से उठी यह आवाज वहीं सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसे विस्तार मिलना चाहिए, संवाद को और गहरा बनाना चाहिए और साहित्य को प्रकृति से पुनः जोड़ने के अभियान के रूप में आगे बढ़ाना चाहिए। यदि ऐसा हुआ, तो, पर्यासाहित्य केवल एक शब्द नहीं, बल्कि नेपाली साहित्य की नई दिशा बन सकता है। यह यात्रा यहीं जिरी से शुरू हुई है।

सभी को नव वर्ष की शुभकामनाएं!

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