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प्रधानमंत्री बालेन शाह का बेघर प्रवासी प्रबंधन पर दृष्टिकोण

प्रधानमंत्री बालेन शाह के नेतृत्व में काठमांडू के नदी किनारे लगभग चार हजार बेघर प्रवासी बस्तियों को हटाने का अभियान तेज किया गया है। बेघर प्रवासी समस्या की उत्पत्ति ऐतिहासिक भूमि असमान वितरण और सामाजिक-आर्थिक असमानताओं के कारण हुई बाध्यात्मक परिस्थितियों का परिणाम है। सरकार पर बेघर प्रवासियों का सम्मानजनक प्रबंधन करते हुए अस्थायी स्थानांतरण और स्थायी आवास की व्यवस्था करने का संवैधानिक दायित्व है।

लगभग दो-तिहाई बहुमत के साथ प्रधानमंत्री बने वालेन्द्र शाह (बालेन) के नेतृत्व में वर्तमान में काठमांडू के नदी किनारे लगभग चार हजार बेघर प्रवासी बस्तियों को हटाने का अभियान तेज किया गया है। पूर्व में काठमांडू महानगरपालिका के मेयर रहते हुए संघीय सरकार के असहयोग के कारण यह कदम रोका गया था, जिसे उन्होंने प्रधानमंत्री बनने के बाद तीनों सुरक्षा एजेंसियों के साथ समन्वय कर आगे बढ़ाया है। सरकार ने बस्तियाँ हटाने से पहले लोगों को अस्थायी रूप से हटाने और बाद में स्थायी प्रबंध करने का वादा किया था, फिर भी वर्षों से राज्य और राजनीतिक दलों द्वारा धोखा पाने वाले बेघर प्रवासियों में गहरा अनिश्चितता, भय और चिंता व्याप्त है।

कोई भी व्यक्ति बेघर प्रवासी बनने की इच्छा नहीं रखता और हमेशा के लिए बेघर रहकर नदी किनारे जोखिम भरा जीवन बिताना उचित नहीं है। अतः बेघर प्रवासी नागरिक स्वयं समस्या के कारण नहीं हैं; इसका दीर्घकालीन और मानवीय समाधान न देना राज्य की संरचनात्मक विफलता है। बालेन सरकार ने वर्षों से उलझी इस समस्या को दीर्घकालीन रूप से समाधान करने का प्रयास किया है, जो सराहनीय है। लेकिन शहर की सुंदरता बढ़ाने के नाम पर एक जगह की मानवीय आपदा को किसी दूसरी जगह स्थानांतरित करना पर्याप्त नहीं है।

बेघर प्रवासियों के नाम पर राजनीतिक और माफिया खेल भी चलता रहा है। बेघर प्रवासी समस्या केवल नदी के किनारे जमीन के अतिक्रमण की नहीं है, बल्कि यह दशकों से सामाजिक न्याय, मानवाधिकार और सीमांत वर्गों के समावेशी विकास से जुड़ा गंभीर राजनीतिक प्रश्न है। डोजर मकान तोड़ सकता है, पर गरीबी और भेदभाव की जड़ों को मिटा नहीं सकता। लगभग छह दशकों से बेघर प्रवासियों के नाम पर नेपाल में राजनीति और भ्रष्टाचार चलता आ रहा है।

आज की जरूरत बेरहम विस्थापन नहीं, मानवीय स्वामित्व और अपनत्व की है। अस्थिरता और भय नहीं, सम्मानजनक स्थायित्व चाहिए। इसलिए सरकार को नकली चिंताओं के बजाय वास्तविक और व्यावहारिक कदम उठाने चाहिए।

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